CRPF की ऐतिहासिक जीत: भारत विरोधी ताकतों के खिलाफ 47 साल बाद भी शून्य ऑपरेशनल मौत

वामपंथी उग्रवाद के विरुद्ध चलाए जा रहे निर्णायक अभियानों के दौरान भारतीय जवानों के जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली ठोस रणनीति, का यह आकड़ा प्रमाण है

The Narrative World    05-Nov-2026
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केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने देश की आंतरिक सुरक्षा की लड़ाई में एक ऐसा अध्याय लिख दिया है जो आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा। पिछले एक वर्ष में बल के किसी भी जवान की ऑपरेशनल मृत्यु नहीं हुई। यह उपलब्धि 47 साल बाद हासिल हुई है। महानिदेशक जी.पी. सिंह ने खुद इस ऐतिहासिक पड़ाव की घोषणा करते हुए कहा कि बल में आखिरी ऑपरेशनल मृत्यु 30 अक्टूबर 2025 में हुई थी। इससे पहले ऐसी स्थिति जनवरी 1979 में समाप्त हुई थी।
 
यह आंकड़ा उस रणनीति का परिणाम है जिसमें नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के साथ-साथ जवानों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। आधुनिक उपकरण, बेहतर प्रशिक्षण, सूक्ष्म योजना और घायलों के तत्काल निष्कासन की व्यवस्था ने मिलकर यह असंभव लगने वाला लक्ष्य हासिल करवाया।

Rapid Air Evacuation of Injured Personnel
 
नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक अभियान
 
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने के लिए 31 मार्च 2026 की स्पष्ट समय-सीमा तय की थी। इस लक्ष्य के अनुरूप सुरक्षा बलों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अभियानों की तीव्रता बढ़ा दी। सरकार की रणनीति सिर्फ मुठभेड़ तक सीमित नहीं रही। सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण, खुफिया समन्वय, सड़क और संचार नेटवर्क का विस्तार तथा दूरस्थ क्षेत्रों में शासन की पहुँच सुनिश्चित करने का कार्य किया गया।

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इस पूरे अभियान में सीआरपीएफ की भूमिका केंद्रीय रही। विशेषकर कोबरा इकाइयों ने घने जंगलों और नक्सलियों के गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्रों में कई सफल ऑपरेशन चलाए। जिसमे सशस्त्र नेटवर्क को तोड़कर उन क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन, विकास और प्रशासनिक व्यवस्था को फिर से स्थापित किया गया।
 
बलिदान का इतिहास और नई दिशा
 
1947 से अब तक सीआरपीएफ के 2,268 जवान विभिन्न अभियानों में शहीद हो चुके हैं। औसतन प्रतिवर्ष 28 से अधिक जवानों की ऑपरेशनल मृत्यु होती रही है। वर्ष 2010 सबसे दर्दनाक रहा, जब 143 जवान शहीद हुए। छत्तीसगढ़ में हुए भीषण माओवादी हमले ने बल को गहरा आघात पहुँचाया था।
 
इतने लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद लगातार 12 महीने तक शून्य ऑपरेशनल मृत्यु की उपलब्धि इसलिए विशेष है क्योंकि जवान पूरे समय प्रमुख ऑपरेशनल क्षेत्रों में सक्रिय रहे और उन्होंने कई महत्वपूर्ण सफलताएँ भी हासिल कीं। यह जीरो टॉलरेंस की नीति और जवानों के जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देने वाली रणनीति का जीवंत प्रमाण है।

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आंतरिक सुरक्षा का बदला परिदृश्य
 
गृह मंत्रालय की 2006-07 और 2024-25 की वार्षिक रिपोर्टों की तुलना इस बात को साफ दिखाती है कि पिछले दो दशकों में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर कितना बड़ा बदलाव आया है।
 
