16 नवंबर को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के चिलहटी गांव में हिंदू संगठनों ने एक प्रार्थना बैठक में छिपे कन्वर्ज़न गिरोह को पकड़ लिया और पुलिस ने मामला दर्ज किया।
बिलासपुर का यह खुलासा एक और दिन और एक और कन्वर्ज़न जाल का सबूत लेकर आया है। चिलहटी के एक घर में चल रही यह बैठक साधारण भक्ति सभा नहीं थी। यहां पादरी विष्णु कोसारिया और उनके सहयोगी प्रतीक गोयल हिंदू महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाकर उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसा रहे थे। हिंदू कार्यकर्ताओं ने मौके पर पहुंचकर इस खेल का पर्दाफाश किया और पुलिस को सूचना दी।
इस मामले ने प्रदेश में चल रहे संगठित धार्मिक षडयंत्र का चेहरा फिर सामने रख दिया है। बिलासपुर जिले में पिछले छह महीने में ऐसे 38 मामले दर्ज हुए हैं। यह संख्या दिखाती है कि मिशनरियां किस तरह सुनियोजित ढंग से गरीब और कमजोर समाज पर अपना जाल फैला रही हैं।
चिलहटी की घटना से पहले 12 नवंबर को सरकंडा और पचपेडी में भी दो प्रार्थना सभाओं में इसी तरह की गतिविधियां पकड़ी गईं। वसंत विहार में एसईसीएल के ड्राइवर राजेंद्र खरे पर ईसाई किताबें बांटकर लोगों को फुसलाने का आरोप लगा। कुर्दी खुर्द में एक और घर को कन्वर्ज़न केंद्र के रूप में उपयोग किया जा रहा था। हर जगह मामला एक ही पैटर्न में सामने आया। निशाना हमेशा गरीब, अशिक्षित, महिलाएं और बच्चे बने।
इन बैठकों में चमत्कार का लालच दिया गया। बीमारों को चमत्कारी पानी देकर ठीक होने का झांसा दिया गया। जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त पढ़ाई, इलाज और राशन का वादा किया गया। कई मामलों में पैसे का भी लालच दिया गया। मेरठ के एक बड़े मामले में परिवारों को दो से पांच लाख रुपये तक देने की बात सामने आई थी।
यह पूरा खेल केवल गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाता है। मिशनरी गिरोह पहले उन्हें यह समझाता है कि उनकी समस्याएं हिंदू विश्वास के कारण हैं। फिर झूठे चमत्कार दिखाकर उन्हें अपनी ओर खींचता है। इसके बाद कन्वर्ज़न को ही राहत का रास्ता बताया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया मनोवैज्ञानिक दबाव और आर्थिक लालच पर चलती है।
चिलहटी का घर भी इसी तरह का गुप्त केंद्र था। ऐसी बैठकें हमेशा निजी घरों में होती हैं ताकि प्रशासन की नजर न पड़े। इन्हें हाउस चर्च कहा जाता है। इनमें न पंजीकरण की जरूरत होती है न अनुमति की। इन्हीं जगहों पर कमजोर लोगों को धर्म बदलने के लिए तैयार किया जाता है।
इन अभियानों के पीछे विदेशी धन का बड़ा खेल चलता है। देश में हर साल करोड़ों रुपये अमेरिका और यूरोप से दान के नाम पर आते हैं। कई ईसाई संगठन मानवता सेवा के नाम पर पैसा भेजते हैं लेकिन उसका उपयोग पादरियों की तनख्वाह, कन्वर्ज़न साहित्य और लालच के पैकेज में होता है। गृह मंत्रालय ने पिछले साल कई विदेशी वित्तपोषित ईसाई संस्थाओं के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए थे। मंत्रालय ने साफ कहा था कि ये संस्थाएं गैर कानूनी कन्वर्ज़न गतिविधियों में शामिल हैं।
जब भी ऐसे मामले खुलते हैं तो मिशनरी संगठन तुरंत खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि उन पर कार्रवाई धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है। वे हर मंच पर यह शोर मचाते हैं कि भारत में ईसाइयों पर अत्याचार हो रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि कानून केवल उन गतिविधियों पर रोक लगाता है जो धोखे, लालच और दबाव पर आधारित हों। धर्म बदलना अगर मजबूरी या लालच में हो तो यह अपराध है।
बिलासपुर की घटनाओं ने एक बार फिर साबित किया है कि देश में एक बड़ी साजिश चल रही है। लक्ष्य कमजोर हिंदू समाज को तोड़ना है। प्रशासन अब सक्रिय हो चुका है और समाज भी सजग है। ऐसी गतिविधियों पर रोक तभी लगेगी जब स्थानीय लोग इन जालों को पहचानेंगे और कानून को सूचना देंगे। हिंदू संगठन लगातार इस लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब कभी यह नहीं होता कि कोई संस्था गरीबों की गरीबी का फायदा उठाकर उनकी आस्था बदल दे। बिलासपुर का मामला बताता है कि इस खेल को रोकना जरूरी है।
लेख
शोमेन चंद्र