
आईआईटी बॉम्बे में साहिल वाकोडे की मौत के बाद शुरू हुआ छात्र विरोध अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां सवाल केवल साहिल के लिए न्याय का नहीं, बल्कि यह भी है कि आखिर आईआईटी बॉम्बे के हजारों छात्रों की ओर से बोलने का अधिकार किसके पास है। 4 अक्टूबर 2026 को आईआईटी बॉम्बे के इंस्टीट्यूट जनरल सेक्रेटरीज की ओर से जारी एक महत्वपूर्ण पत्र ने इसी सवाल को सीधे सामने रखा है।
पत्र में कहा गया है कि 18 मांगों का प्रस्ताव 1,000 से अधिक छात्रों की चिंताओं और 50 से अधिक छात्र प्रतिनिधियों की सामूहिक चर्चा के बाद तैयार हुआ था और संस्थान ने उन मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया था। लेकिन मुख्य द्वार पर अब भी चल रहा प्रदर्शन लगभग 10 से 12 छात्रों का एक छोटा समूह कर रहा है और यह समूह पूरे आईआईटी बॉम्बे छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता।

पत्र में यह भी कहा गया है कि प्रदर्शन में शामिल कुछ लोगों के बाहरी संस्थाओं के साथ राजनीतिक संबंध और संबद्धताएं हैं। यह लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन इससे उन्हें हजारों छात्रों की ओर से बोलने का अधिकार नहीं मिल जाता।
4 अक्टूबर का पत्र किसी बाहरी राजनीतिक संगठन का आरोप नहीं है। यह आईआईटी बॉम्बे के छात्र समूहों के नाम पर संस्थान के इंस्टीट्यूट जनरल सेक्रेटरीज द्वारा जारी किया गया पत्र है। इसमें साफ कहा गया है कि साहिल की मौत के बाद छात्रों की चिंताओं पर व्यापक स्तर पर चर्चा हुई। एक हजार से अधिक छात्रों की चिंताओं को संकलित किया गया और 50 से अधिक छात्र प्रतिनिधि व्यक्तिगत रूप से एकत्र हुए। इसके बाद 18 मांगें तैयार की गईं। संस्थान ने इन मांगों को स्वीकार करते हुए उन पर कार्रवाई की प्रतिबद्धता जताई।

इसके बाद पत्र वर्तमान प्रदर्शन को अलग श्रेणी में रखता है। उसमें कहा गया है कि मुख्य द्वार पर चल रहा विरोध एक बहुत छोटे समूह का है, जिसमें लगभग 10 से 12 लोग शामिल हैं। पत्र प्रदर्शनकारियों के विरोध करने के अधिकार को स्वीकार करता है, लेकिन यह भी स्पष्ट करता है कि उनका यह अधिकार उन्हें पूरे आईआईटी बॉम्बे छात्र समूह की ओर से बोलने का अधिकार नहीं देता। पत्र में यह भी उल्लेख है कि इनमें से कुछ व्यक्तियों के बाहरी संस्थाओं के साथ राजनीतिक संबंध और संबद्धताएं हैं। यहीं से वर्तमान विरोध की राजनीतिक प्रकृति पर सवाल उठता है।
इसमें एक और महत्वपूर्ण बात कही गई है। वर्तमान विरोध लंबे समय तक मुख्य द्वार पर जारी रहने वाला है और प्रदर्शनकारी इस माध्यम से मामले पर सार्वजनिक ध्यान बनाए रखना चाहते हैं। पत्र लिखने वाले छात्र प्रतिनिधि इस उद्देश्य को समझने की बात स्वीकार करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि इस लगातार चल रहे प्रदर्शन से उन हजारों छात्रों का दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है जो इसमें शामिल नहीं हैं। उनकी कक्षाएं हैं, प्रयोगशालाएं हैं, परीक्षाएं हैं, शोध है, नियुक्तियों की प्रक्रिया है और दूसरी शैक्षणिक जिम्मेदारियां हैं। किसी एक समूह के विरोध का अधिकार दूसरे हजारों छात्रों के सामान्य शैक्षणिक जीवन की कीमत पर अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकता।

