नक्सलवाद को लेकर वर्षों तक यह धारणा बनी रही कि यह गरीबी और विकास की कमी से पैदा हुआ आंदोलन है। लेकिन आज, 31 मार्च 2026, जब देश नक्सलवाद के तय समयसीमा वाले अंत का साक्षी बन रहा है, यह साफ हो गया है कि यह सोच पूरी तरह गलत थी। लोकसभा में अमित शाह ने स्पष्ट कहा था कि नक्सलवाद ने गरीबी को जन्म दिया, न कि गरीबी ने नक्सलवाद को। अब जब देश इस समस्या पर निर्णायक विजय की ओर बढ़ चुका है, तो यह तथ्य और भी मजबूती से सामने आया है।
अमित शाह द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों ने पहले ही यह
स्पष्ट कर दिया था कि नक्सलवाद का संबंध आर्थिक पिछड़ेपन से नहीं था। 1960 के दशक में नक्सलबाड़ी, बस्तर, सहारसा और बलिया जैसे क्षेत्रों में साक्षरता और प्रति-व्यक्ति आय लगभग समान स्तर पर थी। इसके बावजूद नक्सलवाद केवल उन्हीं क्षेत्रों में फैला, जहाँ भौगोलिक कठिनाइयाँ और प्रशासनिक पहुँच सीमित रही।
यदि गरीबी ही मुख्य कारण होती, तो देश के सभी पिछड़े क्षेत्रों में नक्सलवाद फैलता। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। आज, जब सरकार ने इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर दी है और सुरक्षा बलों ने अंतिम प्रहार किया है, यह साफ दिखता है कि नक्सलवाद की जड़ें आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और वैचारिक थीं।
नक्सलवाद का असली आधार कट्टर माओवादी विचारधारा रही, जिसने जनजातीय समाज को भ्रमित किया। जिन इलाकों में बिरसा मुंडा जैसे महान नेताओं की परंपरा थी, वहां नक्सलियों ने हिंसा और भ्रम का जाल फैलाया।
नक्सलियों ने विकास के हर प्रयास को निशाना बनाया। स्कूलों को उड़ाया, सड़कों को तोड़ा, अस्पतालों को नुकसान पहुँचाया। उन्होंने जानबूझकर इन क्षेत्रों को पिछड़ेपन में धकेला, ताकि उनका प्रभाव बना रहे। लेकिन आज, जब इन इलाकों में विकास की रोशनी पहुँची है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी विचारधारा जनता के हित में कभी नहीं थी।
सरकार ने जो लक्ष्य तय किया था, वह आज ऐतिहासिक रूप से साकार होता दिख रहा है। 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के अंत की समयसीमा केवल एक तारीख नहीं, बल्कि देश के सामूहिक संकल्प का प्रतीक बन गई है।
पिछले वर्षों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है। हर गाँव तक सड़कें पहुँचीं, स्कूल खुले, स्वास्थ्य सेवाएँ मजबूत हुईं और जनकल्याण योजनाओं का सीधा लाभ लोगों तक पहुँचा। सुरक्षा बलों ने भी निर्णायक कार्रवाई करते हुए नक्सली नेटवर्क को लगभग खत्म कर दिया।
आज बस्तर जैसे इलाके, जो कभी नक्सलवाद के गढ़ माने जाते थे, अब विकास और शांति की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह बदलाव दिखाता है कि जब राज्य की पहुँच मजबूत होती है और जनता को अवसर मिलते हैं, तो हिंसा की विचारधारा स्वतः कमजोर हो जाती है।
यह लड़ाई केवल सुरक्षा बलों की नहीं थी, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की भी थी। सरकार ने साफ संदेश दिया कि बंदूक के बल पर कोई विचारधारा नहीं टिक सकती। संवाद, विकास और संवैधानिक व्यवस्था ही स्थायी समाधान देते हैं।
अमित शाह ने स्पष्ट कहा था कि हथियार उठाना कभी भी लोकतांत्रिक रास्ता नहीं हो सकता। आज देश इस सत्य को प्रत्यक्ष रूप से देख रहा है। नक्सलवाद की समाप्ति यह साबित करती है कि भारत का लोकतंत्र हर चुनौती से मजबूत होकर निकलता है।
आज, 31 मार्च 2026, केवल एक तारीख नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक उपलब्धि का दिन है। यह दिन बताता है कि नक्सलवाद गरीबी की नहीं, बल्कि एक भटकी हुई विचारधारा की उपज था और अंततः वही विचारधारा हार गई।
देश ने यह साबित कर दिया है कि विकास, शिक्षा और लोकतंत्र ही असली ताकत हैं। जब सरकार और समाज मिलकर काम करते हैं, तो सबसे बड़ी चुनौतियाँ भी खत्म हो जाती हैं। अब आगे की जिम्मेदारी है कि इन क्षेत्रों में विकास की गति को और तेज रखा जाए, ताकि ऐसी विचारधाराएँ फिर कभी सिर न उठा सकें।
लेख
शोमेन चंद्र