KGMU से उठते गंभीर सवाल: क्या यह केवल धोखा है या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा खतरा?

शादी के वादे, भावनात्मक भरोसा और बाद में शोषण के आरोप जब एक ही परिसर से बार-बार उभरें, तो सवाल सिर्फ रिश्तों का नहीं रह जाता।

The Narrative World    21-Jan-2026
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हाल के दिनों में लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से जुड़े कुछ मामलों ने न केवल चिकित्सा शिक्षा की दुनिया को झकझोर दिया है, बल्कि पूरे देश के सामने सुरक्षा, नैतिकता और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जब एक ही संस्थान से, एक जैसे तरीकों के साथ, अलग-अलग मामलों में प्रेम, शादी के वादे, यौन शोषण और कथित धर्म परिवर्तन के दबाव जैसे आरोप सामने आते हैं, तो इन्हें केवल व्यक्तिगत अपराध या संयोग मानकर टाल देना न तो न्यायसंगत है और न ही सुरक्षित।
 
यह लेख किसी व्यक्ति, धर्म या समुदाय के विरुद्ध आरोप तय करने का प्रयास नहीं करता। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि जो पैटर्न सामने आ रहा है, उसकी निष्पक्ष, गहन और बहु-एजेंसी जांच हो। कारण यह है कि यह मामला अब केवल व्यक्तिगत संबंधों का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत विफलता से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।
 
एक संस्थान, एक जैसा तरीका: संयोग या सुनियोजित पैटर्न?
 
KGMU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से जुड़े मामलों में बार-बार यह तथ्य सामने आया है कि शादी का वादा, भावनात्मक भरोसा और उसके बाद शोषण या दबाव की शिकायतें दर्ज हुई हैं। आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन तरीकों की समानता और स्थान की एकरूपता स्वाभाविक रूप से चिंता उत्पन्न करती है।
 
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प्रश्न यह नहीं है कि आरोपी किस पृष्ठभूमि से आते हैं। असली प्रश्न यह है कि एक ही परिसर में, एक ही प्रकार की घटनाएं बार-बार क्यों दोहराई जा रही हैं।
 
यदि ये केवल व्यक्तिगत अपराध होते, तो संस्थान की भूमिका सीमित मानी जा सकती थी। लेकिन जब संस्थागत निगरानी, आंतरिक शिकायत तंत्र और छात्र व कर्मचारी सुरक्षा के दायरे में लगातार चूक दिखाई देती है, तो प्रशासनिक जवाबदेही तय करना अनिवार्य हो जाता है।
 
‘फेक लव’ से आगे: ‘लव जिहाद’ की बहस क्यों?
 
देश में लंबे समय से यह बहस चल रही है कि कुछ मामलों में प्रेम संबंधों की आड़ में संगठित तरीके से शोषण और धर्म परिवर्तन का दबाव डाला जाता है। इस अवधारणा को लेकर राजनीतिक और सामाजिक मतभेद हैं, लेकिन कानून और सुरक्षा एजेंसियों का कार्य भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और पैटर्न के विश्लेषण पर आधारित होता है।
 
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यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी भी रूप में संगठित नेटवर्क, कोचिंग, फंडिंग या निर्देश शामिल हैं, तो मामला स्वतः ही राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में प्रवेश कर जाता है।
 
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि केवल संदेह के आधार पर निष्कर्ष निकालना अनुचित है, लेकिन संभावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उतना ही खतरनाक है।
 
पड़ोसी देश से संभावित कनेक्शन
 
भारत और पाकिस्तान के संबंधों के ऐतिहासिक संदर्भ में यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हाइब्रिड वॉरफेयर, जिसमें सोशल इंजीनियरिंग, कट्टरपंथ और सॉफ्ट टार्गेट्स का उपयोग होता है, एक ज्ञात रणनीति रही है।
 
इसी कारण, जब किसी संवेदनशील शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थान में एक जैसे आरोप सामने आते हैं, तो विदेशी कनेक्शन की संभावना को पूरी तरह खारिज कर देना भी जिम्मेदार दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।
 
