जयंती विशेष: रानी माँ गाइदिन्ल्यू

26 जनवरी को पद्मभूषण रानी माँ गाइदिन्ल्यू के जन्म दिवस को अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के द्वारा "नारी शक्ति दिवस" के रूप में मनाया जाता है। यह भारत का प्रजासत्ताक दिन भी है। रानी माँ के द्वारा शुरू किया हुआ कलूम काई (स्थानीय मंदिर) आज भी मौजूद है।

The Narrative World    26-Jan-2023   
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रानी माँ गाइदिन्ल्यू

26 जनवरी को पद्मभूषण रानी माँ गाइदिन्ल्यू के जन्म दिवस को अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के द्वारा "नारी शक्ति दिवस" के रूप में मनाया जाता है। यह भारत का प्रजासत्ताक दिन भी है। रानी माँ के द्वारा शुरू किया हुआ कलूम काई (स्थानीय मंदिर) आज भी मौजूद है।


माता-पिता के द्वारा उनका गाइदिन्ल्यू नाम रखा गया जो इतिहास तथा भारतीय जन-मानस मेंरानी माँके रूप में प्रसिद्ध हुई।गाईअर्थात् अच्छा औरदिनका अर्थमार्ग दिखाना। इस प्रकार गाइदिन्ल्यू का अर्थ हैअच्छा मार्ग दिखाने वाली


वास्तव में उनका जीवन उनके नाम के ही अनुरूप था। रानी माँ भारतीय धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को अच्छा और उचित मार्ग दिखाते हुए ही अपने जीवन को आहुत कर गई।


रानी मां ने अंग्रेज़ों के द्वारा पोषित ईसाई धर्म का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक स्तर पर जाकर प्रतिकार किया। रानी मां के द्वारा भारतीय परंपराओं की रक्षा के लिए अनेकों प्रयास किए गए।


रानी माँ सभी लोगों को सनातन धर्म एवं संस्कृति के प्रति लगातार जागृत करने का कार्य करती रहीं। इसीलिए आज भारतीय समाज रानी मां गाइदिन्ल्यू को माता अहिल्याबाई होलकर, माता जीजाबाई एवं रानी लक्ष्मीबाई की कोटि में सम्मान के साथ स्थान प्रदान करता है।


रानी गाइदिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी 1915 को मणिपुर राज्य के छोटे से पहाड़ी कस्बे लंकाओं में हुआ था। रानी मां के पिता का नाम लोथोनांग वा मां का नाम केलुवतलिनलयू था।


जन-मान्यता है कि रानी मां के जन्म से लगभग सप्ताह भर पहले लंकाओं में ऐसी प्राकृतिक छटा बन गई थी कि वहां का समस्त जनमानस किसी बहुत बड़ी अनहोनी की आशंका से डर गया था।


आसमान में छाए काले-काले बादलों ने संपूर्ण लंकाओं को अंधकार के आगोश में ले लिया था। समस्त लंकाओ वासी दिन-रात ईश्वर से यही प्रार्थना करते थे कि किसी प्रकार से आया यह संकट टल जाय। पहाड़ों पर बादल फटने की घटना आम है।


बादल फटने से कभी कभी बहुत बड़ी दुर्घटनाएं हो जाया करती हैं। इसी भयानक वातावरण में रानी मां का जन्म होता है। जन्म के दो - तीन बाद ही आसमान में छाए काले- काले बादलों के स्वरूप में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है। भयानक बादल अब छटने लगते हैं।


लगभग सप्ताह भर बाद उमड़ते-घुमड़ते बादल अपने आप शांत होने लगते हैं। कुछ समय बाद आसमान बिल्कुल शांत हो जाता है। भयानक प्राकृतिक आपदा की आशंका और रानी मां के जन्म के मध्य लोगों ने एक विशेष प्रकार का संबंध स्थापित होते हुए देखा। अब लंकाओ वासी रानी मां को ईश्वर का अवतार समझने लगे।


रानी मां के पिता लोथोनांग पामई समाज के मुखिया थे। पूरा पामई समाज लोथोनाग का बहुत आदर एवं सम्मान किया करता था। सभी अपना सुख - दुःख अपने मुखिया से बांटा करते थे।


मुखिया की बेटी के जन्म के बाद बादलों के छटने की घटना पूरे लंकाओं में चर्चा का विषय बन गई। लोग दूर दूर से रानी मां को देखने आने लगे। रानी मां जन्म से ही देवी का अवतार बन चुकी थी।


एक दिन रानी मां की माता केलुवतलिनल्यू ने देखा कि छोटी बच्ची गाईदिनल्यू घर के छत पर बैठी आसमान को अपलक देख रही है। केलूवत लिनलियू के पूछने पर कि आसमान को ऐसे क्यों देख रही हो ?


