
प्रशांत भूषण से लेकर कांग्रेस पार्टी और नेहा बोरा जैसे अराजक कम्युनिस्ट से लेकर कॉक्रोच बनकर घूम रहे आम आदमी पार्टी से जुड़े कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ता पिछले कुछ समय से लगातार रिजीम चेंज की बात कर रहे हैं। कोई बांग्लादेश मॉडल अपनाने की बात कर रहा है। कोई नेपाल बनाने की बात कर रहा है। क्या आपने कभी विचार किया है कि इसके पीछे की सोच क्या है? इसके पीछे का कारण क्या है?
सोचिए कि आख़िर प्रशांत भूषण को रिजीम चेंज क्यों चाहिए? योगेंद्र यादव को संसद नहीं, सड़क पर निर्णय क्यों करवाने हैं? आख़िर नेहा बोरा को बांग्लादेश के हिंसक आंदोलन में भारत के लिए रास्ता क्यों दिखाई देता है? इन्हें संविधान की पुस्तक तो हाथ में चाहिए, लेकिन संविधान की सबसे बुनियादी व्यवस्था, यानी लोकतांत्रिक जनादेश पर भरोसा क्यों नहीं है? इन्हें चुनावी प्रक्रिया पर अविश्वास है या बात कुछ और है?

बात ऐसी है कि आंदोलनजीवी के नाम से कुख्यात योगेंद्र यादव ने वर्ष 2014 में गुड़गांव लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। योगेन्द्र यादव को मात्र 79,456 वोट मिले और उनकी जमानत जब्त हो गई। इसी कड़ी में हार्डकोर कम्युनिस्ट विचारक स्वामी अग्निवेश का नाम आता है।
अग्निवेश ने वर्ष 1984 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से लोकसभा चुनाव लड़ा था। उन्हें 36,892 वोट मिले और उनकी भी जमानत जब्त हो गई। नर्मदा बचाओ आंदोलन के नाम पर सूखाग्रस्त क्षेत्र का पानी रोकने वाली कम्युनिस्ट एक्टिविस्ट मेधा पाटकर भी वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर मुंबई उत्तर पूर्व से चुनाव मैदान में उतरी थी। पाटकर को 76,451 वोट मिले और वह बुरी तरह से चुनाव हारी।

अब जरा उन लोगों की राजनीति को भी देखते हैं, जिन्होंने लोकतंत्र को छोड़कर हिंसा को ही अपना मार्ग बनाया। माओवादी संगठन के शुरुआती चेहरों में शामिल चारू मजूमदार ने वर्ष 1963 में सिलीगुड़ी विधानसभा उपचुनाव में हिस्सा लिया था। जंगल संथाल ने भी वर्ष 1962 और 1967 में चुनाव लड़ा था। इन लोगों को कभी चुनावों में सफलता नहीं मिली, अर्थात जनता ने इन्हें और इनकी विचारधारा को सिरे से नकार दिया। माओवादी संगठन के शुरुआती दौर में तो इन लोगों के द्वारा चुनाव को जनसमर्थन जुटाने के एक माध्यम के रूप में उपयोग करने की कोशिश भी हुई थी। लेकिन जनता ने इनका कभी साथ नहीं दिया।
यही कारण है कि जब इन कम्युनिस्ट विचारकों और वामपंथी गुटों को चुनावी राजनीति में सफलता नहीं मिली तो इस समूह ने अपना रास्ता लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर तलाशना शुरू किया। एक समूह ने हथियार उठकर माओवादी आतंक का रास्ता अपनाया, तो एक समूह ने एक्टिविजम का चोला पहनकर समाज के भीतर घुसने का काम किया। किसी समूह ने चुनावी राजनीति को पकड़े रखा, तो किसी समूह ने पत्रकारिता, लेखन, बॉलीवुड, कला, साहित्य, नीति-निर्माण, वकालत से लेकर तमाम क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाई। लेकिन चुनावी सफलता अभी भी इनके लिए दूर की कौड़ी थी।

इसी समूह ने पिछले दशक में एक बार फिर राजनीति में एक्सठ घुसने का प्रयास किया, जिसके कारण आम आदमी पार्टी का अस्तित्व सामने आया।अरविंद केजरीवाल, मेधा पाटकर, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, सोनी सोरी, मनीष सिसोदिया, योगेन्द्र यादव समेत तमाम ऐसे चेहरे थे जो इनके ही वामपंथी धारा से निकले हुए थे। अन्ना आंदोलन से निकले इन चेहरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी। लेकिन लोकसभा चुनाव जिसने-जिसने चुनाव लड़ा उन सब की जमानत जब्त हो गई।
इसी कम्युनिस्ट राजनीति से आने वाले कन्हैया कुमार ने भी 2019 में बेगूसराय और 2024 में उत्तर पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा। दोनों ही बार उन्हें पराजय मिली। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि सार्वजनिक मंचों पर बनी "आर्टिफ़िशियल" लोकप्रियता, मीडिया में चर्चा और सोशल मीडिया पर समर्थन का अर्थ हमेशा वास्तविक जनाधार नहीं होता।

