तिब्बत कभी मध्य एशिया की एक बड़ी शक्ति और बौद्ध संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा। पहले मंगोलों और फिर चीन ने उस पर नियंत्रण स्थापित किया। 1913 में तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता फिर हासिल की, लेकिन 1949 के बाद हालात तेजी से बदले और यह क्षेत्र दुनिया के सबसे लंबे जातीय और सांस्कृतिक संघर्षों में फंस गया।
साल 1950 में चीन की
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर हमला किया और 1951 में उसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इस कदम के साथ ही दमन और सांस्कृतिक विनाश का दौर शुरू हुआ। 1959 में जब तिब्बतियों ने विद्रोह किया, तब चीन ने इसे कुचलने के लिए सख्त कार्रवाई की। इस दौरान हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई और समाज में भय का माहौल फैल गया।
विद्रोह के बाद चीन ने जबरन सामूहिक खेती लागू की और लोगों की आजादी पर कड़े प्रतिबंध लगाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1950 और 1960 के दशक में तिब्बत की बड़ी आबादी को श्रम शिविरों में भेजा गया। इन शिविरों में अमानवीय हालात के कारण कई लोगों की मौत हुई और जो बचे, उनकी सेहत पर गहरा असर पड़ा। कुछ इलाकों में तो केवल 10 प्रतिशत लोग ही स्वस्थ अवस्था में लौट पाए।
इसी दौरान तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को देश छोड़ना पड़ा। वह लगभग एक लाख तिब्बतियों के साथ भारत आ गए। इनमें बड़ी संख्या में शिक्षित और प्रभावशाली लोग शामिल थे। इससे तिब्बत की सामाजिक और बौद्धिक संरचना को गहरा झटका लगा।
1959 से 1963 के बीच चीन में आए भयानक अकाल का असर भी तिब्बत पर पड़ा। अलग-अलग स्रोतों के अनुसार, इस दौरान करीब 70 हजार तिब्बती भूख से मर गए। इसके बाद 1965 में सांस्कृतिक क्रांति शुरू हुई, जिसने तिब्बत की पहचान को और नुकसान पहुंचाया। इस दौर में बौद्ध मठों, धार्मिक ग्रंथों और सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट किया गया। 1968 में बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं, जिससे तिब्बती समाज में गहरी पीड़ा और असुरक्षा फैल गई।
कुछ आकलनों के अनुसार, सांस्कृतिक क्रांति के अंत तक तिब्बत में मृतकों की संख्या 10 लाख तक पहुंच गई। हालांकि सही आंकड़े जुटाना मुश्किल रहा, क्योंकि तिब्बत लंबे समय तक बाहरी दुनिया से अलग रहा और चीन ने भी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की।
1980 के दशक के बाद चीन ने तिब्बत में एक नई रणनीति अपनाई। उसने बड़े पैमाने पर चीनी नागरिकों को वहां बसाना शुरू किया। किंगहाई-तिब्बत रेलवे बनने के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई। इससे तिब्बत की जनसंख्या संरचना बदलने लगी। राजधानी ल्हासा में तिब्बतियों की हिस्सेदारी घटकर लगभग 42 प्रतिशत रह गई। अन्य इलाकों में भी खनन और विकास परियोजनाओं के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ा।
हालांकि 1980 के दशक के बाद दमन का स्तर कुछ कम हुआ, लेकिन यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 1987 के बाद हुए प्रदर्शनों में करीब 1000 लोगों की मौत दर्ज की गई। 2008 के विरोध प्रदर्शनों में भी सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को गिरफ्तार किया गया। भारत-नेपाल सीमा पर भाग रहे शरणार्थियों पर गोलीबारी की घटनाएं भी सामने आईं।
तिब्बत में राजनीतिक कैदियों की संख्या हजारों में बताई जाती है। यातना और त्वरित सजा की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। हालांकि सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन विभिन्न रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि हालात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं।
तिब्बत में मौतों और दमन के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। 1984 में निर्वासित तिब्बती सरकार ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें 1945 से 1979 के बीच करीब 12 लाख लोगों की असामान्य या हिंसक मौत का दावा किया गया। इसमें जेलों और श्रम शिविरों में मरने वाले, फांसी दिए गए लोग, युद्ध में मारे गए लोग और भूख व यातना से मरने वाले शामिल हैं।
अमेरिकी कांग्रेस के अनुमान के अनुसार, 1959 से 1979 के बीच करीब 10 लाख लोगों की मौत सीधे तौर पर राजनीतिक अस्थिरता, कैद, भूख और दमन के कारण हुई। यह उस समय की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा था।
तिब्बत आज भी एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। यहां की सांस्कृतिक पहचान, जनसंख्या संतुलन और मानवाधिकारों को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर नजर रखता है, लेकिन स्थायी समाधान अभी भी दूर नजर आता है।
लेख
शोमेन चंद्र