बस्तर में मंदिर के खुले कपाट और सिलाई सीखती महिलाओं के हाथ स्थानीय जीवन में नई उम्मीद की तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स ने सितंबर 2026 में क्षेत्र का भ्रमण कर ग्रामीणों से बातचीत की और इन बदलावों को करीब से देखा।
कंटेंट क्रिएटर्स ने सुकमा, जगरगुंडा, केरलापेंदा और पूवर्ती की यात्रा की। इस भ्रमण में ग्रामीण जीवन, आस्था और स्थानीय परिस्थितियों में बदलाव से जुड़े अनुभव सामने आए।
अप्रैल 2024 में फिर खुले थे श्रीराम मंदिर के कपाट
सुकमा जिले के केरलापेंदा गांव का श्रीराम मंदिर लगभग 21 वर्ष बंद रहने के बाद अप्रैल 2024 में दोबारा खुला था। वर्ष 2003 में माओवादी दबाव के कारण यहां पूजा रोक दी गई थी।
ग्रामीणों की इच्छा और सुरक्षा बलों के सहयोग से मंदिर की सफाई हुई तथा श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा दोबारा शुरू हुई। उस समय की समाचार रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों की पहल और सीआरपीएफ के सहयोग का उल्लेख है।
सितंबर 2026 के भ्रमण में डिजिटल क्रिएटर्स इस मंदिर तक पहुंचे और ग्रामीणों से क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों के बारे में जाना। मंदिर का खुलना स्थानीय लोगों के लिए अपने सामुदायिक और धार्मिक जीवन से फिर जुड़ने का अवसर बना।
पूवर्ती में ग्रामीण जीवन से परिचय
केरलापेंदा के बाद डिजिटल क्रिएटर्स छत्तीसगढ़ के पूवर्ती गांव पहुंचे। यहां क्रिएटर्स ने माओवादी कमांडर माडवी हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से मुलाकात की।
बातचीत में गांव की वर्तमान परिस्थितियों और स्थानीय जीवन को समझने पर ध्यान दिया गया। दूरस्थ गांव में पहुंचकर लोगों से सीधे संवाद करने से डिजिटल क्रिएटर्स को बस्तर के सामाजिक जीवन को करीब से जानने का अवसर मिला।
कौन था माडवी हिडमा?
माडवी हिडमा प्रतिबंधित माओवादी का प्रमुख सैन्य कमांडर था। उसका जन्म सुकमा जिले के पूवर्ती गांव में हुआ था। वह स्थानीय मुरिया जनजातीय समुदाय से आता था और धीरे-धीरे माओवादी संगठन के शीर्ष सैन्य नेतृत्व तक पहुंचा। बाद में वह संगठन की केंद्रीय समिति का सदस्य तथा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का प्रमुख बना।
हिडमा का बस्तर में सुरक्षा बलों पर हुए कई बड़े माओवादी हमलों से जुड़ा रहा। आंध्र प्रदेश पुलिस के साथ 18 नवंबर 2025 को अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मार्रेडुमिल्ली वन क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में हिडमा मारा गया था। उसके साथ उसकी पत्नी राजे उर्फ राजक्का और अन्य माओवादी भी एनकाउंटर में मारे गए थे।
महिलाओं का हुनर, आत्मनिर्भरता की ओर कदम
नेतानार स्थित शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा में क्रिएटर्स ने महिलाओं के लिए संचालित सिलाई-कढ़ाई और स्वरोजगार प्रशिक्षण गतिविधियां देखीं। उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त कर रही महिलाओं से उनके अनुभवों के बारे में बातचीत की।
इन गतिविधियों का उद्देश्य महिलाओं को ऐसा हुनर सिखाना है, जिसे वे रोजगार और परिवार की आय में योगदान देने का माध्यम बना सकें। सिलाई मशीनों पर काम सीखती महिलाएं स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भर बनने के प्रयासों की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।
नेतानार में क्रिएटर्स ने वीर गुंडाधुर के योगदान और बस्तर की ऐतिहासिक विरासत के बारे में भी जानकारी ली। इस तरह यात्रा में आजीविका के प्रयासों के साथ स्थानीय इतिहास से परिचय का अवसर भी मिला।
डिजिटल माध्यमों से सामने आएंगी स्थानीय कहानियां
भ्रमण के दौरान क्रिएटर्स ने तस्वीरें, वीडियो और अन्य डिजिटल सामग्री तैयार की। इनके माध्यम से बस्तर की संस्कृति, ग्रामीण जीवन और महिलाओं के हुनर से जुड़ी कहानियां व्यापक दर्शकों तक पहुंच सकती हैं।
केरलापेंदा में फिर शुरू हुई पूजा, पूवर्ती में ग्रामीणों से संवाद और नेतानार में कौशल सीखती महिलाएं इस यात्रा के प्रमुख अनुभव रहे। ये प्रयास बस्तर में सामुदायिक जीवन और स्थानीय अवसरों को मजबूत करने की दिशा में उम्मीद जगाते हैं।
‘बस्तर की नई पहचान - शांति, संस्कृति, पर्यटन और आत्मनिर्भरता’
बस्तर की कहानी अब केवल उसके कठिन अतीत तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र हमारी जनजाति संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय प्रतिभाओं के साथ विकास की नई संभावनाओं की ओर बढ़ रहा है। नेतानार में महिलाओं का हुनर इसी परिवर्तन का एक मानवीय चेहरा है।
दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स का यह भ्रमण इसी बदलते बस्तर को करीब से देखने का अनुभव है। उनके कैमरों में कैद तस्वीरों में जहां बस्तर की ऐतिहासिक विरासत दिखाई दे रही है, वहीं महिलाओं के हाथों में चलती सिलाई मशीनें उस नए बस्तर की कहानी भी कह रही है, जो शांति के वातावरण में आत्मनिर्भरता और विकास की नई राह तलाश रहा है।
बस्तर के लिए यह बदलाव केवल एक नई खबर नहीं, बल्कि एक नई पहचान गढ़ने की प्रक्रिया है। ऐसी पहचान जिसमें इतिहास की विरासत, संस्कृति की समृद्धि, प्रकृति की खूबसूरती, शांति का वातावरण और आत्मनिर्भरता की उम्मीद एक साथ दिखाई देती है।
लेख
गीतांजलि नाएक
इंटर्न, द नैरेटिव