
भारत में लोकतांत्रिक असहमति का अधिकार संविधान की आधारभूत संरचना का हिस्सा है। सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन हो सकते हैं, चुनाव आयोग के विरुद्ध सवाल उठाए जा सकते हैं और न्यायपालिका के निर्णयों की आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की यही स्वतंत्रता उस समय एक गंभीर प्रश्न में बदल जाती है, जब सड़क पर खड़ी भीड़ को न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगे।
अक्टूबर 2026 में चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चल रहे विषय के बीच सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने इसी प्रश्न को एक बार फिर सामने ला दिया है। बीते 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों में अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या भागीदारी का पालन नहीं हुआ।
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने या चुनाव आयोग को कोई अंतरिम निर्देश देने से इनकार किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र, चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार और अन्य संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा।

न्यायालय ने साफ किया कि वह केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर आदेश पारित नहीं कर सकती। पहले रिकॉर्ड देखे जाएंगे, पक्षों के जवाब लिए जाएंगे और फिर यह निर्धारित किया जाएगा कि संबंधित फैसले कानून के अनुसार लिए गए थे या नहीं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि "अदालत को अंतरिम आदेश देना चाहिए, अन्यथा देश जल जाएगा।"
अब प्रश्न यह उठता है कि यदि हर संवैधानिक संस्था के सामने किसी फैसले के पहले यह तर्क खड़ा किया जाने लगे कि यदि निर्णय अपेक्षित दिशा में नहीं गया तो राजनीतिक अस्थिरता होगी, विरोध बढ़ेगा या देश में अशांति फैल जाएगी, तो धीरे धीरे कानून की जगह परिणाम का भय लेने लगता है।

यही वह बिंदु है जहां “Mobocracy” अर्थात भीड़तंत्र का विचार सामने आता है। Mobocracy का अर्थ केवल बड़ी भीड़ नहीं है। बड़ी भीड़ लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा हो सकती है। Mobocracy तब बनती है जब भीड़ की संख्या, राजनीतिक लामबंदी, दबाव और संभावित अशांति को निर्णय लेने वाली संवैधानिक संस्था के सामने इस तरह रखा जाए कि संस्था के लिए कानूनी प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण यह हो जाए कि उसके निर्णय का सड़क पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
लोकतंत्र में जनता की आवाज महत्वपूर्ण है, लेकिन न्यायालय का काम जनमत सर्वेक्षण करना नहीं है। न्यायालय को यह तय नहीं करना है कि किस पक्ष के पीछे कितने लोग खड़े हैं। उसे यह देखना है कि कानून क्या कहता है, संविधान क्या अनुमति देता है और रिकॉर्ड में क्या प्रमाण मौजूद हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने वर्ष 2020 में न्यायपालिका पर बाहरी दबाव और न्यायाधीशों की मंशा पर राजनीतिक आरोप लगाने के खतरे को लेकर इसी तरह की चिंता व्यक्त की थी।
उन्होंने कहा था कि किसी फैसले की आलोचना की जा सकती है और किसी न्यायाधीश से असहमति भी हो सकती है, लेकिन किसी न्यायाधीश के निर्णय को राजनीतिक मंशा से जोड़ देना गलत है। उन्होंने यह भी चिंता जताई थी कि यदि किसी वकील या पक्षकार को यह लगने लगे कि न्यायाधीश इस कारण फैसला नहीं दे रहे हैं कि अखबार क्या लिखेंगे या बाहर कैसी प्रतिक्रिया होगी, तो यह चिंताजनक स्थिति होगी।
यह बात वर्तमान विवाद में भी विशेष महत्व रखती है। SIR पर राजनीतिक और कानूनी विवाद हो सकता है। चुनाव आयोग के निर्णयों की वैधानिकता पर प्रश्न उठ सकते हैं। मतदाता सूची से नाम हटने या जोड़ने को लेकर शिकायतें हो सकती हैं। CEC की कार्यप्रणाली पर भी जांच की मांग हो सकती है। लेकिन इन सभी प्रश्नों का अंतिम परीक्षण रिकॉर्ड, कानून और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।