साहिल वाकोडे की मृत्यु के बाद शुरुआती विरोध में स्थिति अलग थी। 18 मांगें व्यापक छात्र भागीदारी के बाद तैयार हुई थीं। 21 सितंबर को आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने छात्रों की 18 सूत्रीय मांगों पर सहमति जताई थी और निदेशक प्रोफेसर शिरीष केदारे ने छात्रों के साथ बातचीत के बाद उस चार्टर को स्वीकार किया था।
इसके बाद भी मुख्य द्वार पर कम्युनिस्ट छात्रों का एक छोटा समूह विरोध जारी रखता रहा। 2 अक्टूबर तक इस कम्युनिस्ट समूह ने भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया और स्वतंत्र जांच, जांच समिति में बदलाव, निदेशक के इस्तीफे तथा प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला के खिलाफ कार्रवाई जैसी मांगों को दोहराया।

यहां 4 अक्टूबर का छात्र पत्र फिर महत्वपूर्ण हो जाता है। पत्र में खुद कहा गया है कि छात्र समूह साहिल को भूला नहीं है। उसमें यह भी कहा गया है कि क्राइम ब्रांच की जांच और संस्थागत प्रक्रियाएं चल रही हैं और 18 मांगों के संबंध में किए गए वादों को लागू किया जाना चाहिए। पत्र का जोर इस बात पर है कि साहिल को निष्पक्ष जांच, सत्य और जवाबदेही मिले, लेकिन साथ ही हजारों दूसरे छात्रों को भी शांतिपूर्ण और सामान्य शैक्षणिक जीवन जीने का अवसर मिले।

साहिल वाकोडे की मृत्यु को लेकर विरोध कर रहे समूह में ह्यूमैनिटीज पृष्ठभूमि के कम्युनिस्ट छात्रों की भागीदारी की रिपोर्ट भी सामने आई हैं। इसी मामले के संदर्भ में बाहरी कम्युनिस्ट व्यक्तित्वों को जांच समिति में शामिल करने की मांग पहले सामने आ चुकी है। छात्रों ने कम्युनिस्ट विचारकों के समूह से आने वाले भालचंद्र मुंगेकर, पी. साईनाथ, राम पुनियानी और सुखदेव थोराट जैसे नाम सुझाए हैं।
यही वह जगह है जहां आईआईटी बॉम्बे के ह्यूमैनिटीज परिसर और उसके कम्युनिस्ट वातावरण को भी सवालों से बाहर नहीं रखा जा सकता। आईआईटी बॉम्बे के ह्यूमैनिटीज विभाग की कम्युनिस्ट प्रोफेसर शर्मिला का नाम 18 अप्रैल 2024 की एक कक्ष बुकिंग में ‘हसदेव विल विन’ नामक कार्यक्रम की होस्ट के रूप में भी दर्ज है। यह कार्यक्रम हसदेव अरण्य, खनन, पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों से संबंधित था। बाद में मुंबई में इसी वृत्तचित्र की स्क्रीनिंग से जुड़े छात्र विमर्श में कॉरपोरेट लूट, पूंजी, जनजाति अधिकार और दक्षिणपंथी ताकतों के विरोध जैसी राजनीतिक भाषा दिखाई दी थी।

ऐसी रिपोर्ट भी सामने आई है कि प्रोफेसर शर्मिला ने साहिल वाकोडे मामले में छात्रों को आंदोलन के लिए उकसाया। इसलिए यह सवाल पूछना पूरी तरह उचित है कि आईआईटी बॉम्बे के ह्यूमैनिटीज और सामाजिक विज्ञान के कुछ हिस्सों में किस प्रकार का राजनीतिक विमर्श विकसित हो रहा है और उसका छात्र राजनीति पर कितना प्रभाव है?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साहिल की मृत्यु को वामपंथी लॉबी अपने लिए परिसर में अपना प्रभाव बढ़ाने का माध्यम बना रही है। ऐसी घटनाओं को वामपंथियों द्वारा निजी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाना नया नहीं है।
इसलिए 4 अक्टूबर का पत्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहली बार वर्तमान विरोध के बीच से ही यह आवाज सामने आई है कि साहिल के लिए न्याय की मांग अपनी जगह है, लेकिन उस मांग के नाम पर पूरे आईआईटी बॉम्बे छात्र समुदाय की आवाज बनने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।