नक्सली हिंसा: 2006 में 1,509 घटनाएँ हुईं, जिनमें 678 लोग मारे गए (521 नागरिक और 157 सुरक्षाकर्मी)। 2024 में कुल मौतें
घटकर 150 रह गईं – लगभग 78 प्रतिशत की कमी। प्रभावित पुलिस थानों की संख्या 395 से 151 हो गई।
 
जम्मू कश्मीर: 2006 में आतंकवाद सम्बन्धी हिंसा में 389 नागरिक और 151 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। गृह मंत्रालय के अनुसार, 2024 में यह संख्या घटकर 26 नागरिक और 31 सुरक्षाकर्मी रह गई। ये आँकड़े जनहानि में बड़ी कमी दर्शाते हैं।
 
पूर्वोत्तर: 2006 में 1,366 उग्रवादी घटनाएँ हुईं। 2024 में यह संख्या 294 रह गई। सुरक्षाकर्मियों की मौत 76 से घटकर मात्र 3 हो गई।
 
इसके साथ-साथ बल की संख्या और क्षमता में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। 2006-07 में सीआरपीएफ के कार्मिकों की संख्या लगभग 2.49 लाख थी, जो 2024-25 में बढ़कर 3.31 लाख हो गई। बटालियनों की संख्या 248 तक पहुँच गई। रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की बटालियन 10 से 16 हो गईं। महिला बटालियन 2 से 6 हो गईं। नक्सलवाद के खिलाफ विशेष अभियानों के लिए कोबरा की 10 बटालियन सक्रिय हैं।

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1 अप्रैल से 31 दिसंबर 2024 के बीच केवल सीआरपीएफ के अभियानों में 132 माओवादी-उग्रवादी-आतंकवादी मारे गए, 867 गिरफ्तार हुए और 522 ने आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बल ने सैकड़ों हथियार, हजारों कारतूस, सैकड़ों ग्रेनेड और आईईडी तथा टन भर विस्फोटक व मादक पदार्थ भी बरामद किए।
 
सीआरपीएफ महानिदेशक जी.पी. सिंह के अनुसार, आधुनिक उपकरणों, बेहतर प्रशिक्षण, रणनीतिक योजना और घायल जवानों को तेजी से अस्पताल पहुँचाने से बल लगातार 12 महीनों तक ऑपरेशनल मृत्यु से बच सका। वहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में एक सीआरपीएफ अधिकारी ने बताया कि जवानों को सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए गए, अभियानों की सावधानीपूर्वक योजना बनाई गई और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में सामान्य आवागमन को भी ऑपरेशनल मूवमेंट जैसी गंभीरता से लिया गया। अधिकारी के अनुसार, आवश्यकता का डेढ़ गुना बल भी तैनात किया जाता है।

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‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ इसका जीवंत उदाहरण है। करेगुट्टालु पहाड़ियों में 21 नक्सली मारे गए, लेकिन सुरक्षा बलों के एक भी जवान ने अपनी जान नहीं गवाई। 21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा की करेगुट्टालु पहाड़ियों में चले इस 21 दिवसीय अभियान में CRPF, CoBRA, STF और DRG ने संयुक्त कार्रवाई की। 21 मुठभेड़ों में 31 नक्सली मारे गए। अभियान में 450 IED, 35 हथियार बरामद हुए और 214 नक्सली ठिकाने ध्वस्त किए गए। यह अभियान दुर्गम नक्सली ठिकानों को ध्वस्त करने और उनके हथियारबंद नेटवर्क को कमजोर करने की बड़ी उपलब्धि बना।
 
 
सीआरपीएफ की यह उपलब्धि, राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है जिसमें आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने का अभियान अब समाप्त हो चुका है। हमारे जवानों द्वारा किए गए बलिदान व्यर्थ नहीं जाने दिए जा सकते; सैनिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए निर्णायक कार्रवाई सफलतापूर्वक की गई है। देश की आंतरिक सुरक्षा आज पहले से कहीं अधिक मजबूत है – यह परिवर्तन दशको के संघर्ष के फलस्वरूप संभव हुआ है।
 
लेख
KEWALI KABIR JAIN

केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय