संघ शताब्दी वर्ष: उत्साह, आत्मचिंतन और आगामी चुनौतियाँ

आत्मविस्मृत, आत्मकेंद्रित और असंगठित समाज की चुनौतियों को पहचानकर संघ ने कैसे दीर्घकालीन सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी।

The Narrative World    21-Jan-2026
Total Views |
Representative Image 
विजयदशमी 1925 को नागपुर में आरंभ हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष 2025 में अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। सौ वर्षों की यह यात्रा किसी संगठन की मात्र वृद्धि या विस्तार की कथा नहीं रही, बल्कि भारतीय समाज के भीतर चले एक सतत संस्कार, संगठन और जागरण के प्रयास की ऐतिहासिक कहानी बन चुकी है। शताब्दी वर्ष उत्सव का अवसर था, पर उससे भी अधिक आत्मचिंतन का कालखंड रहा।
 
संघ स्थापना के समय हिंदू समाज की स्थिति सहज नहीं थी। समाज आत्मविस्मृत अवस्था में था। वह अपनी ही परंपराओं, मूल्यों और जीवन दृष्टि से कटता जा रहा था। साथ ही समाज आत्मकेंद्रित होता जा रहा था, जहाँ व्यक्ति का चिंतन अपने तक सीमित होता जा रहा था। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण स्थिति समाज का असंगठित होना था, जिसके कारण उसकी सामूहिक शक्ति प्रकट नहीं हो पा रही थी।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इन तीनों स्थितियों को समाज की मूल चुनौती के रूप में पहचाना और उनके समाधान के लिए ही संघ कार्य का प्रारंभ किया।
 
इसी से संघ का मूल उद्देश्य स्पष्ट हुआ। आत्मविस्मृत समाज को आत्मबोध कराना, आत्मकेंद्रित समाज को समाजकेंद्रित बनाना और असंगठित समाज को संगठित करना। संघ का कार्य किसी तात्कालिक आंदोलन के रूप में न तो आरंभ हुआ और न ही त्वरित परिणामों की अपेक्षा के साथ। शाखा, अनुशासन और संस्कार, इन्हीं साधनों के माध्यम से समाज के बीच निरंतर, शांत और गहराई वाला कार्य आगे बढ़ता गया।
 
समय के साथ इसके परिणाम समाज में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे। एक समय था जब अपनी ही संस्कृति, इतिहास और जीवन पद्धति को हीन दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति प्रबल थी। शताब्दी वर्ष तक आते आते समाज में आत्मविश्वास का भाव पुनः जागृत होता दिखाई दिया। योग, आयुर्वेद, भारतीय जीवनशैली, भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बढ़ता सम्मान किसी आकस्मिक परिवर्तन का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सामाजिक साधना का फल रहा।
 
Representative Image
 
आत्मकेंद्रित समाज को समाजकेंद्रित बनाने की दिशा में भी संघ का कार्य निरंतर चलता रहा। व्यक्ति, परिवार और समाज, इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित किए बिना स्वस्थ राष्ट्रीय जीवन की कल्पना संभव नहीं है। कुटुंब प्रबोधन और पंच परिवर्तन जैसे प्रयास इसी उद्देश्य से किए गए, ताकि सामाजिक उत्तरदायित्व केवल वैचारिक स्तर तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन के व्यवहार में भी उतरे।
 
संघ का तीसरा कार्य संगठन सबसे अधिक धैर्य, विश्वास और निरंतरता की मांग करता है। लंबे समय तक यह धारणा प्रचलित रही कि हिंदू समाज संगठित नहीं हो सकता। आज यह स्पष्ट हो चुका है कि असंगठन समाज का स्वभाव नहीं था, बल्कि चेतना का अभाव था। जैसे जैसे संगठन के महत्व का अनुभव समाज को हुआ, यह धारणा स्वतः ही टूटती चली गई।
 
 
संघ की शताब्दी यात्रा को यदि कालखंडों में देखा जाए, तो वह तीन चरणों में स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है। प्रारंभिक काल उपहास और उपेक्षा का था, जब संघ को गंभीरता से नहीं लिया गया। इसके बाद विरोध का काल आया, जिसमें प्रतिबंध, कारावास और निरंतर वैचारिक संघर्ष का सामना करना पड़ा। वर्ष 1948 का प्रतिबंध इस दौर की सबसे कठिन परीक्षा था। शताब्दी वर्ष तक संघ स्वीकार्यता के कालखंड में प्रवेश कर चुका था, जहाँ समाज के व्यापक वर्गों में उसके कार्य को लेकर समझ और विश्वास विकसित हो चुका था।
 
शताब्दी वर्ष के दौरान चले गृह संपर्क अभियान, सामाजिक संवाद और विविध कार्यक्रम इस स्वीकार्यता के स्पष्ट संकेत थे। किंतु इतिहास यह भी सिखाता है कि स्वीकार्यता का काल किसी भी दीर्घकालीन आंदोलन के लिए सबसे अधिक सावधानी की मांग करता है। यहीं आत्मसंतोष, अहंकार और लक्ष्य भ्रम का खतरा जन्म लेता है।
 
 
संघ का कार्य सत्ता केंद्रित नहीं, बल्कि समाज केंद्रित है। राजनीतिक घटनाएँ और उपलब्धियाँ राष्ट्रीय जीवन का एक पक्ष हो सकती हैं, पर वे संघ कार्य का मापदंड नहीं बन सकतीं। यदि समाज परिवर्तन के स्थान पर उपलब्धियों का गर्व केंद्र में आ जाए, तो वही स्वीकार्यता स्वयं एक चुनौती में बदल जाती है।
 
शताब्दी वर्ष का वास्तविक अर्थ उत्सव नहीं, बल्कि उसके बाद का आत्ममंथन है। अब प्रत्येक स्वयंसेवक के सामने यह प्रश्न और अधिक स्पष्ट है कि संघ के पहले सौ वर्षों की उपलब्धियों से आगे, आने वाले वर्षों में उसकी भूमिका क्या होगी। यह शताब्दी त्याग, तपस्या, अनुशासन और करुणा का परिणाम रही है, और आगे की यात्रा भी इन्हीं मूल्यों के सहारे आगे बढ़ेगी।
 
लेख
 
Representative Image 
 
दीपक कुमार
लेखक, समाजसेवी एवं राजनीतिक सलाहकार
पटना, बिहार