जाति बनाम सभ्यता: क्या हम फिर वही गलती दोहरा रहे हैं?

2014 और 2017 के चुनावों ने उत्तरप्रदेश में जातिगत राजनीति से ऊपर उठने की उम्मीद जगाई थी। लेकिन समय के साथ फिर वही जातीय असंतोष और पहचान की राजनीति लौटती दिख रही है। संकट के समय समाज एकजुट होता है, लेकिन सुरक्षा मिलते ही फिर विभाजनों में बंटने लगता है, और यही प्रवृत्ति इतिहास में भारत की सबसे बड़ी कमजोरी बनी।

The Narrative World    10-May-2026   
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2014 के आम चुनावों के रिजल्ट जिस दिन आये थे, कई देशवासियों की तरह मैं भी बहुत खुश था। राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व परिवर्तन की खुशी तो थी ही, एक और खुशी भी हुई थी जिसे मैंने आह्लादित होकर लिखा था कि लगता है उत्तरप्रदेश ने खुद को बदल लिया है।


ऐसा इसलिए कि मैं उत्तरप्रदेश का मूलनिवासी होने के कारण यह महसूस करने लगा था और एक तरह से इतने अवसाद में था कि क्या हुआ है मेरे लोगों को, जो वे पता नहीं क्या सोचकर वोट देते हैं। मैं कथित तौर पर सवर्ण बिरादरी से आता हूँ। देखा है कि ब्राह्मण बसपा को जिताता था और राजपूत सपा को। दलित बसपा के और ओबीसी सपा के बंधुआ जैसे लगते थे। पर 2014 में जैसे नया सूर्य निकला था। लोगों ने जातिगत सोच से ऊपर उठकर वोट किया था।


2017 में यूपी ने फिर से कमाल किया। मैं अभी के बंगाल के लोगों की भावनाएं बखूबी समझ सकता हूँ। जैसे तब मैंने मुक्ति की सांस ली थी कि लोग जाति की घुटन से निकल गए, वैसे ही बंगालियों ने सांस ली होगी कि वे दमघोंटू फर्जी विचारधारा और झूठे सेकुलरिज्म से मुक्त हुए। हर मौके पर सबने विशाल विराट हिंदुत्व को चुना।


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मैं बंगाल को लेकर खुश हूं, पर यूपी में फिर से उसी दमघोंटू वातावरण की आहट महसूस कर रहा हूँ। लगता है कि जैसे बीमारी से स्वस्थ हुआ शरीर फिर से खुद को जानबूझकर बीमार करने पर तुला है। डाइबिटीज का मरीज शुगर छोड़ स्वस्थ हुआ ही था कि फिर से जहर समान मिठाई को देख ललच रहा है।


लोग नाराज हैं कि यह सरकार सवर्ण विरोधी है। क्यों है? क्योंकि इसने यूजीसी के नए नियम बनाये थे। यूजीसी पर मेरा दृढ़ विरोध है, जिसे मैंने कई बार व्यक्त किया है। पर लोग अपने विरोध को बस यूजीसी तक सीमित रखने में असमर्थ दिख रहे हैं। लगता है कि वे बस मौका खोज रहे थे। मौका मिला तो शुरू हो गए और हर उस चीज का विरोध करने लगे जिसका आधार जाति है।


मैं भी मानता हूँ कि आरक्षण, किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज के लिए उचित नहीं। लेकिन क्या आज के भारत की राजनीति में कोई भी दल आरक्षण का विरोध करके सफल हो सकता है?


“पिछला आमचुनाव क्या सब इतनी जल्दी भूल गए? पिछले आमचुनाव में विपक्ष ने हल्ला मचाया था कि अगर 400 पार हुआ तो सरकार संविधान बदल देगी। और बदलेगी क्या, आरक्षण की व्यवस्था। बस इस अफवाह ने, आरक्षण हट जाने के भय से बीजेपी की सीट कम हो गई। बनारस में मोदी जी बहुत कम मार्जिन से जीते। और अयोध्या तो हार ही गए।”


हालांकि लोगों को शायद अपनी गलती का अहसास जल्द ही हो गया, और बाद के सभी राज्यों के चुनाव बीजेपी को जितवाते चले गए।


आप सोचिए कि एक पॉलिटिकल पार्टी अपने पिछले प्रदर्शन को देख क्या करेगी कि वो फिर से दलित, ओबीसी को खुद से जोड़ सके? उसने देखा कि आरक्षण हटने के भय से लोग दूर हुए, तो कुछ तो करेगी ही कि वे वापस जुड़ जाएं। सत्ता में रहेगी, तभी कुछ कर पायेगी, और सत्ता क्या मात्र हिंदुत्व के भरोसे मिल जाएगी?


