पुरुषार्थ, राष्ट्र और सावरकर का चिंतन

वीर सावरकर केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि राष्ट्र चेतना के ऐसे विचारक थे जिन्होंने अपनी लेखनी और पुरुषार्थ से स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक शक्ति प्रदान की।

The Narrative World    28-May-2026   
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भारत देश को ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी से आजाद करवाने के लिए किए गए आंदोलनों में भारत के हर कोने से हर भारतीय द्वारा योगदान दिया गया। राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे को अग्नि 1857 के विद्रोह से मिली, जिसमें भारत के उत्तर और पश्चिम भाग के नागरिको ने बढ़ चढ़कर भाग लिया।

अंग्रेजों के विरुद्ध हुए विद्रोह की अमर कहानी को जन साधारण तक पहुंचाना अति आवश्यक था, ताकि सभी में राष्ट्रीयता की लहर दौड़ सकें। ऐसे अमर विद्रोहों की अमर कहानियों को साहित्य द्वारा संजोकर रखा गया जो भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत साबित हुआ। लेखन कौशल द्वारा आंदोलन को गति प्रदान करने वालों में विनायक दामोदर सावरकर मुख्य किरदार बनकर सामने आए।


विनायक दामोदर सावरकर अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापकों में से एक थे, जिन्होंने राष्ट्र में सामाजिक जागृति के लिए स्वामी विवेकानंद को प्रेरणा मान अनगिनत रचनाएँ प्रकाशित की जो ब्रिटिश सरकार के लिए सिर दर्द का कारण बनी। उनकी रचनाओं के फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिला, जिससे नीले आसमान में हिंदुओं का भगवा ध्वज और मुसलमानों का हरा ध्वज एक साथ ब्रिटिश यूनियन जैक के सामने आया तो विभाजन की रणनीति वाली ब्रिटिश सरकार की नींव अस्थिरता की तरफ पांव कर चुकी थी।


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अस्थिर और कमजोर साम्राज्य को देख ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की कई रचनाओं को प्रतिबंधित किया, जिसमें उनके द्वारा 1906 में लिखा गया '1857 का स्वतंत्रता संग्राम' मुख्य था, क्योंकि इस लेखन ने राष्ट्रीयता को बल दिया, जिसके परिणामस्वरूप धर्म, सम्प्रदाय को त्याग सम्पूर्ण भारत एक सूत्र में बंध गया।


इसी कारण 23 दिसंबर 1910 को सावरकर को दो उम्रकैद (50 वर्ष) की सजा सुनाई गई, जिसमें अंडेमान निकोबार में कालापानी की सजा से पहले एक महीना मुंबई की जेल और कुछ दिन पुणे की जेल में कैद किया गया।


अंडेमान निकोबार में काला पानी सजा के दौरान स्वामी विवेकानंद केराजयोगग्रंथ से ज्ञान अर्जित कर पूर्ण एकाग्रता से भारत की स्वतंत्रता का व्रत लेते हुए 'सप्तऋषिनामक कविता औरहिंदुत्वनामक ग्रंथ की रचना की, जिससे सावरकरवीर सावरकरके नाम से प्रसिद्ध हुए।


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सावरकर काहिंदुत्वग्रंथ डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार की प्रेरणा बना, जिसके परिणामस्वरूप 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि सावरकर केहिंदुत्वऔर लोकमान्य तिलक केकेसरीकी ही देन है।

“राष्ट्रीय भक्ति में जीवन समर्पित करने वाले सावरकर को स्वतंत्रता के बाद वामपंथी इतिहासकारों और राजनीतिक पक्षकारों ने भारतीय इतिहास में जगह नहीं दी। इसके साथ ही उनकी छवि को धूमिल करने हेतु अंग्रेजों का दलाल कहकर संबोधित किया, जिससे कई हिंदूवादी संगठनों को क्षमायोग्य स्थिती में रखा गया, ताकि उन सभी में पुरुषार्थ हीन भावना पैदा हो सके। भारतीय संस्कृति पुरुषार्थ युक्त संस्कृति है, जिसका अर्थ मनुष्य द्वारा आंतरिक क्षमता को समझ उचित कार्य करने है।”


वर्तमान समय में देश के संवैधानिक एवं राजनीतिक पदों पर कार्यरत कट्टरपंथी व्यक्तियों द्वारा समय समय पर भारतीयों का मानसिक शोषण कर सामाजिक एकता को खंडित करने हेतु पुरुषार्थ को क्षति पहुंचाई गई।


आज के समय में भारतीय सामाजिक चिंतन को केवल कुछ संगठनों के भरोसे छोड़, स्वयं आंखें मूंदकर सो रहा है। वहीं दूसरी तरफ लूट की मानसिकता के साथ मज़हबी लोग भारत के हर स्थान पर कश्मीर, बंगाल और मोपला जैसी स्थिति करने को तैयार है। इसी प्रकार जिस मजहब का एक भी देश ना था, आज उनके कुल 57 देश है। परंतु सारी दुनिया को अपना मानने वाली सनातन संस्कृति के पास केवल एक ही देश (भारत) बचा जिस पर आंतरिक संकट के बादल छाए हुए हैं।


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ऐसे ही राष्ट्रभक्ति और सामाजिक चिंतन की भावना से हीन पर्शिया और मेसोपोटामिया जैसे देश अपना अस्तित्व खोकर आज दुनिया के मानचित्र से गायब हैं। सामाजिक चिंतन सारे समाज के लिए महत्वपूर्ण विषय है ताकि सामाजिक एकता स्थापित कर सरकार पर जिहादी और धर्मांतरण करनेवाले हानिकारक तथ्यों के ऊपर कठोर कानून लाने के लिए दबाव बनाया जा सके। राष्ट्रीयता की भावना को जागृत कर ऐसे आंतरिक संकट के विरुद्ध समाज को ढाल बनकर सामने आना चाहिए।


अंत मेंसंघे शक्ति कलियुगेपंक्ति से सामाजिक एकता और समन्वय का आवाहन कर भारत माता के सपूत वीर सावरकर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।