भोजशाला सरस्वती मंदिर है, कमाल मौला मस्जिद नहीं

धार की भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला आया, अदालत ने इसे राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर मानते हुए एएसआई का पुराना आदेश रद्द किया।

The Narrative World    16-May-2026
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15 मई 2026 को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच की न्यायमूर्ति विजय कुमार शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ द्वारा एक ऐतिहासिक फैसला दिया गया। इस फैसले में अब तक विवादग्रस्त धार नगर की भोजशाला को, जिसे एक पक्ष द्वारा कमाल मौला मस्जिद कहा जाता रहा है, मूलतः वाग्देवी सरस्वती का मंदिर स्वीकार किया गया है।
 
इस निर्णय के द्वारा वर्ष 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा जारी वह आदेश निरस्त कर दिया गया, जिसके अंतर्गत इस परिसर में मुसलमानों को शुक्रवार के दिन नमाज़ अदा करने का अधिकार दिया गया था। इस फैसले में न्यायालय ने निम्न प्रमुख बातें कही हैं:
 
1. इस भवन को मंदिर का दर्जा देते हुए इसे राजा भोज परमार (शासनकाल 1000 से 1055 ईस्वी) द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर घोषित किया गया।
 
2. मुसलमानों के शुक्रवार के दिन नमाज़ अदा करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया।
 
3. यह कहा गया कि मुसलमान सरकार से धार जिले में मस्जिद हेतु वैकल्पिक स्थान देने की प्रार्थना कर सकते हैं।
 
4. सरकार को ब्रिटिश म्यूज़ियम, लंदन से वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति वापस लाने का निर्देश दिया गया, जिसे वर्ष 1902 में लॉर्ड कर्जन के काल में धार से इंग्लैंड ले जाया गया था।
 
जानने योग्य है कि भोजशाला का निर्माण 13वीं सदी के प्रारंभ में राजा भोज परमार द्वारा करवाया गया था। यह सरस्वती मंदिर एक प्रमुख विद्या केंद्र था।
 
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इसके निर्माण के लगभग एक सदी बाद, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐनुल्मुल्क ने यहां तोड़-फोड़ की। तत्पश्चात 14वीं सदी के अंतिम वर्षों में एक सूफी कमालुद्दीन मौला यहां आया और 1401 ईस्वी में मालवा के सुल्तान दिलावर खां गौरी के काल में इस मंदिर को आंशिक रूप से तोड़कर इसका स्वरूप बदला गया। तभी से यहां नमाज़ अदा की जाती रही है, किन्तु हिन्दुओं द्वारा पूजा कभी बंद नहीं की गई।
 
लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व, 1903 ईस्वी में धार के मराठा शासक उदय राजे पंवार के काल में राज्य के शिक्षा विभाग के निदेशक काशीनाथ कृष्ण लेले ने इस भवन के हिन्दू लक्षणों से युक्त खंभों तथा संस्कृत और प्राकृत में उत्कीर्ण भित्ति अभिलेखों के आधार पर इसे भोजशाला नाम दिया।
 
1904 में भोपावर स्थित वायसराय के राजनीतिक एजेंट कप्तान एडवर्ड बार्न्स, जिन्हें पुरातात्विक स्थलों में विशेष रुचि थी, ने लिखा कि जनसामान्य इसे राजा भोज का मदरसा कहते थे। वहीं 1908 के गजेटियर में इसे राजा भोज का विद्यालय बताया गया है।
 
इन सब तथ्यों के बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वर्ष 2003 में मंगलवार के दिन हिन्दुओं को पूजा का अधिकार देने के साथ ही मुसलमानों को शुक्रवार के दिन नमाज़ का अधिकार भी प्रदान किया। शेष दिनों में यह परिसर दर्शकों के लिए खुला रहता था।
 
 
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बसंत पंचमी के दिन हिन्दू यहां परंपरागत रूप से अखंड पूजा करते हैं। 23 जनवरी 2026 को बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ने के कारण यहां हिन्दू और मुसलमान समुदायों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। बाद में न्यायालय ने दोनों समुदायों को अलग-अलग समय देकर पूजा और नमाज़ की अनुमति प्रदान कर स्थिति को नियंत्रित किया।
 
मार्च 2024 में धार के हिन्दू समुदाय द्वारा इस मंदिर पर मुसलमानों का दखल समाप्त करने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई। न्यायालय ने कहा कि इस भवन के वास्तविक स्वरूप का निर्धारण किया जाना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय ने भी इस प्रक्रिया को स्वीकार किया। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को विस्तृत सर्वेक्षण करने का आदेश दिया गया।
 
 
पुरातत्व सर्वेक्षण ने व्यापक जांच कर 10 जिल्दों में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। सम्भवत: इसी रिपोर्ट का सार न्यायालय के निर्णय का आधार बना।
 
इस निर्णय को ऐतिहासिक निर्णय कहना किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगी।
 
लेख
महावीर प्रसाद जैन
वरिष्ठ स्तंभकार