एर्राबोर की वह भयावह रात, जब माओवादियों ने 33 निर्दोषों को जिंदा जला दिया

गोलियों और आग के बीच फंसे ग्रामीण, एर्राबोर में माओवादी हिंसा ने पूरे देश को झकझोरा।

The Narrative World    28-Feb-2026
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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का एर्राबोर गांव आज भी उस भयावह रात की गवाही देता है। जगदलपुर से दरभा और झीरम घाटी होते हुए सुकमा पहुंचिए, फिर वहां से करीब 60 किलोमीटर आगे बढ़िए। यही वह एर्राबोर है, जहां जुलाई 2006 की रात माओवादियों ने ऐसा नरसंहार किया जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। उस रात बंदूक और आग ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
 
सलवा जुडूम अभियान शुरू होने के बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण नक्सलियों के डर से अपने घर छोड़कर एर्राबोर पहुंचे। उन्होंने मुख्य सड़क के पास बने शिविर में शरण ली। वे सोचते थे कि यहां उन्हें सुरक्षा मिलेगी और बच्चे भय से दूर रहेंगे। लेकिन माओवादियों ने उनकी उम्मीदों को राख में बदल दिया।
 
रात गहराते ही माओवादियों ने गांव को चारों ओर से घेर लिया। उन्होंने पहले गोलियां चलाईं, फिर आग लगा दी। उन्होंने 200 से अधिक घरों को जला दिया। चीखें उठीं, बच्चे रोए, महिलाएं दया की गुहार लगाती रहीं, लेकिन बंदूक थामे हमलावरों ने किसी की नहीं सुनी। हमलावरों ने 33 निर्दोष ग्रामीणों को जिंदा जला दिया। उन्होंने एक आठ महीने की जनजातीय बच्ची तक को नहीं छोड़ा। आग की लपटों ने उस मासूम को निगल लिया। यह क्रूरता किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि रक्तरंजित आतंक की पहचान है।
 
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आज भी एर्राबोर के पीड़ित उस रात को याद कर कांप उठते हैं। कई परिवारों ने एक साथ अपने कई सदस्यों को खो दिया। कई बच्चे अनाथ हो गए। गांव की मिट्टी ने उस रात बारूद और जलते मांस की गंध महसूस की। यह कोई युद्ध नहीं था, यह सीधा हमला था उन गरीब जनजातीय परिवारों पर जिन्होंने केवल सुरक्षित जीवन की इच्छा की।
 
माओवादी खुद को क्रांतिकारी बताते हैं, लेकिन एर्राबोर ने उनका असली चेहरा दिखा दिया। वे जनजातीय समाज की रक्षा नहीं करते, बल्कि उन्हें अपनी हिंसक राजनीति का मोहरा बनाते हैं। वे गांवों में भय फैलाते हैं, विकास कार्यों को रोकते हैं और बच्चों के हाथों में किताब की जगह बंदूक थमाने की कोशिश करते हैं। एर्राबोर की घटना ने साफ कर दिया कि नक्सलवाद कोई सामाजिक आंदोलन नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट आतंकवाद है।
 
 
इसके साथ ही हमें उन तथाकथित शहरी नक्सलियों को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने शहरों में बैठकर इन हत्यारों का बचाव किया। कुछ लोगों ने संसद और अदालतों में बैठकर माओवादियों के लिए तर्क गढ़े। कुछ ने मीडिया मंचों से उन्हें वैचारिक आवरण देने की कोशिश की। लेकिन एर्राबोर की जली हुई झोपड़ियां और राख में बदले घर इन दावों को झूठा साबित करते हैं। जो लोग हिंसा का समर्थन करते हैं, वे भी इस अपराध की नैतिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
 
यह घटना हमें सचेत करती है कि जब तक समाज एकजुट होकर माओवादी हिंसा का विरोध नहीं करेगा, तब तक ऐसे हमले दोहराने की कोशिश होती रहेगी।
 
 
जो विचार आग और हत्या से आगे बढ़ता है, वह अंततः समाज को ही जलाता है। इसलिए आवश्यक है कि हम हिंसा के हर रूप को ठुकराएं और उन शक्तियों को बेनकाब करें जो निर्दोषों के खून पर अपनी विचारधारा खड़ी करना चाहती हैं।
 
लेख
शोमेन चंद्र