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हाँ। मिलेगी, मिली है, पर कब? जब सत्ता किसी ऐसे के पास हो जो हिंदुत्व का विरोधी हो। जब गैर हिंदुओं के प्रति अति-अपीजमेंट हो। जब ब्राह्मण और दलित, राजपूत और यादव में फर्क किये बिना, उन्हें मात्र हिन्दू जानकर उनके साथ, स्त्रियों-बच्चियों के साथ, उनकी परंपराओं, उनकी धार्मिक मान्यताओं का सतत अपमान हो रहा हो। बस तभी हिन्दू जनता एकमत होकर ऐसी सत्ता के विरोध में बीजेपी के साथ खड़ी होती है, जैसे 2014 में किया, जैसे 2017 में यूपी में किया और जैसे अभी बंगाल में किया।


पर जब सत्ता बीजेपी के पास हो, जब कोई अपीजमेंट न हो रहा हो, जब लोगों को सहज सामान्य लगने लगे, हिन्दू विरोध जैसी कोई बात ही न हो, सब सुरक्षित महसूस करने लगे, तब लगता है कि हिन्दू बस हिन्दू नहीं रह पाता। वो हिंदुओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान के लिये छटपटाने लगता है। तब वो हो रहे कामों को जैसे नजरअंदाज सा कर देता है। वह सड़कों पर हुआ काम नहीं देखता। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए काम नहीं दिखते। तमाम सहूलियतों को, पहले मुश्किल से मिलने वाली चीजों को आसानी से मिलते देख उसे पिछली मुश्किलें याद ही नहीं रहती। सैन्य क्षेत्र में हुए डेवलपमेंट नहीं दिखते। उसका ब्राह्मणत्व जाग जाता है, राजपूतों की भुजाएं फड़कने लगती है, दलित को याद आता है कि उसपर तो सदियों तक अन्याय हुआ है।


सब भूल जाते हैं कि बस 5 साल, 10 साल, 15 साल पहले तक इन्हें एक ही मानकर इनके साथ क्या हो रहा था, देश का, प्रदेश का क्या हाल था और इन्हें याद आने लगता है कि 500 साल, 1000 साल पहले ये क्या थे। ऑपरेशन सिंदूर भूल जाता है, यूजीसी पकड़कर बैठ जाता है। वह किसी एक चीज से नाराज होता है, और चाणक्य बनकर जड़ों में मट्ठा डालने लगता है। शकुनि बन जाता है और लड़ाई के बहाने खोजता है।


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आपका तो नहीं पता, पर जब भी मैं सुनता था कि भारत एक महान देश था, कला, साहित्य, दर्शन, व्यापार में सर्वश्रेष्ठ था, जिसके प्रमाण आज भी दिखने वाले स्थापत्य में, तमाम साहित्य में, मिस्र और यूनान के कब्रों तक में दिख जाते हैं, वह आखिर कैसे सदियों तक गुलाम रहा। कैसे बंजर रेगिस्तान के लोग आए और हमें लूट कर चले गए। कैसे कुछ हजार घुड़सवार देश में घुसे और घुसते चले गए। कैसे उन्होंने इतने विशाल देश को घुटनों के बल बिठाकर सदियों तक जलील किया।


उत्तर तो खैर पता था, पर वह सैद्धांतिक रूप से पता था। अब लगता है कि प्रैक्टिकली देखने का अवसर बस दरवाजे पर खड़ा है। लोग मदमत्त हैं अपनी-अपनी जातियों में। अब उन्हें 'एक हैं तो सेफ हैं' जैसी बातें समझ नहीं आती, क्योंकि वे वर्तमान में किसी संकट में हैं ही नहीं। ऑलरेडी सेफ हैं, तो एक क्यों रहें? जब संकट आएगा तब फिर से हो लेंगे एक। आसान समीकरण है ना।