बेटी का उत्तर था मां मै ईश्वर का संदेश पढ़ रही हूं। अब केतुवत के समझ में आ गया कि यह कोई सामान्य बच्ची नहीं है। कुछ बड़ी होने पर रानी मां सामने पहाड़ियों पर घंटो बैठी ध्यान किया करती थी। संपूर्ण नागाओं में रानी मां के चमत्कारों के किस्सेकहानियां हर दिन चर्चा में रहने लगे।


समय बीतता गया गाइदिन्ल्यू पहले से ज्यादा लोगों से मिलने लगी। अब अधिक लोगों की समस्याओं का निस्तारण करने लगी। एक दिन गाइदिन्ल्यू को कांबिरान निवासी जादोनांग के बारे में जानकारी मिली कि वे सनातन धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के लिए अपने समाज के लोगों को जागृत कर रहे हैं।


लोगो में हिन्दू धर्म के लिए आस्था कि भावना का विकास कर रहे हैं। गाइदिन्ल्यू ने इस महान व्यक्ति से मिलने की इच्छा व्यक्त की। एक दिन गाइदिन्ल्यू अपने सहयोगियों के साथ कांबीरान जा पहुंची। जादोनांग का यहां पर गाइदिन्ल्यू से मिलना हुआ।


दोनों महान विचारवान व्यक्तियों का मिलना ऐसे हुआ की दोनों ने एक साथ कार्य करने का निश्चय कर लिया। दोनों ने सनातन संस्कृति एवं धर्म के प्रति लोगों को घर-घर जाकर जागृत करना प्रारंभ कर दिया।

अंग्रेजो के द्वारा चलाए जाने वाले ईसाइयत कार्यक्रम का अब पहाड़ों पर विरोध शुरू हो गया। इसाई धर्म में परिवर्तन का कार्यक्रम असफल होता नजर आने लगा।


अंग्रेजों ने इन दोनों को कैद करनी की सोची। परिणाम स्वरूप सरकारी पुलिस के द्वारा इन्हें अब दिन -रात ढूंढा जाने लगा। गाइदिन्ल्यू और जड़ोनांग को पहाड़ों पर बहुत समर्थन मिला, सामान्यजन ने अपने नेता को बचाने में जीजान लगा दी। सामान्य जन इन्हेंमहान हलचलके नाम से पुकारने लगे। एक दिन अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जादोनांग को गिरफ्तार कर लिया गया।


अब गाइदिनल्यू ने अकेले ही जादोनांग के अधूरे कार्य का बीड़ा अपने सिर पर उठा लिया। अब गाइदिन्ल्यू पहले से ज्यादा समय लोगों के बीच रहना प्रारंभ कर दिया। वहां का सामान्य जन भी गाइदिन्ल्यू को अपने बीच पाकर बहुत खुश होता।


अब बहुत बड़ी संख्या में लोग रानी गाइदिन्ल्यू से जुड़ने लगे। पूरा नागा हिल्स सनातन धर्म एवं संस्कृति से युक्त हो उठा। अब ईसाई मिशनरी बहुत परेशान हो गए। धर्मांतरण के लिए उनके द्वारा दिए गए प्रलोभन धरे के धरे रह गए।


ईसाई मिशनरियों ने वहीं के एक व्यक्ति फूजो को प्रलोभन देकर महान हलचल के प्रयास को समाप्त करने का निर्णय ले लिया। साथ ही गाइदिन्ल्यू को गिरफ्तार करने का वारंट निकलवा दिया।


गाइदिन्ल्यू को गिरफ्तार कर जेल में कैद कर दिया गया। कैदी जीवन के दौरान गाइदिन्ल्यू को अनेकों प्रकार की अमानवीय यातनाएं देने का प्रयास किया गया। उन्हें लगभग एक समय ही भोजन दिया गया। कई बार तो सप्ताह भर उन्हें भूखे रखा गया। लगभग पूरे उत्तर पूर्वी भारत की समस्त जेलों से उनको रखा गया।


मणिपुर जेल में कैदी जीवन के दौरान गाइदिन्ल्यू के कमरे में सांप, बिच्छू आदि जहरीले जीव-जंतुओं को प्रवेश करा दिया जाता था जिससे ये जीव गाइदिन्ल्यू को काट ले और गाइदिन्ल्यू की मृत्यु हो जाए परंतु ये सभी जीव जैसे गाइदिन्ल्यू को पहचानते हो। किसी जीव ने कभी भी गाइदिन्ल्यू को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया।


वास्तव में गाइदिन्ल्यू को आत्मसाक्षात्कार प्राप्त था। उन्हें परमात्मा की गहरी अनुभूति थी। इसका प्रमाण उनके कैदी जीवन के दौरान साथी कैदियों एवं वहां के जेलर आदि के द्वारा समय-समय दिया जाता रहा है। जेल के अधिकारियों ने गाइदिन्ल्यू को कई बार ध्यान की अवस्था में छत से स्पर्श करते हुए देखा।


