सऊदी अरब ने 14 अक्टूबर 2026 को मक्का में अनिर्दिष्ट ‘अनैतिक कृत्य’ के लिए दो बांग्लादेशियों का मृत्युदंड लागू किया; आरोपों का विवरण और बांग्लादेश को अग्रिम सूचना न मिलने से पारदर्शिता पर प्रश्न उठे।
14 अक्टूबर 2026 को सऊदी अरब ने मक्का की एक मस्जिद में कथित तौर पर 'गले मिलने' के आरोप में दो बांग्लादेशी नागरिकों-नजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर और सीती अख्तर-को फांसी दे दी। सऊदी गृह मंत्रालय के अनुसार, अदालत ने ताज़ीर के तहत मौत की सजा सुनाई, जिसे उच्च अदालत और शाही आदेश से लागू किया गया। बांग्लादेश को पूर्व सूचना नहीं दी गई। सटीक कृत्य सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया; सोशल मीडिया पर गले मिलने या चूमने की बात बताई गई, पर आधिकारिक बयान मस्जिद की पवित्रता के उल्लंघन पर जोर देता है।
लेकिन आधिकारिक बयान नहीं बताता कि पवित्रता का उल्लंघन कैसे हुआ? इक्कीसवीं सदी में वामपंथी खेमे में खड़े कई सौ की संख्या में मुसलमानों के बीच किसी ने एक ने इस घटना पर दो शब्द नहीं कहा। बात बात पर अपनी प्रतिक्रिया देने वाली साईमा हो या शेरवानी। गौहर रजा हो या शबाना आजमी। किसी ने कुछ नहीं कहा।
भारत में वामपंथी और कट्टर स्त्रीवादी खेमा भी इस पर लगभग मौन है। वही लोग जो हिंदू समाज के छोटे-से मुद्दे-गरबा में मुस्लिम लड़कियों की भागीदारी, वंदे मातरम का विरोध (क्योंकि इसमें भारत माता की वंदना है), या किसी मंदिर-उत्सव में 'सांस्कृतिक वर्चस्व' का आरोप-पर सड़कों पर उतर आते हैं, सऊदी की इस सख्त शरीयत-आधारित कार्रवाई पर चुप हैं। Kiss of Love जैसी मुहि में हिंदू लड़के-लड़कियों को निशाना बनाती रही हैं, लेकिन सऊदी पर बोलने की उनकी भी हिम्मत नहीं। फिलिस्तीन पर रोज़ भाषण देने वाले, 'महिला अधिकार' और 'मानवता' का झंडा उठाने वाले अब सन्नाटा ओढ़े बैठे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही चुप्पी है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन-जो किसी भी अन्य देश में मौत की सजा, 'अन्याय' या 'मानव अधिकार हनन' पर तुरंत प्रेस रिलीज, रिपोर्ट और अभियान चला देते हैं - इस मामले में कहीं नजर नहीं आ रहे। सऊदी में हर साल सैकड़ों फांसियां होती हैं, जिनमें से कई गैर-घातक अपराधों या ताजीर के मनमाने इस्तेमाल से जुड़ी होती हैं, फिर भी इस विशिष्ट घटना पर उनकी सक्रियता गायब है। जब मामला पश्चिमी या 'प्रगतिशील' एजेंडे से मेल खाता हो तो शोर मचता है; जब इस्लामी रूढ़िवाद या खाड़ी देशों की शरीयत व्यवस्था हो तो 'सांस्कृतिक सापेक्षता' का तर्क तैयार रहता है।
उल्लेखनीय है कि आ रहे समाचार में आरोपी महिला गर्भवती बताई जा रही है। जिस बच्चे ने अभी यह दुनिया देखी भी नहीं है। उसे किस अपराध की सजा दी जा रही है? संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को इस पर विचार करना चाहिए।
यह चुप्पी आकस्मिक नहीं। दशकों से वामपंथी और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नेटवर्क नैरेटिव पर कब्जा इसलिए बनाए रखते हैं क्योंकि वे जानते हैं कब बोलना है और कब खामोश रहना है। मुद्दा मानवता या स्त्री-अधिकार नहीं, बल्कि किस समुदाय और किस राजनीतिक एजेंडे को फिट करता है, बस इतना ही। सऊदी की घटना उनकी चयनात्मक नैतिकता की पोल खोलती है।
लेख
आशीष कुमार अंशु