बच्चों को ‘A’ से AK-47 सिखाने वाले दंडकारण्य के ख़ूँख़ार माओवादी का अंत

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों ने नक्सल मास्टरमाइंड सुधाकर को मार गिराया, जो बच्चों को "A" से AK-47 और "ब" से बंदूक सिखाता था। नक्सल एजुकेशन सेंटर्स में मासूमों का ब्रेनवॉश कर हथियार थमाने वाला यह इनामी नक्सली छुट्टी से लौटते ही ढेर!

The Narrative World    07-Jun-2025   
Total Views |

Representative Image

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के घने जंगलों में गुरुवार को सुरक्षाबलों ने एक ऑपरेशन में नक्सलियों के कुख्यात सेंट्रल कमेटी मेंबर और एजुकेशन हेड सुधाकर उर्फ गौतम को मार गिराया। एक करोड़ रुपये के इनामी इस खूंखार नक्सली ने दंडकारण्य क्षेत्र में मासूम बच्चों और युवाओं के हाथों में किताब की जगह कारतूस और कलम की जगह कट्टा थमाया।


सुधाकर ने '' से 'असलहा' और '' से 'बंदूक' सिखाने वाला एक खतरनाक सिलेबस तैयार किया था, जिसके जरिए वह गांव-गांव में नक्सल एजुकेशन सेंटर्स चलाकर बच्चों का ब्रेनवॉश करता था। छुट्टी से लौटते ही सुरक्षाबलों की गोली का शिकार हुआ यह नक्सली माओवादी विचारधारा का प्रचारक और हिंसा का मास्टरमाइंड था।


Representative Image

सुधाकर की कहानी नक्सलवाद की उस काली सच्चाई को उजागर करती है, जो बस्तर और दंडकारण्य के जंगलों में मासूम बच्चों और युवाओं को लाल आतंक की आग में झोंक रही है। तेलंगाना के चिंतापलुडी गांव का रहने वाला सुधाकर युवा उम्र में नक्सल संगठन से जुड़ गया और जल्द ही सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी का अहम सदस्य बन गया। उस पर छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में कई हिंसक वारदातों का आरोप था, जिसके चलते उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।


बस्तर के आईजी पी. सुंदरराज ने गुरुवार को बताया, "बीजापुर के नेशनल पार्क क्षेत्र में खुफिया सूचना के आधार पर डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा की संयुक्त टीम ने ऑपरेशन चलाया। कई बार गोलीबारी के बाद सुधाकर का शव बरामद हुआ, साथ ही एक एके-47, विस्फोटक और अन्य हथियार भी मिले।"


“सुधाकर की खतरनाक साजिश का सबसे भयावह पहलू था उसका नक्सल एजुकेशन सेंटर्स का जाल। उसने दंडकारण्य क्षेत्र में गांव-गांव में ऐसी पाठशालाएं खुलवाईं, जहां बच्चों को 'अ' से 'अनार' नहीं, बल्कि 'असलहा' और 'ब' से 'बंदूक' सिखाया जाता था। अंग्रेजी में भी उसने 'A' से AK-47 और 'B' से बम जैसे शब्दों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया।”


इन नक्सली पाठशालाओं का सिलेबस खुद सुधाकर ने तैयार किया था, जिसका मकसद मासूम बच्चों और युवाओं का ब्रेनवॉश कर उन्हें हथियार उठाने और हिंसक संघर्ष में शामिल होने के लिए तैयार करना था।


सूत्रों के मुताबिक, इन केंद्रों में बच्चों को वामपंथी विचारधारा, नक्सलवाद का इतिहास, माओवादी सिद्धांत और कम्युनिस्ट क्रांति की कहानियां सुनाई जाती थीं। सुधाकर पुलिस, वन विभाग और सरकार द्वारा कथित अत्याचारों की मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर बच्चों के मन में नफरत का बीज बोता था, ताकि वे नक्सल संगठन से जुड़ जाएं।


बस्तर के पुलिस सूत्रों ने बताया, "सुधाकर का मकसद शिक्षा की आड़ में लाल आतंक को बढ़ावा देना था। वह बच्चों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देता था और उन्हें नक्सली कैडर में भर्ती करता था। उसकी पाठशालाएं जंगल में छिपे ठिकानों पर चलती थीं, जहां बड़े नक्सली लीडर व्याख्यान देते थे।"


Representative Image

इन केंद्रों में नक्सलवाद के बड़े नेताओं की जिंदगी और उनके तथाकथित "संघर्ष" की कहानियां बच्चों को रटाई जाती थीं, ताकि वे माओवादी आंदोलन को अपना भविष्य मान लें। यह सिलसिला बस्तर और दंडकारण्य के दूरदराज के गांवों में सालों से चल रहा था, जिसने सैकड़ों मासूमों को हिंसा के रास्ते पर धकेल दिया।


