भारत में सत्ता परिवर्तन की राजनीति अब केवल चुनावी सभाओं, राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों और संसद के भीतर होने वाली बहसों तक सीमित नहीं रह गई है। अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे प्रदर्शनों ने एक ऐसा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध के नाम पर धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां तैयार की जा रही हैं, जिनमें लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को हटाने की मांग चुनावी प्रक्रिया से बाहर निकलकर जनदबाव, सड़कों में अराजकता और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास के जरिए करने का प्रयास किया जाए?
इस सवाल को केवल किसी नारे, किसी टीशर्ट, किसी यूट्यूबर के बयान या किसी राजनीतिक नेता के भाषण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। असली तस्वीर तब सामने आती है, जब इन सभी घटनाओं को कड़ी दर कड़ी जोड़ा जाता है। अक्टूबर के पहले पखवाड़े में दिल्ली और दूसरे शहरों में हुए प्रदर्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग, मतदाता सूची से लगभग नाम हटाए जाने की खबरों पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की एकतरफ़ा रिपोर्ट, वामपंथी संगठनों की सक्रियता और कांग्रेस के नेताओं का आंदोलन के समर्थन में सामने आना, ये सभी घटनाएं रिज़िम चेंज के षड्यंत्र का हिस्सा बन चुकी हैं।
वन पीस की टीशर्ट केवल फैशन नहीं, राजनीतिक प्रतीकों की बदलती भाषा भी है
10 अक्टूबर को दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के विरुद्ध आयोजित प्रदर्शन में रेडिकल कम्युनिस्ट संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा लाल रंग की वन पीस टीशर्ट में दिखाई दीं। टीशर्ट पर जापानी मंगा और एनीमे श्रृंखला One Piece से जुड़ा समुद्री डाकुओं का प्रतीक था। इसके बाद इस टीशर्ट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गईं।
वन पीस का जॉली रोजर प्रतीक नेपाल, इंडोनेशिया और अन्य देशों के रिज़िम चेंज प्रदर्शनों में भी दिखाई दिया है। इन आंदोलनों में ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल स्थापित सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध और युवाओं की असंतुष्टि व्यक्त करने के लिए किया गया।
नेपाल के युवा प्रदर्शनों में इस प्रतीक की मौजूदगी और भारत में इसी प्रतीक के साथ एक राजनीतिक आंदोलन के वामपंथी चेहरे का सामने आना अपने आप में यह दिखाता है कि इनकी वास्तविक मंशा क्या है।
बांग्लादेश का संदर्भ
भारत में चल रहे वर्तमान "रिज़िम चेंज" प्रोजेक्ट की राजनीति को समझने के लिए बांग्लादेश का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। 2024 में बांग्लादेश में भी "रिज़िम चेंज" आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार के पतन में निर्णायक भूमिका निभाई। इसे छात्र आंदोलन कहा गया था, जैसे भारत में भी कहा जा रहा है। इस घटनाक्रम को दुनिया भर में युवाओं, विशेषकर जेनजी की राजनीतिक शक्ति, शासन के खिलाफ असंतोष और सत्ता परिवर्तन की क्षमता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया।
अब हार्ड्कोर कम्युनिस्ट नेता नेहा बोरा ने भी बांग्लादेश के "रिज़िम चेंज" आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही है। ऐसे बयान को केवल एक सामान्य टिप्पणी समझकर छोड़ देना उस व्यापक राजनीतिक संदर्भ की अनदेखी होगी जिसमें यह दिया गया है। जब कोई आंदोलन दूसरे देश की सत्ता परिवर्तन की घटना को प्रेरणा के रूप में सामने रखता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि वह इस आंदोलन से क्या चाहता है।
बांग्लादेश का घटनाक्रम किसी एक नारे या एक दिन की घटना तक सीमित नहीं था। उसमें लंबे समय से आरक्षण व्यवस्था को लेकर विवाद, छात्र संगठनों की लामबंदी, व्यापक विरोध प्रदर्शन और सत्ता के साथ टकराव शामिल थे। सरकार के पतन के बाद देश में हिंसा और हिंदुओं के साथ अत्याचार को लेकर भी कई घटनाएँ सामने आईं।
भारत के संदर्भ में यह दिख रहा है कि नेपाल और बांग्लादेश के "रिज़िम चेंज" आंदोलनों के प्रतीकों और सत्ता परिवर्तन के उदाहरणों लगातार राजनीतिक अभियान में इस्तेमाल किया जा रहा है। जब एक तरफ बांग्लादेश के आंदोलन को प्रेरणा बताया जाता है और दूसरी तरफ भारत में संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के इस्तीफे से आगे बढ़कर "रिज़िम चेंज" की भाषा सामने आती है, तब इन दोनों बातों को एक साथ देखना जरूरी है।
प्रशांत भूषण का बयान
इस बीच 15 अक्टूबर को दिल्ली में CJP और उससे जुड़े संगठनों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रशांत भूषण ने कहा, “From here I am saying, youth will lead us in the change of regime. This is a fight for regime change.” क्या आपको अब भी लगता है कि इनके इस आंदोलन का राजनीतिक उद्देश्य केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक सीमित है? भूषण ने स्पष्ट शब्दों में इसे तख़्तापलट की लड़ाई कहा है।