यह कहना कि निश्चित रूप से कोई कनेक्शन है, उतना ही गैर-जिम्मेदार है जितना यह कहना कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। संतुलित और तथ्यात्मक निष्कर्ष केवल एजेंसियों की गहन जांच से ही सामने आ सकते हैं, जिसमें डिजिटल ट्रेल, वित्तीय लेन-देन, संचार पैटर्न और नेटवर्क विश्लेषण शामिल हो।
 
कानूनी पेच और सहमति का प्रश्न
 
इलाहाबाद हाईकोर्ट सहित विभिन्न न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि सहमति की स्थिति में आपराधिक मामलों की कानूनी व्याख्या जटिल हो जाती है। लेकिन यहां दो अहम बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
 
पहला, यदि सहमति धोखे पर आधारित हो, तो उसकी वैधता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।
 
दूसरा, सहमति का प्रश्न राष्ट्रीय सुरक्षा या संगठित अपराध की जांच को बाधित नहीं कर सकता।
 
अर्थात यदि कोई मामला केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित है, तो कानून उसी के अनुरूप अपना रास्ता तय करेगा। लेकिन यदि संगठित शोषण या दबाव के संकेत मिलते हैं, तो विशेष और व्यापक जांच अनिवार्य हो जाती है।
 
KGMU और अन्य संस्थानों की जिम्मेदारी
 
शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थान केवल शिक्षा देने के केंद्र नहीं होते। उन्हें सुरक्षित परिसर के रूप में कार्य करना चाहिए। इसके लिए मजबूत आंतरिक शिकायत तंत्र, जेंडर-सेंसिटिव मॉनिटरिंग, रेड-फ्लैग व्यवहार की रिपोर्टिंग व्यवस्था और समयबद्ध कार्रवाई आवश्यक है।
यदि बार-बार शिकायतें सामने आने के बावजूद प्रभावी निवारक कदम नहीं उठाए जाते, तो इसे स्पष्ट रूप से संस्थागत विफलता माना जाएगा, जिसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
 
महिलाओं के लिए चेतावनी नहीं, सशक्तिकरण
 
इस विषय पर चर्चा करते समय यह विशेष सावधानी आवश्यक है कि पीड़िताओं पर किसी भी प्रकार का दोषारोपण न हो। जागरूकता का अर्थ यह नहीं है कि जिम्मेदारी एकतरफा महिलाओं पर डाल दी जाए।
 
 
फिर भी, व्यावहारिक सच्चाई यह है कि शादी का वादा करके शारीरिक संबंध बनाना और बाद में जिम्मेदारी से मुकर जाना एक गंभीर रेड फ्लैग है। सच्चे और ईमानदार संबंधों में कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जाता।
 
क्या किया जाना चाहिए?
 
स्वतंत्र और बहु-एजेंसी जांच, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर SIT, ATS और साइबर एजेंसियों की भागीदारी हो।
 
संस्थागत ऑडिट, जिसके तहत KGMU सहित सभी मेडिकल कॉलेजों में सुरक्षा और शिकायत निवारण प्रणालियों की समीक्षा की जाए।
 
कानूनी स्पष्टता, ताकि धोखे से प्राप्त सहमति और संगठित दबाव से जुड़े मामलों पर स्पष्ट दिशानिर्देश तय हों।
 
डिजिटल साक्षरता और काउंसलिंग, जिससे छात्रों को नियमित रूप से जागरूक किया जा सके।
 
राजनीति से ऊपर उठकर कार्रवाई, क्योंकि यह विषय वोट बैंक का नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और नागरिकों की गरिमा का है।
 
निष्कर्ष
 
यह बहस न तो नफरत फैलाने के लिए है और न ही जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए। यह बहस सवाल पूछने और व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए है।
 
यदि जांच में आरोप निराधार सिद्ध होते हैं, तो उसे भी उतनी ही ईमानदारी से स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन यदि कुछ भी संगठित या सुनियोजित पाया जाता है, तो उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के संभावित खतरे के रूप में देखने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
 
 
सच की तलाश ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। और सच तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है निष्पक्ष, निर्भीक और गहन जांच।
 
लेख
 
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बिमलेश कुमार सिंह चौहान
कुलसचिव, आर.आर. इंस्टिट्यूट ऑफ मॉडर्न टेक्नोलॉजी, लखनऊ