
दीपावली हिंदू समाज का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह केवल पूजा, दीप जलाने और परिवार के साथ उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका से भी जुड़ा हुआ पर्व है। बाजारों में रौनक आती है, व्यवसायी पूरे वर्ष इस मौसम का इंतजार करते हैं, कारीगरों को काम मिलता है, छोटे कारोबारियों की बिक्री बढ़ती है और असंगठित क्षेत्र के लाखों श्रमिकों को अतिरिक्त रोजगार मिलता है। 
ऐसे समय में जब देश का व्यापारी वर्ग अपनी दुकानों को सजाने, माल जुटाने और ग्राहकों का स्वागत करने की तैयारी कर रहा हो, तब दिल्ली में कांग्रेस द्वारा बड़े राजनीतिक प्रदर्शन का आह्वान ना सिर्फ़ इन्हें चिंतित कर रहा है, बल्कि कांग्रेस की वास्तविक मंशा पर भी प्रश्न उठ रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रस्तावित रैली को लेकर व्यापारियों की आपत्ति भी सामने आई है।

दिल्ली के चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने कांग्रेस नेतृत्व से प्रस्तावित रैली को दीपावली के बाद आयोजित करने का आग्रह किया है। व्यापारियों की चिंता का कारण स्पष्ट है। रामलीला मैदान के आसपास चांदनी चौक, सदर बाजार, चावड़ी बाजार, खारी बावली, कश्मीरी गेट और करोल बाग जैसे बड़े व्यापारिक केंद्र हैं। इन बाजारों में केवल दिल्ली के स्थानीय ग्राहक ही नहीं आते, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी और खरीदार भी खरीदारी करने पहुंचते हैं। त्योहार के दिनों में यातायात प्रतिबंध, बैरिकेडिंग, सड़कों पर भीड़ और सार्वजनिक परिवहन में संभावित व्यवधान इन बाजारों तक पहुंचना मुश्किल बना सकते हैं। इसी को देखते हुए व्यापारियों के संगठन ने कांग्रेस से रैली को 10 नवंबर के बाद आयोजित करने का अनुरोध किया है। संगठन ने आशंका जताई है कि प्रस्तावित कार्यक्रम से लगभग 10,000 करोड़ रुपये के व्यापार पर असर पड़ सकता है।

वास्तव में देखें तो आखिर एक व्यवसायी के लिए दीपावली का पर्व क्या मायने रखता है? किसी ने उधार लेकर माल खरीदा है, किसी ने कर्मचारियों को अतिरिक्त वेतन देने की तैयारी की है, किसी ने दुकान की सजावट पर पैसा खर्च किया है और किसी ने इस उम्मीद में पूंजी लगाई है कि त्योहार की बिक्री से उसके परिवार का खर्च निकलेगा। छोटे व्यापारियों के लिए यह केवल लाभ का मौसम नहीं, बल्कि साल भर की आर्थिक चुनौतियों से उबरने का अवसर भी होता है। ऐसे में यदि कांग्रेस के आंदोलन के कारण ग्राहक ही बाजार तक नहीं पहुंचेंगे तो नुकसान केवल बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों का नहीं होगा, बल्कि इसका असर छोटी दुकानों, ठेला लगाने वालों, परिवहनकर्मियों, गोदामों में काम करने वाले श्रमिकों और दूसरे छोटे कारोबारों तक भी पहुंचेगा।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व के लिए राजनीतिक प्रदर्शन व्यापारियों की आजीविका से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है? यदि आंदोलन की तारीख बदली जा सकती है, तो देश के सबसे पड़े हिंदू पर्व दीपावली के बाद उसे आयोजित करने में क्या कठिनाई है? क्या कांग्रेस को अपनी रणनीति तय करते समय आम नागरिकों की रोजी-रोटी और दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का विचार नहीं करना चाहिए?
व्यापारियों की मांग सीधी थी कि दीपावली के व्यस्त खरीदारी वाले दिनों में ऐसी रैली न हो, जिससे बाजारों तक पहुंच बाधित हो सकती है। इसके जवाब में विवाद को मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग से जोड़ दिया गया। इससे व्यापारियों के सामने एक अजीब स्थिति बनती दिखाई देती है। वे अपने व्यापार की सुरक्षा और सामान्य बाजार व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, जबकि कांग्रेस नेतृत्व उनसे एक अलग राजनीतिक मांग के समर्थन की अपेक्षा करता दिखाई देता है। यह कुल मिलाकर राजनीतिक ब्लैकमेलिंग की तरह है।

भारत में दीपावली का आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व एक-दूसरे से अलग नहीं है। मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों से लेकर मिठाई की दुकानों, कपड़ा व्यापारियों, आभूषण विक्रेताओं, इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारियों, सजावट का सामान बेचने वालों और छोटे दुकानदारों तक, एक विस्तृत आर्थिक श्रृंखला इस त्योहार से जुड़ी होती है। अनेक परिवारों के लिए दीपावली की बिक्री साल के सबसे महत्वपूर्ण कारोबारी अवसरों में से एक है।

इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस की बदलती वैचारिक दिशा को भी समझा जा सकता है। राहुल गांधी की राजनीति पिछले एक दशक में लगातार वामपंथी और कम्युनिस्ट विचारधारा के करीब जाती दिखाई देती है। इसीलिए यह वर्तमान विवाद भी एक रैली की तारीख तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें आंदोलन और टकराव खड़ा की रणनीति दिखाई देती है।

राहुल गांधी सहित कांग्रेस की नई मानसिकता माओवादी और कम्युनिस्ट विचारों से प्रभावित हो चुकी है। राजनीतिक संघर्ष के नाम पर आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने और सामान्य नागरिकों की परेशानियों को अनदेखा करने वाली राजनीति कम्युनिस्ट राजनीति का ही हिस्सा है। अब बात यही है कि यदि कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही है, तो क्या उसके राजनीतिक विरोध की कीमत अब आम जनता ही चुकाएगी? क्या व्यापारी अपनी दुकान खोलने से पहले यह सोचें कि कहीं कम्युनिस्ट बन चुकी कांग्रेस का आंदोलन उनके ग्राहक छीन न ले? क्या त्योहारों के दौरान भी आम नागरिकों को कांग्रेस के शक्ति प्रदर्शन के कारण यातायात और बाजारों की परेशानियां झेलनी चाहिए?
भारत में कम्युनिस्ट राजनीति का आधार ही व्यवसाय और व्यवसायियों के विरोध का रहा है। इस देश ने कम्यूनिस्टों के कारण अनगिनत हड़ताल, बंद और विरोध प्रदर्शनों को देखा है। इसके ही कारण भारत में लम्बे समय तह निवेश और रोज़गार के अवसरों की कमी बनी रही। और आज कांग्रेस खुलकर देश के सबसे बड़े हिंदू पर्व के पहले उसी कम्युनिस्ट एजेंडे के साथ भारतियों व्यापारियों को नुक़सान पहुँचने के लिए आ चुकी है।

इस विवाद के बीच एक दूसरा घटनाक्रम भी गंभीर चिंता पैदा करता है। राहुल गांधी के सहयोगी और इंडी गठबंधन की प्रमुख पार्टी शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने अल्बानिया में सर्वोच्च न्यायालय को जलाए जाने और सरकारी संस्थानों पर हमलों से संबंधित पोस्ट सोशल मीडिया पर साझा किया।
संजय राउत की पोस्ट में अल्बानिया की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया कि भ्रष्ट प्रधानमंत्री की मदद करने के कारण जनता ने सर्वोच्च न्यायालय को जला दिया और संसद, सरकारी कार्यालयों तथा मंत्रियों के घरों पर भी हमले किए। पोस्ट में अन्य देशों, विशेषकर भारत, को इन घटनाओं से सबक लेने की बात कही गई। अब यह सोचिए कि जो भारत का सर्वोच्च न्यायालय लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, उसे जलाने की बात की जा रही है, यह कितना सही है?

संजय राउत की पोस्ट के बाद एक और प्रश्न उठता है। जब सार्वजनिक जीवन में सर्वोच्च न्यायालय को जलाने जैसे राजनीतिक संदेश दिए जा रहे हैं, तो क्या हिंसा की भाषा को सामान्य मान लेने का खतरा नहीं बढ़ता? क्या कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को यह स्पष्ट नहीं करना चाहिए कि आगजनी, संस्थाओं पर हमला और हिंसक भीड़तंत्र लोकतंत्र का विकल्प नहीं हैं? राहुल गांधी और उनके सहयोगियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे राजनीतिक विरोध को किस सीमा तक ले जाने के पक्ष में हैं?