बस्तर से दिल्ली तक जनजाति समाज का बड़ा अभियान, ST सूची से धर्मांतरितों की Delisting की मांग

बस्तर के सात जिलों से पहुंचे 1200 ग्रामीण राष्ट्रपति को सौंपेंगे ज्ञापन, धर्मांतरित जनजातियों की डी-लिस्टिंग की मांग हुई तेज।

The Narrative World    24-May-2026   
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देशभर में धर्मांतरित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर करने की मांग लगातार तेज हो रही है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से करीब 1,200 जनजाति ग्रामीण दिल्ली पहुंच रहे हैं। बस्तर के सात जिलों के ग्रामीण आज आयोजित "जनजाति सांस्कृतिक समागम" में हिस्सा लेंगे और राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपेंगे।
 
जनजाति समाज का दावा है कि करीब पांच लाख जनजाति इस अभियान में शामिल हो रहे हैं। सभी लोग धर्मांतरित परिवारों को ST और SC आरक्षण का लाभ दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि धर्म बदलने के बाद भी कई परिवार सरकारी योजनाओं और आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं। इससे मूल जनजाति समुदाय के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
 
बस्तर क्षेत्र लंबे समय तक नक्सलवाद की समस्या से जूझता रहा है। अब यहां धर्मांतरण नई चुनौती बनकर उभर रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव-गांव में ईसाई मिशनरी भोले-भाले जनजातियों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। इसके कारण जनजातीय समाज की पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक पहचान कमजोर हो रही है।
 
ग्रामीणों ने कई गांवों में अवैध चर्च संचालन का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि धर्मांतरित परिवार मिशनरियों से मिलने वाली सुविधाओं का लाभ भी लेते हैं और साथ ही जनजातियों के लिए बनी सरकारी योजनाओं का फायदा भी उठाते हैं। इससे मूल जनजाति समाज में नाराजगी लगातार बढ़ रही है।
 
जनजातियों का मानना है कि धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए डी-लिस्टिंग जरूरी कदम है। उनका कहना है कि जो लोग अपनी पारंपरिक आस्था और सामाजिक व्यवस्था छोड़ चुके हैं, उन्हें जनजातीय आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। लोग इसे सामाजिक न्याय और जनजातीय अधिकारों की रक्षा का मुद्दा बता रहे हैं।
 
उम्मीद है कि केंद्र सरकार और राष्ट्रपति उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेंगे। जनजाति समाज का विश्वास है कि सरकार धर्मांतरित परिवारों की डी-लिस्टिंग प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इस मांग को लेकर देश के कई राज्यों में जनजाति समाज लगातार आवाज उठा रहा है।