राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके जैसलमेर और बारमेर में एक खतरनाक साजिश का पर्दाफाश हुआ है, जहां एक कथित इस्लामी कार्टेल ने न केवल खुफिया जानकारी को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तक पहुंचाया, बल्कि पिछले 14 सालों में स्थानीय संस्कृति पर भी गहरी छाप छोड़ी है।
इस मामले में हाल ही में गिरफ्तार शकूर खान, जो पूर्व कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद का निजी सहायक रह चुका है, ने संवेदनशील सैन्य जानकारियां लीक करने का गंभीर आरोप झेला है। 10 जुलाई को सोशल मीडिया पर उठे सवालों और खुफिया रिपोर्ट्स के आधार पर यह स्पष्ट हो रहा है कि यह मामला महज जासूसी तक सीमित नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सांस्कृतिक हस्तक्षेप का हिस्सा है, जिसका मकसद क्षेत्र की पहचान को धीरे-धीरे बदलना हो सकता है।
इस खुलासे की शुरुआत 2 जून 2025 को हुई, जब राजस्थान पुलिस ने शकूर खान को जयपुर के पीएचक्यू पुलिस स्टेशन में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के तहत गिरफ्तार किया। खान पर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान उच्चायोग, नई दिल्ली और वहां के खुफिया अधिकारियों के साथ मिलकर भारतीय सेना की गोपनीय जानकारियां साझा कीं।
इंडियन एक्सप्रेस की 3 जून की रिपोर्ट के अनुसार, खान के पास से तीन मोबाइल फोन बरामद हुए, जिनकी तकनीकी जांच जारी है। खुफिया सूत्रों का दावा है कि खान का संपर्क पाक उच्चायोग के कर्मचारी एहसान-उर-रहिम उर्फ दानिश और सोहैल कमर से था, जो पहले से ही जासूसी नेटवर्क के तहत संदिग्ध थे। यह नेटवर्क इतना व्यापक है कि मई 2025 तक देशभर से 12 लोगों को इस सिलसिले में गिरफ्तार किया जा चुका है, जैसा कि इकनॉमिक टाइम्स ने रिपोर्ट किया।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह जासूसी सिर्फ व्यक्तिगत लालच का नतीजा है या इसके पीछे एक बड़े इस्लामी कार्टेल का हाथ है? सोशल मीडिया यूजर @AjiHaaan ने 10 जुलाई को एक चौंकाने वाला दावा किया, "जैसलमेर-बारमेर में अब जो घटित हो रहा है, उसकी नींव बहुत पहले चुपचाप रखी जा चुकी है। सारी राजनीति उसी तरफ जाएगी जिसका डर हमेशा रहता है।"
उनके 3 जून के पोस्ट में इस बात का उल्लेख है कि पिछले 14 सालों में राजस्थानी संस्कृति पर इस्लामी प्रभाव तेजी से बढ़ा है। गाड़ियों के नंबर अब अरबी शैली में दिखने लगे हैं, जबकि परंपरागत राजस्थानी परिधानों की जगह अबाया और फिलिस्तीनी हेडगियर आम हो गए हैं। यह बदलाव माउंट आबू और उदयपुर जैसे पर्यटन स्थलों तक फैल चुका है, जहां स्थानीय परिवहन तक इस नेटवर्क के कब्जे में बताया जा रहा है।
इस सांस्कृतिक हस्तक्षेप के पीछे की मंशा क्या है? खुफिया विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जहां सांस्कृतिक घुसपैठ के जरिए जासूसी नेटवर्क को मजबूती दी जाती है। स्ट्रैटेजिक सिक्योरिटी जर्नल (2018) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, खुफिया अभियानों में सांस्कृतिक प्रभाव का इस्तेमाल अक्सर स्थानीय आबादी को प्रभावित करने और विश्वास जीतने के लिए किया जाता है।
जैसलमेर की भौगोलिक स्थिति, जो भारत-पाक सीमा से सटी है, इसे इस तरह के ऑपरेशंस के लिए आदर्श बनाती है। बारमेर जिले की वेबसाइट के अनुसार, यह क्षेत्र थार रेगिस्तान का हिस्सा है और पाकिस्तान के थारपारकर जिले से सटा हुआ है जो जटिलताओं को और बढ़ाता है।
राजनीतिक स्तर पर इस मुद्दे पर सवाल उठ रहे हैं। @Shivangkaushik3 ने 10 जुलाई को पूछा, "वहां की मौजूदा सरकार का क्या रोल है? यूपी में योगी मॉडल के बाद भी बीजेपी शासित राज्यों को समझ नहीं आ रहा कि इसे कैसे हैंडल करना चाहिए?"
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला महज जासूसी से कहीं आगे निकल चुका है। रक्षा विश्लेषक रिटायर्ड कर्नल अजय शुक्ला कहते हैं, "जैसलमेर जैसे संवेदनशील इलाके में सांस्कृतिक बदलाव और जासूसी का मेल चिंता का विषय है। सरकार को न केवल खुफिया नेटवर्क को तोड़ने की जरूरत है, बल्कि स्थानीय आबादी को जागरूक करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।" उनका सुझाव है कि सीमा क्षेत्रों में सख्त निगरानी और सामाजिक एकता के कार्यक्रम शुरू किए जाएं, ताकि इस तरह की साजिशों पर लगाम लगाई जा सके।
जैसलमेर और बारमेर में उजागर हुआ यह इस्लामी कार्टेल न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को भी चुनौती दे रहा है। शकूर खान की गिरफ्तारी महज एक शुरुआत है, और सवाल यह है कि क्या सरकार इस खतरे को समय रहते पहचान कर कड़ा जवाब दे पाएगी, या यह साजिश और गहराती चली जाएगी? जनता की नजर अब राज्य और केंद्र सरकार पर टिकी है, जो इस जटिल मसले को सुलझाने की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं।