मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और उनकी धार्मिक भागीदारी को लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई ने न केवल देश के भीतर, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक व्यापक विमर्श को जन्म दिया है। इस संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दे पर दुनिया भर के महिला अधिकार संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और विशेष रूप से 'इस्लामिक नारीवाद' (Islamic Feminism) से जुड़ी विचारकों की राय बेहद स्पष्ट, तार्किक और प्रगतिशील है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस विमर्श को केवल एक कानूनी विवाद के रूप में नहीं, बल्कि लैंगिक समानता और मानवीय गरिमा की एक बड़ी लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर इस पूरे विमर्श को निम्नलिखित चार मुख्य स्तंभों के तहत समझा जा सकता है:
1. धार्मिक स्थलों पर पूर्ण और सम्मानजनक पहुंच (Dignified Access)
वैश्विक स्तर पर मुस्लिम पर्सनल लॉ में समानता और न्याय के लिए काम करने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन 'मसावा' (Musawah) और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं का मानना है कि महिलाओं को केवल "प्रवेश की अनुमति" (Permitted Access) देना मात्र काफी नहीं है। वास्तविक समानता तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक कि वह गरिमापूर्ण न हो।
कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यदि महिलाओं को अलग, संकीर्ण या पिछले रास्तों से प्रवेश दिया जाता है, या फिर उन्हें पुरुषों की नजरों से पूरी तरह छुपाकर पीछे के बंद कमरों या तहखानों में जगह दी जाती है, तो यह उनके आत्मसम्मान और धार्मिक गरिमा को ठेस पहुंचाता है। वैश्विक विचारकों के अनुसार, महिलाओं को मुख्य प्रार्थना गृह (Musallah) तक दृश्य और श्रव्य पहुंच (Visual and Auditory Access) मिलनी चाहिए। जब तक वे मुख्य धार्मिक विमर्श और आध्यात्मिक प्रक्रिया को देख और सुन नहीं सकेंगी, तब तक वे स्वयं को इस व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा महसूस नहीं कर पाएंगी।
2. 'अनिवार्य नहीं' के तर्क की तार्किक समीक्षा
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) जैसी संस्थाओं द्वारा अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इस्लाम में महिलाओं के लिए मस्जिद में जाकर सामूहिक नमाज पढ़ना "अनिवार्य (Farz) नहीं है, बल्कि उनके लिए यह वैकल्पिक है।" अंतरराष्ट्रीय नारीवादी विचारकों ने इस तर्क की कड़ी समीक्षा की है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक रूप से जो चीज़ 'अनिवार्य नहीं' है, उसे 'प्रतिबंधित' या 'हतोत्साहित' करने का हथियार नहीं बनाया जा सकता। ऐच्छिक या वैकल्पिक होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि उस पर सामाजिक या संस्थागत पाबंदी लगा दी जाए। यदि कोई महिला अपनी आध्यात्मिक उन्नति और इच्छा से सार्वजनिक इबादतगाह में जाना चाहती है, तो पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्थाएं (Patriarchal Social Structures) और रूढ़िवादी व्याख्याएं उसकी राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं।
3. वैश्विक उदाहरण और ऐतिहासिक तुलना
अंतर्राष्ट्रीय महिला कार्यकर्ता इस बात को प्रमुखता से रेखांकित करती हैं कि दक्षिण एशिया (विशेषकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) की तुलना में दुनिया के अन्य हिस्सों में स्थिति काफी भिन्न और प्रगतिशील है।
इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल: मक्का की मस्जिद अल-हरम (काबा) और मदीना की मस्जिद-अन-नबवी में सदियों से महिलाएं और पुरुष दोनों बिना किसी भेदभाव के इबादत के लिए जाते रहे हैं।
आधुनिक मुस्लिम समाज: इंडोनेशिया, तुर्की, मोरक्को के साथ-साथ अमेरिका और यूरोपीय देशों की आधुनिक मस्जिदों में महिलाओं के लिए बेहतरीन, सुलभ और सम्मानजनक स्थान बने हुए हैं।
कार्यकर्ताओं का यह बुनियादी सवाल है कि जब स्वयं इस्लाम के मूल इतिहास में और वैश्विक स्तर पर महिलाओं को यह अधिकार प्राप्त है, तो दक्षिण एशिया की मस्जिदों में पारंपरिक और स्थानीय रूढ़िवादी सोच के कारण उन्हें इस अधिकार से वंचित क्यों रखा जा रहा है?
"वैश्विक स्तर पर और खुद इस्लाम के मूल इतिहास में महिलाओं को जो अधिकार प्राप्त थे, उन्हें दक्षिण एशिया की पारंपरिक सोच के कारण दबाया नहीं जा सकता।"
4. मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का संतुलन
संयुक्त राष्ट्र (UN) की विभिन्न समितियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर महिला अधिकारों की वकालत करने वाले विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत के संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 और 26) असीमित या निरपेक्ष नहीं हो सकती। इसे हमेशा 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality), सार्वजनिक व्यवस्था और मानवीय गरिमा के अधीन होना ही होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी नागरिक को केवल उसके लिंग (Gender) के आधार पर किसी सार्वजनिक या धार्मिक स्थान से दूर रखना आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और बुनियादी मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है। धर्म की कोई भी ऐसी व्याख्या जो नागरिक अधिकारों को छोटा करती हो, आधुनिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
निष्कर्ष: वैश्विक सुधार की ओर एक ऐतिहासिक मोड़
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चल रही यह सुनवाई केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय महिला कार्यकर्ता और सुधारवादी संगठन भारत के इस मामले को एक बड़ी उम्मीद की नजर से देख रहे हैं। उनका मानना है कि यदि भारतीय न्यायपालिका महिलाओं के पक्ष में एक स्पष्ट, प्रगतिशील और अधिकार-आधारित (Rights-based) फैसला सुनाती है, तो इसका असर पूरी दुनिया के मुस्लिम समाज पर पड़ेगा।
यह फैसला वैश्विक स्तर पर उन रूढ़िवादी ताकतों को एक कड़ा और स्पष्ट संदेश देगा जो धर्म की आड़ में लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देती हैं। अंततः, समानता केवल कागजों, वादों या कानूनी दलीलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे समाज के हर सार्वजनिक, सामाजिक और धार्मिक स्थान पर दिखने वाली एक जीवंत और व्यावहारिक हकीकत बनना होगा।
लेख
निपा बिंदेश शुक्ला
सचिव, स्त्री चेतना गुजरात (भारतीय स्त्री शक्ति से संबद्ध)
संस्थापक एवं प्रोप्राइटर, इन्फोसोल कंसल्टेंसी
संपादक एवं प्रकाशक, द नेक्स्टजेन चिल्ड्रन्स डिजिटल न्यूज़पेपर