कभी बचपन में हमें एक साधारण-सी सीख दी जाती थी:
"अगर कोई कहे कि कौवा तुम्हारा कान ले गया है, तो कौवे के पीछे दौड़ने से पहले अपने कान को देख लेना।"
यह कहावत केवल बाल-शिक्षा नहीं थी, बल्कि विवेक, सत्यापन और आत्मबोध की मूल शिक्षा थी। दुर्भाग्यवश, आज यही विवेक आधुनिक समाज से सबसे तेजी से लुप्त होता जा रहा है।
आज का मनुष्य सूचना के सागर में डूबा हुआ है, पर ज्ञान के किनारे से दूर खड़ा है। बिना तथ्यों की पुष्टि किए, बिना संदर्भ को समझे और बिना परिणामों पर विचार किए, हम किसी भी स्थापित विमर्श को सत्य मान लेते हैं। यही प्रवृत्ति आगे चलकर गलत धारणाओं को अकाट्य सत्य में बदल देती है।
विमर्श का संकट और सत्य का अवमूल्यन
समस्या केवल गलत जानकारी की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की है जो प्रश्न करने से पहले निष्कर्ष निकाल लेती है। आज विमर्श का निर्माण तथ्यों से नहीं, बल्कि भावनाओं, पूर्वाग्रहों और बार-बार दोहराए गए कथनों से हो रहा है। जो बात जितनी अधिक बार और जितने प्रभावशाली मंच से कही जाती है, वही उतनी ही सत्य प्रतीत होने लगती है।
यही वह बिंदु है जहाँ समाज अनजाने में किसी नियोजित षड्यंत्र का हिस्सा बन जाता है। वैश्विक इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि जब भी किसी राष्ट्र को कमजोर करना होता है, तो सबसे पहले उसके नागरिकों की सोच को भ्रमित किया जाता है। उनकी असंतुष्टि को भड़काया जाता है, उनके इतिहास को संदिग्ध बनाया जाता है और उनकी व्यवस्थाओं को एकतरफा दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है।
वैश्विक परिदृश्य और लक्षित राष्ट्र
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विमर्श केवल विचारों का संघर्ष नहीं होता, बल्कि यह सत्ता, संसाधन और प्रभाव क्षेत्र की लड़ाई का एक प्रभावी माध्यम होता है। ऐसे में किसी लक्षित राष्ट्र के भीतर ही ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया जाता है कि वह स्वयं अपने अस्तित्व, संस्थाओं और मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे।
इस प्रक्रिया का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसके दुष्परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देते, बल्कि दीर्घकाल में सामने आते हैं। शासन बदल सकते हैं, नीतियाँ परिवर्तित हो सकती हैं, पर समाज के भीतर बैठा भ्रम पीढ़ियों तक अपना प्रभाव छोड़ता है। इसका खामियाजा अंततः उसी देश के आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है, जिनके नाम पर यह पूरा विमर्श खड़ा किया गया होता है।
बौद्धिक वर्ग और उसका विरोधाभास
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस पूरे विमर्श का नेतृत्व प्रायः समाज का वही वर्ग करता है, जिसे सबसे अधिक पढ़ा-लिखा, जागरूक और प्रभावशाली माना जाता है। ज्ञान जब विवेक से कट जाता है, तो वह अहंकार में बदल जाता है। और अहंकार व्यक्ति को सत्य का अन्वेषक नहीं, बल्कि अपनी धारणा का रक्षक बना देता है।
ऐसे में प्रश्न करना नहीं, बल्कि सहमत होना ही बौद्धिकता का प्रमाण मान लिया जाता है। असहमति को पिछड़ापन, प्रतिगामिता या नैतिक अपराध की संज्ञा दे दी जाती है। यह प्रवृत्ति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो सकती है।
व्यवस्थाएँ, इतिहास और संदर्भ की अनदेखी
इतिहास में निर्मित अधिकांश व्यवस्थाएँ अपने समय की परिस्थितियों, सामाजिक संरचना और तत्कालीन चुनौतियों के अनुरूप थीं। उनका उद्देश्य पूर्णता नहीं, बल्कि संतुलन और व्यवस्था बनाए रखना था। किंतु जब इन्हें उनके मूल संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है, तो वे सुधार का माध्यम बनने के बजाय विवाद का कारण बन जाती हैं।
इस प्रकार एक ऐसा विमर्श जन्म लेता है, जो न तो ऐतिहासिक समझ पर आधारित होता है और न ही भविष्य के लिए कोई रचनात्मक समाधान प्रस्तुत करता है। यह विमर्श केवल समाज को विभाजित करता है और राष्ट्र को आंतरिक रूप से कमजोर करता है।
उदाहरणों से परे मूल प्रश्न
यहाँ उदाहरण देना सरल है, किंतु अनावश्यक भी। उदाहरणों पर केंद्रित बहस अक्सर मूल मुद्दे से ध्यान भटका देती है। विवेकशील पाठक स्वयं समझ सकता है कि किन विषयों पर बिना सम्यक अध्ययन के निर्णायक राय बना ली गई है और किन व्यवस्थाओं को उनके वास्तविक उद्देश्य से अलग कर प्रस्तुत किया जा रहा है।
राष्ट्रीय हित और नागरिक कर्तव्य
यह समझना आवश्यक है कि नागरिक हित और राष्ट्रीय हित परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। राष्ट्र सुरक्षित रहेगा तभी नागरिकों के अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा सुरक्षित रहेंगे। इसलिए किसी भी नागरिक का प्रथम कर्तव्य केवल सत्ता से प्रश्न करना ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों को समझना और उनकी रक्षा करना भी है।
प्रश्न पूछना लोकतंत्र की आत्मा है, परंतु विवेकहीन प्रश्न समाज को दिशा नहीं, बल्कि अराजकता की ओर ले जाते हैं।
निष्कर्ष: कौवे के पीछे नहीं, विवेक के साथ
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सूचना पर नहीं, सत्य पर विश्वास करें। भावनाओं पर नहीं, विवेक के आधार पर निर्णय लें। किसी भी विमर्श का हिस्सा बनने से पहले अपने “कान” को देखें, तथ्यों की पुष्टि करें, संदर्भ को समझें और संभावित परिणामों पर गंभीरता से विचार करें।
क्योंकि इतिहास यह सिखाता है कि जो समाज कौवे के पीछे दौड़ता है, वह अंततः न केवल अपना कान खो देता है, बल्कि अपनी दिशा भी।
लेख
डॉ. धीरेंद्र तिवारी
सलाहकार, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन