बाबा बन्दा सिंह बैरागी: वैराग्य से वीरता और बलिदान तक

पंजाब में मुगल सत्ता को चुनौती देने वाले बन्दा सिंह बहादुर ने कैद और यातनाओं के बीच भी अपना धर्म नहीं छोड़ा। उनके जीवन में वैराग्य, संघर्ष और बलिदान की गहरी छाप है।

The Narrative World    29-Oct-2026
Total Views |
FEATURED IMAGE - Baba Banda Singh Bairagi From renunciation to bravery and sacrifice (1)
 
कभी गोदावरी के किनारे आश्रम में रहने वाले माधोदास बैरागी आगे चलकर बन्दा सिंह बहादुर के नाम से जाने गए। पंजाब में उन्होंने सिख सैनिकों का नेतृत्व किया और मुगल सत्ता को चुनौती दी। 1715 में बंदी बनाए जाने के बाद उन्हें दिल्ली लाया गया, जहाँ अगले वर्ष यातनाएँ देकर उनकी जबरन हत्या कर दी गई, लेकिन फिर भी अंत तक उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा।
 
1708 में नांदेड़ में गुरु गोविन्द सिंह से मिलने के बाद माधोदास बैरागी ने अन्याय के खिलाफ हथियार उठाए। बन्दा सिंह बहादुर के रूप में उन्होंने पंजाब में सिख सैनिकों का नेतृत्व किया और मुगल सत्ता को चुनौती दी। 1716 में दिल्ली में यातनाएँ देकर उनकी हत्या कर दी गई, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा।
 
बाबा बन्दा सिंह बैरागी का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के तहसील राजौरी क्षेत्र में, ग्राम तच्छल मे विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (27 अक्तूबर, 1670 ई.) को क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव मिन्हास था वह 15 वर्ष की उम्र के थे तब उनके हाथों से एक गर्भवती हिरणी के शिकार करने हेतु उनहोने तीर चलाया, बस इसी घटनाने उन्हे अत्यंत शोक में डाल दिया।
 
जब उन्होंने देखा की हिरनी के साथ उसका गर्भ भी मारा गया था। इस घटना का उनके मन में गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपना घर का त्याग कर दिया, वह जानकी दास नाम के एक साधु के शिष्य हो गए तदन्तर उन्होंने एक अन्य बाबा रामदास का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे।
 
वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र चले गए जहाँ गोदावरी के तट पर उन्होंने एक आश्रम की स्थापना की। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। इसी दौरान गुरु गोविन्दसिंह जी का माधोदास की कुटिया में आना हुआ।
 
उनके चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। उन्होंने इस कठिन समय में माधोदास से वैराग्य छोड़कर देश में व्याप्त आतंक से जूझने को कहा। इस भेंट से माधोदास का जीवन बदल गया। गुरुजी ने उसे बन्दा बहादुर नाम दिया। फिर पांच तीर, एक निशान, साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर दोनों छोटे पुत्रों को दीवार में चिनवाने वाले सरहिन्द के नवाब से बदला लेने को कहा।
 
बन्दा हजारों सिख सैनिकों को साथ लेकर पंजाब की ओर चल दिये। उन्होंने सबसे पहले श्री गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने वाले जल्लाद जलालुद्दीन का सिर काटा। फिर सरहिन्द के नवाब वजीरखान का वध किया। जिन हिन्दू राजाओं ने मुगलों का साथ दिया था, बन्दा बहादुर ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। इससे चारों ओर उनके नाम की धूम मच गयी।
 
उनके पराक्रम से भयभीत मुगलों ने दस लाख फौज लेकर उन पर हमला किया और विश्वासघात से 17 दिसंबर, 1715 को उन्हें पकड़ लिया। मार्च 1715 में, लाहौर के मुगल गवर्नर अब्द अल-समद खान के नेतृत्व वाली सेना ने बंदा बहादुर और सिख सैनिकों को पंजाब के गुरदासपुर शहर से 6 किमी पश्चिम में स्थित गुरदास नंगल गाँव की ओर खदेड़ दिया और उस गाँव को चारों तरफ से घेर लिया।
 
सिखों ने बहुत कठिन परिस्थितियों में आठ महीने तक उस छोटे से किले की रक्षा की, लेकिन 7 दिसंबर 1715 को मुगल सेना भूखे-प्यासे सिखों के इस ठिकाने में घुस गई और बंदा सिंह तथा उनके साथियों को बंदी बना लिया।
 
उन्हें लोहे के एक पिंजड़े में बन्द करके हाथी के उपर लादकर सड़क मार्ग से दिल्ली लाया गया। उनके साथ हजारों सिख भी कैद किये गये थे। इनमें बन्दा के वे 740 साथी भी थे, जो प्रारम्भ से ही उनके साथ थे। युद्ध में वीरगति पाए सिखों के सिर काटकर उन्हें भाले की नोक पर टांगकर दिल्ली लाया गया। रास्ते भर गर्म चिमटों से बन्दा बैरागी का मांस नोचा जाता रहा।
 
काजियों ने बन्दा और उनके साथियों को मुसलमान बनने को कहा; पर सबने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। एक दरबारी मुहम्मद अमीन ने पूछा - तुमने ऐसे बुरे काम क्यों किये, जिससे तुम्हारी यह दुर्दशा हो रही है ? बन्दा ने सीना फुलाकर सगर्व उत्तर दिया - मैं तो प्रजा के पीड़ितों को दण्ड देने के लिए परमपिता परमेश्वर के हाथ का शस्त्र था। क्या तुमने सुना नहीं कि जब संसार में दुष्टों की संख्या बढ़ जाती है, तो वह मेरे जैसे किसी सेवक को धरती पर भेजता है।
 
बन्दा से पूछा गया कि वे कैसी मौत मरना चाहते हैं? बन्दा ने उत्तर दिया, मैं अब मौत से नहीं डरता, क्योंकि यह शरीर ही दुःख का मूल है। बंदा सिंह बहादुर को एक लोहे के पिंजरे में डाल दिया गया और बाकी सिखों को जंजीरों से जकड़ दिया गया। लोगों में दहशत फैलाने के लिए, इन सिखों को एक जुलूस के रूप में दिल्ली लाया गया था और उन पर अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बनने के लिए दबाव डाला गया। जब उन्होंने साफ तौर पर ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो उन्हें मौत की सजा देने का आदेश दिया गया।
 
हर दिन 100 सिख सैनिकों को किले से बाहर निकालकर सबके सामने मार दिया जाता था (यह जगह आज की हार्डिंग लाइब्रेरी के पास है)। यह सिलसिला लगभग सात दिनों तक चलता रहा। इसके बाद, बंदा बहादुरके बेटे को लाकर उनकी गोद मे रखकर तलवार दी गई और उनसे कहा गया कि वह अपने चार साल के बेटे, अजय सिंह को मार डाले, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया।
 
तब, अजय सिंह को उनके सामने ही मार डाला गया, उसका दिल निकालकर बंदा बहादुर के मुँह में जबरजस्ती ठूँस दिया गया। इतनी भयानक त्रासदी के बावजूद, बंदा बहादुर का संकल्प नहीं टूटा; इसके बाद उन्हें अकल्पनीय यातनाएं दी गईं।
 
9 जून 1716 को, बंदा सिंह की आँखें निकाल ली गईं, उनके अंग काट दिए गए, उनकी खाल उतार दी गई और अंत में उन्हें हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया गया। इस प्रकार वीर बन्दा बैरागी अपने नाम के तीनों शब्दों को सार्थक कर बलिदान के पथ पर चल दिए।
 
 
भारतकी युवा पीढ़ी को शायद ही ऐसे बलिदानों के बारेमे और मातृभूमि की वेदी पर अपना शीश चढाने वाले वीरों के बारेमे पढ़ाया ही नहीं जाता।
 
लेख
 
श्रुति अनेराव