सुधाकर का अंत कैसे हुआ, यह भी एक साहसिक ऑपरेशन की कहानी है। सूत्रों के अनुसार, वह पिछले कुछ समय से छुट्टी पर था और तेलंगाना में अपने गृह क्षेत्र में गया हुआ था। इस दौरान बस्तर में सुरक्षाबलों का दबाव बढ़ता जा रहा था। मई 2025 में कर्रेगुट्टा पहाड़ियों पर 24 दिनों तक चले ऑपरेशन में 31 नक्सली मारे गए थे, और 21 मई को सीपीआई (माओवादी) के महासचिव बसवराजू का भी खात्मा हो गया था।


Representative Image

इन वारदातों ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी थी, और सुधाकर छुट्टी से लौटकर दंडकारण्य में फिर से दहशत फैलाने की साजिश रच रहा था। बुधवार को लोकल नक्सली कैडर उसे अन्नपुर से लेकर छत्तीसगढ़ लौटे। वह कड़ी सुरक्षा के बीच जंगल के सुरक्षित ठिकानों की ओर बढ़ रहा था, लेकिन खुफिया एजेंसियों ने उसकी लोकेशन ट्रेस कर ली।


बीजापुर के नेशनल पार्क क्षेत्र में डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा की संयुक्त टीम ने सुधाकर को घेर लिया। जैसे ही वह अपने ठिकाने पर पहुंचा, जवानों ने गोलीबारी शुरू कर दी। दोनों तरफ से गोलियां चलीं, लेकिन सुरक्षाबलों की सटीक रणनीति के आगे सुधाकर टिक न सका और मारा गया।


बस्तर के आईजी पी. सुंदरराज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "यह ऑपरेशन नक्सलियों के लिए करारा झटका है। सुधाकर दंडकारण्य में हिंसक विचारधारा का प्रचारक था, और उसका खात्मा हमारी बड़ी कामयाबी है।" मौके से एक एके-47, भारी मात्रा में विस्फोटक और अन्य हथियार बरामद किए गए।


हालांकि, इस ऑपरेशन में एक ट्विस्ट भी सामने आया। सूत्रों के मुताबिक, सुधाकर के साथ नक्सली लीडर रूपेश, पापा राव और बंडी प्रकाश जैसे बड़े कमांडर भी मौजूद थे। भारी गोलीबारी के बीच रूपेश और कुछ अन्य नक्सली भागने में कामयाब हो गए।


Representative Image

जवानों ने इन फरार नक्सलियों का पीछा शुरू कर दिया है, और पुलिस का दावा है कि बसवराजू के मारे जाने के बाद नक्सली अब एकजुट नहीं हो पा रहे। खुफिया एजेंसियां लगातार बड़े नक्सली लीडरों की लोकेशन ट्रेस कर रही हैं, जिससे लाल आतंक का खात्मा करीब नजर आ रहा है।


सुधाकर की मौत ने नक्सलियों के एजुकेशन सेंटर्स की सच्चाई को भी उजागर किया है। ये पाठशालाएं शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि हिंसा का कारखाना थीं। छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस ऑपरेशन की सराहना करते हुए कहा, "हमारी सरकार और सुरक्षाबल नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए कटिबद्ध हैं। सुधाकर जैसे लोग बच्चों का भविष्य बर्बाद कर रहे थे, लेकिन अब हम उन्हें नहीं बख्शेंगे।" शर्मा ने यह भी जोड़ा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर बस्तर में सड़क, स्कूल, अस्पताल और मोबाइल टावर जैसी सुविधाएं ला रही हैं, ताकि जनजाति समुदाय मुख्यधारा से जुड़े और नक्सलियों के झांसे में न आएं।


सुधाकर का अंत नक्सलवाद के खिलाफ जंग में एक बड़ी जीत है, लेकिन उसकी खतरनाक साजिश ने जो सवाल खड़े किए हैं, वे गंभीर हैं। बच्चों को 'A' से AK-47 और '' से बंदूक सिखाने वाला यह नक्सली मास्टरमाइंड भले ही मारा गया, लेकिन उसकी बनाई पाठशालाओं ने सैकड़ों मासूमों का भविष्य अंधेरे में डाल दिया।


अब वक्त है कि सरकार और समाज मिलकर बस्तर के बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का जीवन दें, ताकि लाल आतंक की यह आग हमेशा के लिए बुझ जाए।