न्यायालय के सामने यदि आरोप है कि आयोग ने कानून का उल्लंघन किया, तो उसके लिए दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। यदि निर्णय बहुमत के बिना लिया गया, तो रिकॉर्ड से इसकी पुष्टि की जा सकती है। यदि कोई आदेश नियम के बाहर गया, तो न्यायालय उसके खिलाफ आदेश दे सकती है। यही न्यायिक प्रक्रिया है।
और यही कारण है कि 5 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का रुख उल्लेखनीय था। अदालत ने तत्काल निरस्त करने का आदेश नहीं दिया। उसने पहले संबंधित पक्षों से जवाब मांगा और रिकॉर्ड देखने की बात कही। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यदि कानून का पालन नहीं हुआ है तो अदालत के पास आवश्यक कार्रवाई करने की शक्ति है।
यहीं से CJP की राजनीति और उसके द्वारा अपनाए जा रहे प्रोटेस्ट मॉडल पर बड़ा प्रश्न उठता है। बात यही है कि किसी संस्था के निर्णय को बदलवाने के लिए लगातार सड़क पर शक्ति प्रदर्शन करना और उस शक्ति प्रदर्शन को न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर एक प्रेशर मॉडल बना देना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए एक अलग तरह की चुनौती पैदा करता है। सवाल यह नहीं है कि प्रदर्शन किया गया या नहीं, सवाल यह है कि प्रदर्शन का उद्देश्य सार्वजनिक विमर्श बनाना है या संवैधानिक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करना?

इस अंतर को समझना आज इसलिए जरूरी है क्योंकि सोशल मीडिया और 24 घंटे के राजनीतिक समाचार चक्र ने भीड़ को केवल सड़क पर मौजूद संख्या नहीं रहने दिया है। अब एक प्रदर्शन कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय नैरेटिव बन सकता है। कैमरे, हैशटैग, स्लोगन और राजनीतिक मैसेज किसी न्यायिक मामले के आसपास ऐसा वातावरण बना सकते हैं, जिसमें कानूनी प्रश्न पीछे और राजनीतिक विमर्श आगे आ जाए।
न्यायपालिका के मामले में यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायालय चुनाव नहीं लड़ती। उसके पास राजनीतिक संगठन नहीं होता। उसके पास जनसभा आयोजित करने की मशीनरी नहीं होती। यदि न्यायालय यह संदेश देने लगे कि वह सड़क की ताकत देखकर निर्णय करता है, तो उसके निर्णय की कानूनी वैधता के साथ साथ उसकी संस्थागत विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी।

इसी तरह यदि राजनीतिक समूह यह मानने लगें कि पर्याप्त भीड़, पर्याप्त दबाव और पर्याप्त राजनीतिक तापमान पैदा करके किसी संवैधानिक संस्था से मनचाहा परिणाम हासिल किया जा सकता है, तो यह केवल एक मामले की समस्या नहीं होगी। यह भविष्य के हर संवेदनशील संवैधानिक विवाद के लिए एक खतरनाक उदाहरण बन सकता है। आज चुनाव आयोग है, कल कोई दूसरा संवैधानिक निकाय हो सकता है। आज मुद्दा SIR है, कल कोई और कानूनी विवाद हो सकता है।
लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है, लेकिन जनता की सर्वोच्चता का अर्थ यह नहीं कि भीड़ न्यायाधीश बन जाए। चुनाव में जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। संसद कानून बनाती है। सरकार प्रशासन चलाती है। चुनाव आयोग चुनावी प्रक्रिया संचालित करता है और अदालत कानून की व्याख्या करती है। इस व्यवस्था में जनता की आवाज हर जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन हर संस्था का निर्णय अपने संवैधानिक अधिकारों के अनुसार होना चाहिए।