क्या भूपेश बघेल नहीं चाहते कि देश से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो?

क्या बघेल की राजनीति नक्सलवाद और अवैध धर्मांतरण पर सख्त कार्रवाई के खिलाफ खड़ी दिखती है?

The Narrative World    11-Apr-2026   
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छत्तीसगढ़ की राजनीति में हाल ही में दिए गए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बयान ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बघेल ने कहा कि यदि सरकार नक्सलवाद खत्म होने का दावा करती है तो मंत्रियों और विधायकों को अपनी Z+ सुरक्षा छोड़ देनी चाहिए और बस्तर से सुरक्षा कैंप हटाने चाहिए। लेकिन क्या यह बयान वास्तव में देशहित में है, या फिर इससे नक्सलियों को दोबारा पांव पसारने का अवसर मिलेगा?
 
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि देश ने नक्सलवाद के खिलाफ कितनी बड़ी लड़ाई लड़ी है। सुरक्षाबलों ने वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में काम किया, अनेक जवानों ने बलिदान दिया और सरकार ने रणनीतिक तरीके से अभियान चलाया। हाल ही में 31 मार्च को भारत लगभग नक्सल मुक्त स्थिति की ओर बढ़ा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या बघेल इस उपलब्धि से संतुष्ट नहीं हैं? क्या वे चाहते हैं कि इतनी मेहनत के बाद भी देश फिर उसी अंधेरे दौर में लौट जाए?
 
 
बघेल का यह कहना कि सुरक्षा कैंप हटाने से ही नक्सलवाद खत्म माना जाएगा, वास्तविकता से दूर नजर आता है। सुरक्षा कैंप केवल सैन्य उपस्थिति नहीं होते, बल्कि वे स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षा का भरोसा भी बनते हैं। यदि इन कैंपों को हटा दिया जाए, तो क्या यह नक्सलियों को फिर से सक्रिय होने का खुला निमंत्रण नहीं होगा? क्या बघेल यह चाहते हैं कि बस्तर और आसपास के इलाके फिर से भय और हिंसा के साए में आ जाएं?
 
इसके साथ ही उन्होंने Z+ सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठाया। लेकिन यह समझना जरूरी है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल व्यक्तिगत सुविधा नहीं होती, बल्कि यह राज्य की स्थिरता और नेतृत्व की सुरक्षा से जुड़ी होती है। यदि नेताओं की सुरक्षा कम कर दी जाए, तो क्या इससे अराजक तत्वों को बढ़ावा नहीं मिलेगा? यह सोच अपने आप में चिंताजनक है।
 
 
अब बात करते हैं धर्म स्वातंत्र्य विधेयक की। बघेल ने इस विधेयक को राजनीति से जोड़ने की कोशिश की। लेकिन यह विधेयक एक बेहद महत्वपूर्ण उद्देश्य को पूरा करता है, वह है अवैध और जबरन धर्मांतरण पर रोक लगाना। सवाल यह उठता है कि इस विधेयक से आखिर किसे परेशानी हो सकती है? जो लोग स्वेच्छा से धर्म का पालन करते हैं, उन्हें इससे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
 
यदि कोई इस कानून का विरोध करता है, तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि वह अवैध धर्मांतरण को जारी रखना चाहता है? क्या बघेल यह चाहते हैं कि गरीब और कमजोर वर्गों को लालच या दबाव में धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाए? यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।
 
 
बघेल ने अपने कार्यकाल के आंकड़े गिनाए, लेकिन केवल 15 शिकायतों का हवाला देना इस गंभीर समस्या को छोटा दिखाने का प्रयास लगता है। आज जरूरत है कि हम इस मुद्दे को व्यापक दृष्टिकोण से देखें और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार का जबरन या अवैध धर्मांतरण न हो।
 
स्पष्ट है कि देश आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ सुरक्षाबलों और सरकार के प्रयासों से नक्सलवाद लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका है, वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक बयान इस संघर्ष को कमजोर करने का काम करते नजर आते हैं। देश की जनता यह जानना चाहती है कि क्या बघेल वास्तव में नक्सलवाद के पूर्ण अंत के पक्ष में हैं, या फिर उनके बयान किसी और दिशा की ओर इशारा करते हैं?