अब सोचिए कि इतने दिनों से हमें यह दिखाया जा रहा है कि यह आंदोलन चुनाव आयुक्त के फैसले, मतदाता सूची की प्रक्रिया या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर है। लेकिन अब इसी आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा, और मुख्य सलाह देने वाला ख़ुद सार्वजनिक रूप से "रिज़िम चेंज" को घोषित लक्ष्य के रूप में सामने रखता है, तब यह समझना आवश्यक है कि यह केवल और केवल "रिज़िम चेंज" के लिए किया जा रहा है।
इस पूरे अभियान में वामपंथी संगठनों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। AISA, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) से जुड़े हार्ड्कोर मार्क्सवादी-माओवादी नेताओं की मौजूदगी भी बताती है कि कैसे लोकतंत्र विरोधियों का बड़ा जमावड़ा भी लगा हुआ है।
ध्रुव राठी की संस्थाओं के भीतर असंतोष की खतरनाक अपील
ध्रुव राठी का CJP का पहले दिन से प्रचार करना और फिर CJP के नेतृत्व में हुए बेंगलुरु प्रदर्शन में शामिल होना और उसके बाद सेना को "रिज़िम चेंज" के लिए अपील करना, यह भी उसी कड़ी का हिस्सा है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना और पुलिस की भूमिका स्पष्ट संवैधानिक तथा कानूनी सीमाओं से निर्धारित होती है। लेकिन किसी विशेष राजनीतिक संघर्ष में इन संस्थाओं को इस तरह संबोधित करना कि वे राजनीतिक नेतृत्व के बजाय आंदोलन के दावों के आधार पर अपनी भूमिका तय करें, यह एक ख़तरनाक नैरेटिव है।
फैसला सड़कों पर होगा
भारतीय राजनीति में सड़कें हमेशा से आंदोलनों का महत्वपूर्ण स्थल रही हैं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक, जन प्रदर्शनों ने राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। लेकिन सड़कों पर संघर्ष की भाषा और संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करने की भाषा के बीच अंतर भी जरूरी है।
जब योगेन्द्र यादव जैसे कम्युनिस्ट नेता कहते हैं कि अब फैसला सड़कों पर होगा, संसद सड़क से चलेगी, तब यह स्पष्ट होना चाहिए कि वे किस प्रकार के फैसले की बात कर रहे हैं। क्या उनका आशय है कि निर्वाचित सरकार का भविष्य चुनाव के बजाय सड़क पर शक्ति प्रदर्शन से निर्धारित होना चाहिए?
ज्ञानेश कुमार को ‘ज्ञानू’ कहना और संवैधानिक पदों की सार्वजनिक छवि
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए ‘ज्ञानू’ जैसे उपनामों का इस्तेमाल और उनके खिलाफ व्यक्तिगत कटाक्ष एक बड़ा उदाहरण है। जब किसी पदाधिकारी की कार्यप्रणाली पर बहस करने के बजाय उसका सार्वजनिक उपहास ही राजनीतिक अभियान का केंद्रीय हिस्सा बनने लगे, तब उसका प्रभाव व्यक्ति से आगे बढ़कर संस्था की प्रतिष्ठा पर भी पड़ सकता है।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता किसी एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा से बड़ी है। यदि आयोग के किसी फैसले पर सवाल हैं, तो उन पर दस्तावेजों, आंकड़ों, कानूनी प्रक्रियाओं और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बहस होनी चाहिए। लेकिन यदि जनता के बीच यह धारणा लगातार बनाई जाती है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग केवल राजनीतिक विरोध के पात्र हैं, तो संस्थाओं के प्रति विश्वास कमजोर पड़ सकता है।
मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ‘सेलआउट’ या ‘समझौता कर चुके’ जैसे आरोपों का इस्तेमाल भी इसी व्यापक "रिज़िम चेंज" प्रोजेक्ट का हिस्सा है। यह समझना जरूरी है कि संस्थाओं की आलोचना और संस्थाओं को जनता की नजर में अप्रासंगिक बना देने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं हैं।
असली लड़ाई नैरेटिव की है
राजनीति में सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी गणित से नहीं होता। उसके लिए जनता के बीच विश्वास, असंतोष, उम्मीद और व्यवस्था के प्रति धारणा का निर्माण भी आवश्यक होता है। किसी सरकार को कमजोर करने की राजनीतिक रणनीति का एक हिस्सा यह हो सकता है कि उसके फैसलों की आलोचना की जाए। लेकिन जब संस्थाओं की विश्वसनीयता, सुरक्षा बलों की भूमिका, विदेशी आंदोलनों के प्रतीक और सड़क पर शक्ति प्रदर्शन की भाषा एक ही सार्वजनिक विमर्श में शामिल होने लगें, तब उस पूरे घटनाक्रम को व्यापक राजनीतिक नजरिए से देखना आवश्यक हो जाता है।
भारत में आज जो दिखाई दे रहा है, उसे केवल एक प्रदर्शन या एक नेता के बयान तक सीमित नहीं किया जा सकता। CJP का विस्तार, वामपंथी संगठनों की भागीदारी, कांग्रेस की सत्ता विरोधी राजनीति, नेहा बोरा की प्रतीकात्मक प्रस्तुति और प्रशांत भूषण का "रिज़िम चेंज" वाला बयान मिलकर बता रहे हैं कि यह एक तख़्तापलट का प्रोजेक्ट है।