यही हाल राहुल गांधी का भी हो चुका है। कांग्रेस पार्टी का सत्ता में बने रहने का इतिहास लम्बा है, लेकिन जब से यह पार्टी राहुल गांधी के नेतृत्व में आई है तब से अपने पतन की ओर है। यह भी देखा गया है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के सलाहकारों में अब वही वामपंथी समूह आ चुका है, जो कभी ख़ुद जनस्वीकार्यता हासिल नहीं कर पाया।
इन्हीं परिणामों और जनता के द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद इस समूह ने एक नई राजनीतिक प्रवृत्ति विकसित कर ली है। जब चुनाव परिणाम इनके अनुकूल होता है तो लोकतंत्र की जीत बताई जाती है और जब परिणाम प्रतिकूल होता है तो संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं। इसीलिए अब ये समूह हर निर्णय संसद के बाहर, कुछ संगठनों, आंदोलनों और सड़कों पर बैठे लोगों की इच्छा से करवाना चाहता है।

प्रशांत भूषण का हालिया रिजीम चेंज वाला बयान भी इसी संदर्भ में है। सरकार बदलना लोकतंत्र में पूरी तरह वैध राजनीतिक उद्देश्य है। लेकिन उसका रास्ता क्या है? जनता के बीच जाना, राजनीतिक विकल्प खड़ा करना, चुनाव लड़ना और बहुमत हासिल करना। यदि किसी सरकार के विरुद्ध इतना ही व्यापक जनाक्रोश है तो चुनाव से बेहतर जनमत संग्रह क्या हो सकता है? आखिर संसद में बैठे प्रतिनिधियों को जनता ही चुनकर भेजती है। लेकिन इन्हें भी पता है कि जब-जब ये जनता के सामने उतरे हैं, तो इनका क्या हश्र हुआ है।
कॉक्रोच समूहों के साथ आंदोलन करने वाली अराजक कम्युनिस्ट लीडर नेहा बोरा द्वारा बांग्लादेश के जेन जी आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात भी इसी कड़ी का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि भारत जैसे स्थापित संसदीय लोकतंत्र में किसी दूसरे देश के हिंसा भरे सत्ता परिवर्तन को राजनीतिक प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ रही है? भारत में सरकार बदलने के लिए न तो किसी तख्तापलट की जरूरत है, न किसी अराजक स्थिति की। यहां मतदाता के पास पहले से ही एक संवैधानिक और शांतिपूर्ण रास्ता मौजूद है।

इस राजनीति का एक और पहलू समझना जरूरी है। माओवाद की आतंकी विचारधारा लंबे समय से संसदीय व्यवस्था को बुर्जुआ व्यवस्था बताकर खारिज करती रही है। उनके लिए सत्ता जनता के मत से नहीं, बल्कि हिंसक क्रांति के जरिए हासिल की जाने वाली चीज है। यही कारण है कि देश के अनेक हिस्सों में कम्युनिस्ट समूहों द्वारा चुनाव बहिष्कार के आह्वान से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हिंसक आतंकी हमलों तक का इतिहास मौजूद है।
दूसरी ओर, लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय इन समूहों की भाषा और रणनीति में भी जब संसद से अधिक सड़क, जनादेश से अधिक आंदोलन और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अधिक "क्रांति" को प्राथमिकता मिलने लगती है, तो इसे क्या समझा जाए?

वास्तव में इस समूह के लिए संविधान केवल हाथ में लेकर तस्वीर खिंचवाने की पुस्तक है। इन्हें ये याद नहीं कि उसकी आत्मा में चुनाव, प्रतिनिधित्व, संस्थाएं और जनता का जनादेश भी शामिल हैं, क्योंकि इन्होंने जो संविधान कि किताब के नाम पर "माओ की रेड बुक" पकड़ी है, उसके अंदर का कागज कोरा है, जिसमें ये अपने अनुसार नियम-कानून लिखना चाहते हैं।

आखिरकार सवाल बहुत सीधा है। यदि आपको सरकार पसंद नहीं है तो चुनाव लड़िए। यदि चुनाव व्यवस्था में खामी है तो उसे सुधारने के लिए कानूनी और संवैधानिक लड़ाई लड़िए। यदि जनता आपके साथ है तो उसे अपने पक्ष में मतदान करने के लिए तैयार कीजिए। लेकिन यदि जनता बार-बार आपके राजनीतिक विचारों को स्वीकार नहीं कर रही है और आप फिर भी सत्ता परिवर्तन का रास्ता सड़क पर तलाश रहे हैं, तो समस्या लोकतंत्र में नहीं है बल्कि आपके जनाधार में है, और यह सवाल पूछना भी लोकतंत्र का ही हिस्सा है।