
विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के आधार पर न केवल नार्वे की वह पत्रकार बातें कर रही है, बल्कि भारत में राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्य पत्रकार भी सोशल मीडिया में जमकर भारत का उपहास उड़ा रहे हैं। दरअसल इस इंडेक्स में प्रत्येक देश को 0 से 100 के बीच स्कोर दिया जाता है, जिसमें 100 सबसे बेहतर (अधिकतम स्वतंत्रता) और 0 सबसे खराब। यह अंक दो घटकों पर आधारित है: पहला, पत्रकारों के विरुद्ध दुर्व्यवहार का मात्रात्मक आकलन; और दूसरा, 25 भाषाओं में उपलब्ध RSF प्रश्नावली पर प्रेस स्वतंत्रता विशेषज्ञों की गुणात्मक प्रतिक्रियाएं होती हैं।
इसमें पाँच संदर्भात्मक संकेतक उपयोग किए जाते हैं जिनका समान भार होता है: 1. राजनीतिक संदर्भ (Political Context), 2. कानूनी ढांचा (Legal Framework) 3. आर्थिक संदर्भ (Economic Context), 4. सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ (Sociocultural Context), 5. सुरक्षा (Safety)
दुर्व्यवहार की गंभीरता के अनुसार भार-गुणांक (coefficients) निर्धारित हैं, जैसे मीडिया संस्थान को बंद कराने या बर्बरता के लिए गुणांक 1 है, जबकि अपहरण या जबरन गुमशुदगी के लिए 50 है। वहीं इसके प्रश्नावली में 87 प्रश्न होते हैं जो पत्रकारों, वकीलों और समाजशास्त्रियों को भेजे जाते हैं। इसका अनुवाद 20 भाषाओं में किया जाता है। पर कुछ सच्चाइयाँ इस सूचकांक के बारे में ऐसी हैं, जिसे जानना आवश्यक है।

इस सर्वे में लगभग 150 उत्तरदाताओं और 18 NGOs से 83 प्रश्नों के आधार पर प्रत्येक देश का मूल्यांकन करवाया जाता है। औसतन एक देश के लिए एक ही उत्तरदाता होता है, यह कल्पना करना कठिन है कि एक व्यक्ति किसी पूरे देश में प्रेस की स्वतंत्रता का सटीक आकलन कर सके।
इसे Reporters Without Borders (RSF), फ्रेंच में Reporters Sans Frontières, नामक एक गैर-सरकारी संगठन तैयार करता है जो 2002 से हर साल 180 देशों की रैंकिंग प्रकाशित करता है। RSF का बजट लगभग 8 मिलियन यूरो (2022) था, जिसमें 52% फ्रांसीसी सरकार और यूरोपीय आयोग जैसी सरकारी संस्थाओं से आया। इसके अतिरिक्त 22% जॉर्ज सोरोस की Open Society Foundations और Ford Foundation जैसे विचारधारा-संरेखित निजी संगठनों से आया। इससे RSF की तथाकथित स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

RSF यह नहीं बताता कि प्रति देश कितने उत्तरदाता हैं, उनका भौगोलिक वितरण क्या है, उनकी संस्थागत संबद्धता, राजनीतिक झुकाव या जिस क्षेत्र का वे मूल्यांकन कर रहे हैं उससे उनका संबंध क्या है। इस पारदर्शिता के अभाव में यह जाँचना असंभव है कि सैंपल पर्याप्त विविध और स्वतंत्र है या नहीं?
इंडेक्स हार्ड डेटा; जैसे स्वतंत्र मीडिया संस्थानों की संख्या, मीडिया की पहुँच, प्रेस बहुलवाद, या इंटरनेट एक्सेस, पर आधारित नहीं है, बल्कि पूरी तरह धारणाओं और राय पर निर्भर है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से एक गंभीर कमज़ोरी है। यह तथ्य के ऊपर राय को वरीयता देता है।
राज्य-नियंत्रित मीडिया वाले देशों को इस सूचकांक में स्पष्ट लाभ मिलता है। कतर जैसे देशों में शाही परिवार की आलोचना अपराध है और रवांडा में RSF के अनुसार राज्य पत्रकारों की जासूसी करता है, फिर भी ये देश भारत से बेहतर रैंक पाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जहाँ प्रेस की आवाज ही नहीं है, वहाँ कोई टकराव नजर नहीं आता।

इंडेक्स की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन देशों में पत्रकार वास्तव में मारे जा रहे हैं, वे भारत से बेहतर रैंक पाते हैं। 2024 में RSF के अनुसार सबसे घातक देश थे फिलिस्तीन पाकिस्तान, मेक्सिको, सूडान और इराक, फिर भी इनकी रैंकिंग भारत से ऊपर थी। यह जमीनी हकीकत और सर्वेक्षण-आधारित धारणा के बीच की खाई को उजागर करता है।
सर्वेक्षण करने वाले विशेषज्ञों की पहचान गोपनीय रखी जाती है और उनके चयन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। इससे वैचारिक पूर्वाग्रह का स्पष्ट खतरा बना रहता है, क्योंकि न तो सार्वजनिक जवाबदेही है और न कि नमूने की कोई जाँच हो रही है।
RSF यह सार्वजनिक नहीं करता कि पाँच संकेतकों में से प्रत्येक का अंतिम स्कोर में क्या भार है। इससे कुछ मुद्दों को असंगत रूप से अधिक महत्व देना और दूसरों को नजरअंदाज करना संभव हो जाता है, जो कि वैज्ञानिक पारदर्शिता का उल्लंघन है।
इंडेक्स किसी देश में मीडिया प्लेटफॉर्म की कुल संख्या (टीवी, रेडियो, प्रिंट, ऑनलाइन) को ध्यान में नहीं लेता। एक जीवंत मीडिया परिवेश जिसमें विविध माध्यम हों, जो स्वस्थ प्रेस का संकेत है, लेकिन उसे इंडेक्स में मान्यता नहीं मिलती।
सिंगापुर के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने WPFI को "पश्चिमी उदारवादियों के चश्मे से देखी गई एक व्यक्तिपरक माप" कहा था। ब्रिटेन के शिक्षाविदों और प्रेस पेशेवरों ने भी कहा कि "प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक मीडिया का एकरूप दृष्टिकोण अपनाते हैं जो देशों की तुलना तो सुविधाजनक बनाता है, लेकिन यह चुनौती बनी रहती है कि 'मीडिया' एक समग्र शब्द है।"
भारत जैसे देश जो स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हैं या डिजिटल विनियमन जैसे मुद्दों पर पश्चिमी दबाव का विरोध करते हैं, उन्हें अक्सर असंगत रूप से आलोचना की जाती है, क्योंकि उनकी नीतियाँ पश्चिमी आख्यान से मेल नहीं खातीं।

जब भारत ने वर्ष 2021 में IT नियम लागू किए तो RSF ने उन्हें सत्तावादी बताया और इंडेक्स में इसका असर दिखा। लेकिन यही आलोचक तब चुप रहे जब यूरोपीय संघ ने Digital Services Act या ऑस्ट्रेलिया ने Online Safety Act लागू किए, जो भारत के उन्हीं नियमों से मिलते-जुलते थे। यह दोहरा मानदंड इंडेक्स की निष्पक्षता पर गहरा प्रश्न उठाता है।
इंडेक्स की पद्धति और व्यक्तिपरक पूर्वाग्रहों को लेकर हंगरी, भारत सहित कई देशों की सरकारों ने आपत्ति जताई है। RSF का दावा है कि वह एक तटस्थ संस्था है, लेकिन न तो इसका कोई स्वतंत्र पियर-रिव्यू होता है, न ही कोई वैकल्पिक ऑडिट की व्यवस्था है।
दुर्व्यवहार और हिंसा के आंकड़ों के लिए न तो स्पष्ट रूप से परिभाषित और विश्वसनीय स्रोत उपलब्ध हैं, न ही किसी भी देश की सरकार या देश-विशेष के स्रोतों से इन आंकड़ों को स्पष्ट करने का कोई प्रयास किया जाता है। यह किसी भी गंभीर शोध-पद्धति के विरुद्ध है।
तो भारत के किसी गुमनाम मीडिया आलोचक द्वारा किया गया भारत का आकलन हमारे देश का स्थान निर्धारण करता है। और वह कौन है, क्या है? किसी को पता नहीं। देश के सारे पत्रकारों के परिश्रम पर एक व्यक्ति का अभिमत हावी है।
लेख
मनोज श्रीवास्तव (सेनि आईएएस)
आयुक्त, राज्य निर्वाचन आयोग