
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी दूसरी पारी में जिस तरह भारत के साथ संबंधों को आर्थिक दबाव, राजनीतिक बयानबाजी और हस्तक्षेप का माध्यम बनाया, उसने भारत-अमेरिका संबंधों में सबसे निचले दौर पर लाकर खड़ा कर दिया है।
जिस भारत को अमेरिका कभी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बताता था, उसी भारत को ट्रम्प प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने के लिए टैरिफ लगाने, व्यापारिक रियायतें देने के लिए दबाव बनाने और यहां तक कि आंतरिक राजनीतिक मामलों पर सवाल उठाने का मंच बना दिया। यही कारण है कि आज भारत के भीतर अमेरिका को लेकर अविश्वास का भाव तेज़ी से बढ़ रहा है।

लेकिन इस पूरी कवायद में केवल ट्रम्प ही नहीं, बल्कि उनके करीबी सहयोगियों, प्रशासनिक अधिकारियों और उनके राजनीतिक समर्थकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। एलन मस्क के नेतृत्व वाले DOGE से लेकर व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो और रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम तक, भारत को लेकर जिस तरह की बयानबाजी और नीतिगत दबाव सामने आए, उसने अमेरिकी डीप स्टेट के असली चेहरे को उजागर कर दिया।
वहीं इसी डीप स्टेट के सहयोग से भारत में रिजीम चेंज का बड़ा खेल भी खेला जा रहा था। स्टूडेंट प्रोटेस्ट से लेकर तमाम ऐसे मामले आए, जो इस ओर इशारा कर रहे थे कि जैसे बांग्लादेश और नेपाल में डीप स्टेट के हस्तक्षेप से रिजीम चेंज हुआ, वैसा ही कुछ भारत में भी हो सके।

हालाँकि अब अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने इस राजनीतिक परिदृश्य को पूरा बदल दिया है। भारत में तो यह डीप स्टेट रिजीम चेंज नहीं करा पाया लेकिन अमेरिकी सीनेट में ज़रूर रिजीम चेंज हो गया है। बीते 3 नवंबर 2026 को हुए चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी को बेदख़ल करते हुए अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा, दोनों में नियंत्रण हासिल कर लिया।
भारत के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दबाव की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम थे। ग्राहम ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मुहिम को आगे बढ़ाया। ग्राहम के प्रस्तावित बिल में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था। बाद में संशोधित विधेयक में भारत सहित रूस के पांच प्रमुख तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान सामने आया।
यहां यह समझना जरूरी है कि भारतकी ऊर्जा नीति का आधार अपनी विशाल जनसंख्या की आवश्यकता, आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियां हैं। रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने का निर्णय भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हुआ है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन ने भारत के इस संप्रभु आर्थिक निर्णय को अमेरिकी विदेश नीति के अधीन करने की कोशिश की।

ग्राहम ने इस बिल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जुलाई 2026 में ग्राहम की मृत्यु के बाद भी यह विधेयक आगे बढ़ता रहा। अगस्त 2026 में अमेरिकी सीनेट ने संशोधित विधेयक को 86 के मुकाबले 11 मतों से पारित किया। यह विधेयक राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता था।
अगस्त 2025 में ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने के आधार पर भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का कार्यकारी आदेश भी जारी किया था। पहले से लागू टैरिफ के साथ कुछ भारतीय उत्पादों पर कुल दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। अमेरिका ने इसे रूस के खिलाफ कार्रवाई बताया, लेकिन इसका सीधा आर्थिक बोझ भारतीय निर्यातकों और अमेरिका के साथ व्यापार करने वाले भारतीय उद्योगों पर पड़ा।

वहीं एलन मस्क का भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप केवल DOGE और अमेरिकी सहायता के विवाद तक सीमित नहीं रहा। उनकी कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक को भारत में प्रवेश दिलाने की कोशिशों के दौरान भी मस्क ने भारतीय सुरक्षा और नियामक व्यवस्था को लेकर जिस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी की, उसने अमेरिका के भारत विरोधी रूख को और पुख़्ता किया।

दिसंबर 2024 में मणिपुर में सुरक्षा बलों के अभियान के दौरान हथियारों और अन्य सैन्य सामग्री के साथ स्टारलिंक का लोगो लगा एक सैटेलाइट इंटरनेट उपकरण बरामद हुआ था। उसी अवधि में भारतीय पुलिस ने समुद्र में पकड़े गए नशीले पदार्थों के तस्करों से जुड़े एक अन्य स्टारलिंक उपकरण के संबंध में भी कंपनी से जानकारी मांगी थी। मणिपुर में बरामद उपकरण को लेकर यह आशंका सामने आई कि आतंकी समूह इसका इस्तेमाल कर रहे हो सकते हैं।