जेल के अन्य कैदी गण भी गाइदिन्ल्यू के चमत्कारों के कारण उन पर अटूट विश्वास रखते थे। कई बार इसी कारण गाइदिन्ल्यू को वर्षों तक काल कोठारी की सजा भुगतनी पड़ी थी। वास्तव में गाइदिन्ल्यू की कांति बहुत प्रभावशाली थी।


जादोनांग के बाद वही एक मात्र ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व था जिनपर पूरा नागा समाज भरोसा करता था। सभी गाइदिन्ल्यू को ईश्वर का अंश मानते थे। इसीलिए सब लोग उन्हीं के बताए रास्ते पर चलना उचित समझते थे।


गाइदिन्ल्यू के द्वारा किए गए अनेकों सामाजिक प्रयासों को संपूर्ण नागा पहाड़ी वासियों ने एक चमत्कार समझा और तत्कालीन समय में स्वतंत्रता के लिए प्रयास करने वाले नेताओ ने रानी गाइदिन्ल्यू से मुलाकात की।

एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू गाइदिन्ल्यू से मिलने मणिपुर आये वे गाइदिन्ल्यू से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने गाइदिन्ल्यू को पूर्वी भारत की रानी कह कर संबोधित किया। उसी समय से सामान्य बोलचाल में गाइदिन्ल्यू को रानी के उपनाम से पुकारा जाने लगा।


वास्तव में रानी गाइदिनल्यू उत्तर- पूर्वी भारत में भारतीय संस्कृति की रक्षा के निमित नागरिकों को निरन्तर प्रेरित करती रही। इसी प्रेरणा के कारण वहां का सामान्य से सामान्य मानव भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पर गर्व करने लगा।


यह सब अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के लिए खतरा लगने लगा और उन्होंने पूर्वी भारत के ही एक सदस्य फुजो को रानी गाइदिनल्यू के द्वारा संचालित कार्यक्रम के विरोध स्वरूप ताकत के साथ तैयार किया।


अब अंग्रेज परस्त फुजो नागाओं के लोगो को धन के माध्यम से ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का बहुत बड़ा कार्यक्रम का संचालित किया गया। रानी गाइदिन्ल्यू को जेल में डाल दिया।


स्मरण रहे, इसी प्रकार का धर्म परिवर्तन का कार्यक्रम भारत की धरती पर अनेकों बार हुआ। प्राचीन समय से ही शक, कुषाण, पलव, पार्थियन आदि भारत विरोधी ताकतों ने भारत के छोटे छोटे भागों पर कई बार आक्रमण किया। यहां उनका शासन भी रहा परंतु एक समय उन्हें इसी धरती की संस्कृति में अपना पूर्ण विलय करना ही पड़ा।


रानी गाइदिन्ल्यू उत्तर पूर्व के लोगो को इन सब बातों से, तथ्यों से निरंतर अवगत कराती रही। बहुत बड़ी संख्या में आज भी उत्तर पूर्व के लोग हिन्दू धर्म और संस्कृति को मानते हैं।


रानी गाइदिन्ल्यू ने इस्लाम एवं ईसाई धर्म को धर्म कहने वाले लोगो को बताया कि इस धरती पर एक मात्र धर्म मानवधर्म है जिसका नेतृत्व केवल सनातन संस्कृति ही करती है। अतः हमारी भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण विश्व की आद्य संस्कृति है। उनका सन्देश व प्रयास सदियों तक याद किया जाता रहेगा।


दुर्भाग्य का विषय यह है कि कई वर्षों तक गाइदिन्ल्यू को जेल में ही रहना पड़ा। विरोधी ताकतों के द्वारा महान स्वतंत्रता सेनानी को भारत विरोधी करार दिया गया था। एक बार रानी गाइदिन्ल्यू संघ के द्वितीय सरसंघचालक एमएस गोलवलकर (गुरूजी) से मिली।


गाइदिन्ल्यू ने गुरुजी को अपनी बात ठीक प्रकार से समझाया। गुरुजी ने रानी मां को भारत के वास्तविक बेटी माना। वास्तव में हमारे राष्ट्र में भारतीयता की रक्षा के लिए अनेकों प्रयास हुए परंतु अंग्रेजियत से प्रभावित लोगों ने उसे वह स्थान नही दिया जिसका की वह अधिकारी थीं।


समय आ गया है कि हम भारतीयता को सुरक्षित व संवर्धित करने के उनके प्रयासों का आज पुन: उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर स्मरण कर श्रद्धाभाव से उन्हें भारत के इतिहास में वह स्थान दें जिससे आने वाली पीढ़ियां भी भारत की इस बेटी के जीवन से प्रेरणा ले सके।