चीन की कम्युनिस्ट राजनीति का एक अहम अध्याय 1942 से 1945 के बीच चला तथाकथित "यानान सुधार आंदोलन" रहा। इस अभियान को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने वैचारिक शुद्धिकरण के नाम पर शुरू किया, लेकिन हकीकत में उसने इसे सत्ता पर पकड़ मजबूत करने और असहमति दबाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। उस दौर में पार्टी ने न केवल अपने ही कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया, बल्कि भय और संदेह का ऐसा माहौल खड़ा किया जिसने आगे चलकर चीन की राजनीति को कठोर दिशा दी।
माओ त्से तुंग ने उत्तर-पश्चिमी चीन के यानान क्षेत्र में इस आंदोलन की अगुवाई की। उन्होंने दावा किया कि पार्टी में विचारों की शुद्धता लाने और विदेशी प्रभाव खत्म करने के लिए यह कदम जरूरी है। परंतु वास्तविकता यह रही कि उन्होंने इस प्रक्रिया के जरिए अपने विरोधियों को किनारे लगाया और खुद को सर्वोच्च नेता के रूप में स्थापित किया।
माओ ने पार्टी कैडरों को "आत्मालोचना" और "विचार सुधार" सत्रों में शामिल होने के लिए मजबूर किया। इन बैठकों में लोग घंटों खड़े होकर अपनी कथित गलतियों को स्वीकार करते। कई बार लोग झूठे आरोपों को भी सच मानकर बयान देते, क्योंकि वे सजा से डरते थे। इस तरह पार्टी ने भय को हथियार बनाया।
यानान सुधार आंदोलन के दौरान पार्टी ने हजारों कार्यकर्ताओं पर जासूसी, गुटबाजी और वैचारिक विचलन के आरोप लगाए। पार्टी ने कई लोगों को हिरासत में लिया। पूछताछ के दौरान कठोर व्यवहार अपनाया गया। कुछ मामलों में शारीरिक यातना भी दी गई। कई लोगों ने मानसिक दबाव के कारण आत्महत्या तक कर ली।
पार्टी नेतृत्व ने आलोचना को देशद्रोह जैसा अपराध बताया। जिसने सवाल उठाया, उसे दुश्मन करार दिया गया। इस रवैये ने पार्टी के भीतर स्वस्थ बहस की परंपरा खत्म कर दी। परिणामस्वरूप, संगठन में केवल एक व्यक्ति की सोच हावी हो गई।
माओ ने इस आंदोलन के जरिए वैचारिक प्रशिक्षण शिविर चलाए। उन्होंने मार्क्सवाद की अपनी व्याख्या को ही अंतिम सत्य घोषित किया। उन्होंने सोवियत मॉडल से अलग अपनी लाइन को श्रेष्ठ बताया और जो लोग असहमत दिखे, उन्हें संदिग्ध बना दिया।
इस प्रक्रिया ने पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर किया। माओ ने सामूहिक नेतृत्व की जगह व्यक्तिगत नियंत्रण स्थापित किया। आगे चलकर यही सोच "ग्रेट लीप फॉरवर्ड" और "सांस्कृतिक क्रांति" जैसे अभियानों में दिखी, जिनसे करोड़ों लोग प्रभावित हुए।
- पहला, उसने विचारों की स्वतंत्रता खत्म की। पार्टी ने अपने ही सदस्यों को खुले मन से सोचने की अनुमति नहीं दी।
- दूसरा, उसने भय का वातावरण बनाया। आत्मालोचना के नाम पर सार्वजनिक अपमान कराया गया।
- तीसरा, उसने कानून और पारदर्शिता की अनदेखी की। आरोपों की जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं हुई।
- चौथा, उसने सत्ता के केंद्रीकरण को वैचारिक शुद्धिकरण का नाम दिया।
- पांचवां, उसने व्यक्तिपूजा को बढ़ावा दिया। माओ की छवि को सर्वोच्च और अचूक बताया गया।
इन कदमों ने आगे चलकर चीन में असहमति के लिए जगह और भी संकरी कर दी।
यानान सुधार आंदोलन ने चीन की राजनीति की दिशा तय की। पार्टी ने इसी मॉडल को बाद के दशकों में भी अपनाया। असहमति को कुचलने की नीति ने समाज में डर की संस्कृति पैदा की। जनता ने खुले संवाद की बजाय चुप्पी को सुरक्षित विकल्प माना।
आज भी जब दुनिया चीन की राजनीतिक व्यवस्था को देखती है, तो उसे वही केंद्रीकृत और नियंत्रित ढांचा नजर आता है जिसकी नींव यानान में पड़ी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने वैचारिक एकता के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों को दबाया और सत्ता को सर्वोच्च रखा।
इस तरह यानान सुधार आंदोलन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं रहा। उसने चीन के राजनीतिक चरित्र को आकार दिया। पार्टी ने सुधार के नाम पर दमन का रास्ता चुना और असहमति को अपराध बना दिया।
लेख
शोमेन चंद्र