ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड: विकास के नाम पर माओ और CCP का सबसे बड़ा मानव निर्मित अकाल

ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड के नाम पर चला प्रयोग, जिसने चीन को औद्योगिक शक्ति नहीं, बल्कि भय, भूख और करोड़ों मौतों की त्रासदी दी।

The Narrative World    04-Jan-2026
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ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड 1958 से 1962 तक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का सबसे बड़ा सामाजिक और औद्योगिक प्रयोग रहा। माओत्से तुंग ने इस अभियान को चीन को कृषि प्रधान देश से औद्योगिक महाशक्ति बनाने के नाम पर शुरू किया। उन्होंने ब्रिटेन जैसे देशों को पीछे छोड़ने और सोवियत संघ से पहले कम्युनिस्ट सपनों को साकार करने का लक्ष्य तय किया। इसी सोच के तहत CCP ने सहकारी खेत बनाए, गांवों को कॉम्यून में बदला और हर परिवार को उद्योग के नाम पर काम में झोंक दिया। सरकार ने किसानों से बर्तन और औजार पिघलवाकर स्टील बनाने का आदेश दिया। शुरुआत में यह योजना जोश से चली, लेकिन जल्द ही इसके विनाशकारी परिणाम सामने आए।
 
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सबसे पहले चार कीट अभियान (Four Pests Campaign) ने तबाही का रास्ता खोला। CCP ने मक्खी, मच्छर, चूहे और गौरैया को फसलों का दुश्मन घोषित किया। पूरे देश में लोगों ने ढोल और बर्तन बजाकर गौरैया मारने की मुहिम चलाई। सरकार ने इसे देशभक्ति बताया। मगर प्रकृति ने इसका बदला लिया। गौरैया कम होते ही टिड्डियों और अन्य कीटों ने फसलों पर हमला कर दिया। खेत उजड़ने लगे और अनाज का उत्पादन गिरता चला गया। इस एक फैसले ने अकाल को और गहरा कर दिया। इस अभियान ने करोड़ों लोगों को भूख के मुंह में धकेल दिया।
 
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इसके बाद बैकयार्ड भट्ठियों ने खेती की रीढ़ तोड़ दी। सरकार ने ग्रामीणों को आदेश दिया कि वे अपने घरों में छोटी भट्ठियां लगाकर स्टील बनाएं। किसानों ने खेत छोड़ दिए और भट्ठियों में जुट गए। परिणामस्वरूप खेतों में फसलें पककर भी कट नहीं सकीं। 1958 में अच्छी पैदावार के बावजूद हजारों हेक्टेयर में धान और कपास सड़ते रहे। राज्य ने कागजों पर उत्पादन बढ़ा दिखाया, लेकिन गांवों में भोजन का संकट फैलता गया।
 
 
इसी दौरान सामूहिक रसोई और कम्युनिस्ट खेती ने हालात और बिगाड़ दिए। CCP ने निजी खेती खत्म कर दी और सभी किसानों को अपना अनाज लोक भंडार में जमा करने को मजबूर किया। बड़े सामूहिक रसोई घर खुले, जहां शुरुआत में मुफ्त भोजन मिला। लेकिन जब भंडार खाली हुए, तब झगड़े और अराजकता फैल गई। लोग भूखे रहने लगे और गांवों में भय का माहौल बन गया।
 
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CCP के अधिकारियों ने जबरदस्ती मजदूरी और अनाज की जब्ती को और तेज किया। अधिकारी उत्पादन के झूठे लक्ष्य तय करते और किसानों से वही आंकड़े मांगते। जो किसान लक्ष्य पूरा नहीं कर पाते, उन्हें दाना छुपाने का दोषी ठहराया जाता। सरेआम पिटाई होती और यातनाएं दी जातीं। निजी खेती करने वालों को गैर क्रांतिकारी बताकर अपमानित किया गया। अधिकांश अनाज सरकारी गोदामों में चला गया और शहरों या निर्यात के लिए भेज दिया गया। कई अधिकारियों ने ऊपर तक सच्चाई नहीं पहुंचाई और खराब मौसम को बहाना बनाया। विरोध करने वालों को जेल भेजा गया या मौत के घाट उतार दिया गया।
 
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अकाल ने लोगों को अमानवीय हालात में धकेल दिया। भूख से बेहाल लोग पेड़ों की छाल, घास और मिट्टी तक खाने लगे। सरकारी दस्तावेजों में दर्ज कई मामलों ने इंसानियत को शर्मसार किया। भूख ने लोगों को नरभक्षण तक के लिए मजबूर किया। रिपोर्टों में ऐसे उदाहरण दर्ज हैं जहां लोगों ने मृत शरीरों का मांस खाया। एक किसान ने बताया कि वह रोज किसी न किसी का शव देखता था। गांवों में लाशें आम दृश्य बन गईं।
 
 
इस त्रासदी में मौतों का आंकड़ा आज भी बहस का विषय है, लेकिन सभी शोध एक बात साफ कहते हैं कि यह हादसा करोड़ों जिंदगियों का था। कई अध्ययनों के अनुसार 30 से 45 मिलियन लोगों ने जान गंवाई, जबकि कुछ शोध इससे भी ज्यादा संख्या बताते हैं। इतिहासकार इस दौर को मानव इतिहास की सबसे भयावह मानव निर्मित त्रासदियों में गिनते हैं। ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड के नाम पर माओ और CCP ने जिस सपने को आगे बढ़ाया, उसने चीन को विकास नहीं, बल्कि भूख, डर और मौत का महासागर दिया।
 
लेख
शोमेन चंद्र