नेहा बोरा के मुँह से निकली सच्चाई, बांग्लादेश के रिज़िम चेंज ऑपरेशन को भारत में दोहराने की रणनीति

जब नेहा बोरा जैसी कम्युनिस्ट नेता दूसरे देश के लोकतंत्र विरोधी और रिज़िम चेंज वाले आंदोलन को रास्ता दिखाने वाला बताती हैं, तो हमें समझना चाहिए कि यह ख़तरा भारत के लिए कितना बड़ा है।

The Narrative World    15-Oct-2026   
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लोकतंत्र को ख़त्म कर बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार को गिराने वाले आंदोलन को अब कम्युनिस्ट नेता और माओवादियों को हीरो मनाने वाली पार्टी की लीडर नेहा बोरा ने भारतीय युवाओं के लिए आदर्श बताया है। जिस तरह बांग्लादेश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को गिराने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को ख़त्म करने की कोशिश हुई, उसी तरह अब भारत में भी इन्होंने अपना मुखौटा उतार दिया है। अब भारत में भी चुनावी संस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष को व्यापक सत्ता विरोधी आंदोलन से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। यही माओवाद का असली चेहरा है, जिसे नेहा बोरा ने अतिआत्मविश्वास में सबके सामने रख दिया है।


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माओवादियों को प्रेरणा मनाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी के स्टूडेंट विंग ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने 14 अक्टूबर को बांग्लादेश के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट (SSF) के छठे राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए भेजे गए वीडियो संदेश में बांग्लादेश के Gen Z आंदोलन को भारतीय युवाओं के लिए रास्ता दिखाने वाला बताया।


“वामपंथी नेहा बोरा ने संगठन को ‘लाल सलाम’ कहा, उसके आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही और दोनों देशों में संघर्षों के बीच समानताएं स्थापित कीं। बांग्लादेश के 'द बिजनेस स्टैंडर्ड' ने उनके संदेश को रिपोर्ट किया कि बोरा ने बांग्लादेशी छात्र संगठन को युवाओं के सामूहिक संघर्ष का रास्ता दिखाने का श्रेय दिया।”


यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जिस आंदोलन को वामपंथी नेहा बोरा भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बता रही हैं, वह केवल छात्र प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा था। जुलाई और अगस्त 2024 में बांग्लादेश का आंदोलन शेख हसीना सरकार के विरुद्ध व्यापक जनविद्रोह में बदल गया। 5 अगस्त 2024 को हसीना ने प्रधानमंत्री पद छोड़ दिया और देश से बाहर चली गईं। उसके बाद देश में अंतरिम शासन स्थापित हुआ। इस दौरान हिंदुओं के नरसंहार से लेकर तमाम लोकतंत्र विरोधी गतिविधियाँ हुई।


बोरा ने स्पष्ट रूप से कहा कि बांग्लादेश ने भारत के युवाओं को रास्ता दिखाया। नेहा बोरा यहाँ किसी छात्र आंदोलन की सामान्य उपलब्धियों का उल्लेख भर नहीं कर रही थीं, बल्कि भारत की वर्तमान परिस्थिति को बांग्लादेश के अनुभव से जोड़ रही थीं। जब कोई राष्ट्रीय छात्र संगठन का अध्यक्ष किसी विदेशी आंदोलन को रास्ता दिखाने वाला बताता है, तो उस आंदोलन की प्रकृति, उसके संगठनात्मक नेतृत्व और उसके बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट को देखना आवश्यक है।


बांग्लादेश का आंदोलन: आरक्षण विरोध से सरकार के पतन तक


बांग्लादेश में जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का विरोध शुरू हुआ। यह विवाद सरकारी नौकरियों में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के वंशजों के लिए आरक्षण की बहाली से जुड़ा था। लेकिन सरकार की दमनात्मक कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों पर हमले, गिरफ्तारियां और मौतों ने आंदोलन को व्यापक राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया। 5 अगस्त को शेख हसीना के सत्ता छोड़ने तक यह आंदोलन सरकार के खिलाफ जनाक्रोश का केंद्र बन चुका था। यह डीप स्टेट का रिज़िम चेंज ऑपरेशन था, जिसे बांग्लादेश में सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।


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क्या यही वह राजनीतिक अनुभव है जिसे बोरा ने भारतीय युवाओं के लिए रास्ता दिखाने वाला बताया है? उन्होंने बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही, क्या यह प्रेरणा नागरिक अधिकारों की रक्षा से संबंधित है, या रिज़िम चेंज ऑपरेशन से? क्या यह छात्रों की व्यापक लामबंदी है या लोकतंत्र को ख़त्म करने की कोशिश? या सरकार के खिलाफ आंदोलन को निर्णायक राजनीतिक परिवर्तन तक ले जाने की रणनीति है?


जब नेहा बोरा जैसी कम्युनिस्ट नेता दूसरे देश के लोकतंत्र विरोधी और रिज़िम चेंज वाले आंदोलन को रास्ता दिखाने वाला बताती हैं, तो हमें समझना चाहिए कि यह ख़तरा भारत के लिए कितना बड़ा है।