इसके बाद अक्टूबर 2026 में स्टारलिंक को भारत में व्यावसायिक रूप से शुरू करने की अनुमति मिलने में देरी को लेकर मस्क ने सीधे भारतीय कारोबारी और नियामक व्यवस्था पर हमला बोल दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ओलिगार्क अपने एकाधिकार को बचाने के लिए स्टारलिंक को भारत में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। इसके बाद उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी का नाम लेते हुए सोशल मीडिया पर सवाल किया, "Is Ambani the real boss of India?"
यहां असली मुद्दा स्टारलिंक को अनुमति देने या न देने का नहीं है। भारत में कारोबार करने का अधिकार किसी विदेशी कंपनी को भारतीय कानूनों और सुरक्षा शर्तों से ऊपर नहीं रखता। भारत के दूरसंचार नेटवर्क, डेटा सुरक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों में संचार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। कोई भी विदेशी कारोबारी अपने व्यावसायिक हितों को भारतीय नीतियों से ऊपर नहीं रख सकता।
ट्रम्प प्रशासन के भीतर भारत के प्रति बढ़ती आक्रामकता का एक और उदाहरण व्हाइट हाउस के वरिष्ठ व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की बयानबाजी थी। भारत पर टैरिफ लगाने के समर्थन में नवारो ने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिन्होंने भारत के साथ-साथ हिंदू समाज के प्रति उनकी सोच पर भी सवाल खड़े किए।

अगस्त 2025 में नवारो ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत की आलोचना करते हुए यूक्रेन युद्ध को "Modi's War" तक कह दिया। उन्होंने भारत को रूस के लिए तेल का एक प्रकार का आर्थिक रास्ता बताया और भारतीय विदेश नीति को "Strategic Freeloading" कहा। लेकिन उनका सबसे विवादास्पद बयान तब आया जब उन्होंने कहा कि भारतीय ब्राह्मण यूक्रेन युद्ध से लाभ कमा रहे हैं।
वहीं भारत के संदर्भ में ट्रम्प प्रशासन के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टिप्पणियां भी चर्चा में रहीं। नवंबर 2025 में वेंस ने सार्वजनिक कार्यक्रम में अपनी पत्नी उषा वेंस की हिंदू धार्मिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में वह ईसाई धर्म अपना लेंगी।

इस बयान पर हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने आपत्ति जताई। अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने भी कहा कि ऐसे वक्त में जब हिंदू और भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक पूर्वाग्रह और हिंदू-विरोधी माहौल का सामना कर रहे हैं, उपराष्ट्रपति की सार्वजनिक टिप्पणी उस माहौल को और बढ़ा सकती है।
ट्रम्प प्रशासन की भारत नीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों में आया बदलाव था। मई 2025 में भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रम्प ने बार-बार यह दावा किया कि उन्होंने दोनों देशों के बीच युद्ध रुकवाया। ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से संघर्षविराम का श्रेय स्वयं को दिया और कई बार कहा कि उन्होंने दोनों देशों को व्यापारिक दबाव के माध्यम से बातचीत के लिए राजी किया।
इसके बावजूद ट्रम्प ने मध्यस्थता का श्रेय लेना जारी रखा। पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका की प्रशंसा की और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की पहल की। जून 2025 में ट्रम्प ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की व्हाइट हाउस में मेजबानी भी की।
भारत के लिए यह केवल एक बयान का विषय नहीं था। पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर और भारत के आंतरिक मामलों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश करता रहा है। भारत की घोषित नीति यह रही है कि पाकिस्तान के साथ सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हो सकती है, लेकिन किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी। ट्रम्प का बार-बार मध्यस्थता का दावा करना इस स्थापित भारतीय नीति के विपरीत था।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और विरोधाभास दिखाई दिया। अमेरिका ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त टैरिफ लगाए, लेकिन पाकिस्तान के साथ संबंधों को फिर से मजबूत करने के लिए सक्रिय कूटनीतिक पहल की। जून 2025 में असीम मुनीर की व्हाइट हाउस यात्रा इसी बदलते समीकरण का प्रतीक बनी।
इन सभी घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक कड़ी में समझने की आवश्यकता है। ट्रम्प प्रशासन के भीतर ऐसे कई लोग थे जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, रूस के साथ उसके संबंधों, उसकी ऊर्जा नीति और घरेलू राजनीतिक व्यवस्था को लेकर लगातार दबाव बना रहे थे। दूसरी ओर, एलन मस्क जैसे व्यवसायी अमेरिकी प्रशासन का हिस्सा बनकर भारत के चुनावी मामलों और नियामक व्यवस्था पर टिप्पणियां कर रहे थे।

हालाँकि अब 2026 के मध्यावधि चुनाव के परिणामों ने अमेरिकी राजनीति की दिशा बदल दी है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। रिपब्लिकन पार्टी को उन राज्यों में भी नुकसान उठाना पड़ा है जहां ट्रम्प ने 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। नॉर्थ कैरोलाइना, टेक्सास, आयोवा और साउथ कैरोलाइना जैसे राज्यों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की जीत ने रिपब्लिकन नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
इन नतीजों में दक्षिण कैरोलाइना की सीट विशेष रूप से प्रतीकात्मक बन गई। लिंडसे ग्राहम की मृत्यु के बाद खाली हुई सीट पर उनकी बहन डार्लिन ग्राहम को अंतरिम सीनेटर नियुक्त किया गया था। ट्रम्प ने उनका समर्थन किया और रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव में उनके पक्ष में भारी संसाधन लगाए। इसके बावजूद डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एनी एंड्रयूज ने यह सीट जीत ली। जिस राज्य में 1998 के बाद किसी डेमोक्रेट ने सीनेट का चुनाव नहीं जीता था, वहां यह परिणाम रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका था।