जनसांख्यिकीय असंतुलन: राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय

जनसांख्यिकीय परिवर्तन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक संतुलन पर बढ़ती चिंताओं के बीच केंद्र ने दीर्घकालिक नीति निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया।

The Narrative World    30-May-2026
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भारत ने अनेक आक्रमण देखे हैं। कुछ तलवार लेकर आए, जैसे अरब आक्रमणकारी; कुछ व्यापार के बहाने आए, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी; और कुछ विचारधारा के आवरण में आए, जैसे वामपंथी कम्युनिस्ट। इतिहास का एक कठोर सत्य यह भी है कि किसी भी राष्ट्र की आत्मा पर सबसे गहरा आघात तब होता है, जब उसकी जनसांख्यिकीय संरचना मौन रूप से परिवर्तित होने लगे। यह परिवर्तन यदि अनियंत्रित प्रवासन, सीमा अतिक्रमण और राजनीतिक तुष्टिकरण के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न हो, तो वह सामाजिक असंतुलन के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का दीर्घकालिक संकट बन जाता है।
 
 
इसी संदर्भ में 26 मई 2026 को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रकाश नावलेकर की अध्यक्षता में "अवैध प्रवासन और अन्य असामान्य कारणों से उत्पन्न जनसांख्यिकीय परिवर्तनों" के अध्ययन हेतु एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। यह भारत की राष्ट्रवादी चेतना में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। लंबे समय से जिस विषय को पूर्ववर्ती सरकारों के विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण की वोट-बैंक राजनीति के कारण टाला जाता रहा, अब वह वर्तमान सरकार की सक्रिय राष्ट्रहितकारी नीति के कारण राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ रहा है।
 
समिति के मुख्य उद्देश्य एवं शर्तें
 
भारत के जनसांख्यिकीय परिदृश्य का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना, सामुदायिक स्तर पर हो रहे परिवर्तनों का सूक्ष्म विश्लेषण करना, जनसांख्यिकीय संतुलन एवं राष्ट्रीय एकात्मता के लिए नीति तथा केंद्र-राज्य समन्वय की संस्थागत व्यवस्था के संबंध में सुझाव देना, अवैध प्रवासियों की पहचान एवं निर्वासन के लिए स्थायी तंत्र विकसित करना, सीमा प्रबंधन एवं निगरानी तंत्र का आधुनिकीकरण करना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर सुझाव देना इस समिति के गठन के प्रमुख उद्देश्य हैं।
 
जनसांख्यिकी: संख्या से अधिक मूल्यवान सभ्यता
 
किसी राष्ट्र की जनसंख्या मात्र एक गणितीय आँकड़ा नहीं होती। वह उसकी संस्कृति, भाषा, परंपरा, सामाजिक विश्वास और राजनीतिक दिशा का आधार होती है। जब सीमावर्ती क्षेत्रों में अचानक जनसंख्या संरचना बदलने लगे, स्थानीय समुदाय अपने ही भूभाग में असुरक्षित महसूस करने लगें और संसाधनों पर असामान्य दबाव बढ़ने लगे, तब यह प्रश्न मानवीय संवेदना से आगे बढ़कर राज्य की स्थिरता और सभ्यता की निरंतरता से जुड़ जाता है।
 
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असम आंदोलन से लेकर बंगाल की हालिया हिंसा तक, भारत ने देखा है कि अनियंत्रित प्रवासन भूमि अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक विश्वास को प्रभावित करता है। जब स्थानीय समुदायों को यह अनुभव होने लगे कि उनकी जनसंख्या, भाषा या परंपरा धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही है, तब असुरक्षा संघर्ष में बदल जाती है।
 
सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी
 
सर्बानंद सोनोवाल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जिस स्पष्टता से अवैध प्रवासन को "बाहरी आक्रमण" की संज्ञा दी थी, वह भारतीय राज्य के लिए एक गंभीर चेतावनी थी। संविधान का अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार पर यह दायित्व डालता है कि वह राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से सुरक्षित रखे। यदि सीमाओं से निरंतर अवैध घुसपैठ हो और राज्य निष्क्रिय बना रहे, तो यह संवैधानिक दायित्व की उपेक्षा मानी जाएगी।
 
 
आज आवश्यकता कानूनों के अस्तित्व से अधिक उनके निष्पक्ष और दृढ़ क्रियान्वयन की है। विदेशी अधिनियम, नागरिकता अधिनियम और सीमाई सुरक्षा तंत्र तभी प्रभावी होंगे, जब उनके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक पारदर्शिता होगी।
 
"मानवाधिकार" और "राष्ट्राधिकार" के बीच संतुलन
 
अवैध प्रवासन के प्रश्न पर अक्सर मानवाधिकार की भाषा में बहस की जाती है। प्रत्येक मनुष्य के प्रति संवेदना आवश्यक है, पर किसी राष्ट्र की सीमाओं, संसाधनों और सांस्कृतिक अधिकारों की भी अपनी वैधता होती है। भारत भारतीयों के लिए है। यदि अनियंत्रित प्रवासन के कारण स्थानीय नागरिकों का रोजगार, भूमि, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक और धार्मिक संतुलन प्रभावित हो, तो राज्य का प्रथम दायित्व अपने वैध नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है।
 
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इसके संकेत शुभेंदु सरकार की सक्रियता में स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं, जहाँ अवैध प्रवासियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई करते हुए, बिना अनावश्यक विलंब के, उन्हें सीधे बांग्लादेश भेजा जा रहा है।
 
भारत की उदार सभ्यता ने सदैव शरणागतों को स्थान दिया है, पर उदारता और असुरक्षा समानार्थी नहीं हो सकते। शरण और सुनियोजित जनसांख्यिकीय अतिक्रमण के बीच अंतर को समझना होगा।
 
आवश्यकता क्यों?
 
सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने असम में अवैध प्रवासियों की भारी घुसपैठ को संविधान के अनुच्छेद 355 के अंतर्गत "बाहरी आक्रमण" के समान माना था।
 
जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि मणिपुर में जारी जातीय हिंसा जनसांख्यिकीय चिंताओं से गहराई से जुड़ी हुई है। म्याँमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद शरणार्थी बनकर आए चिन-कुकी लोगों के प्रवेश ने कई जिलों की जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को परिवर्तित कर दिया है।
 
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साथ ही, इस समिति की आवश्यकता तब और अधिक बढ़ जाती है जब उचित आँकड़ों का अभाव हो। वर्ष 2011 में अंतिम जनगणना होने के कारण भारत के पास वर्तमान में स्थानीय स्तर पर जनसांख्यिकीय विचलनों से संबंधित सूक्ष्म और अद्यतन आँकड़ों का अभाव है।
 
एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण यह भी प्रतीत होता है कि नेशनल सैंपल सर्वे के नवीन आँकड़ों के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर लक्षित 2.1 से घटकर 2.0 हो गई है। प्रवासन संबंधी चुनौतियों के दृष्टिकोण से यह स्थिति राष्ट्रीय हित की दृष्टि से चिंताजनक प्रतीत होती है।
 
भारत के कई सीमावर्ती जिलों में दशकीय जनसंख्या वृद्धि राष्ट्रीय औसत से असामान्य रूप से अधिक रही है। यह पूरी तरह प्राकृतिक वृद्धि का परिणाम नहीं माना जा सकता। दुर्भाग्य यह है कि दशकों तक इस विषय पर तथ्यात्मक चर्चा को भी "सांप्रदायिक" कहकर दबाने का प्रयास किया गया। परिणामस्वरूप समस्या बढ़ती रही, पर समाधान पर गंभीर विमर्श नहीं हुआ। वर्ष 2026 के पूर्व की बंगाल सरकार की मौन स्वीकृति ने इस स्थिति को और अधिक प्रभावित किया।
 
संतुलन, सुरक्षा और संवेदनशीलता
 
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे दो समानांतर चुनौतियों का सामना करना है। एक ओर सीमाई अवैध प्रवासन है और दूसरी ओर आंतरिक श्रम-आधारित प्रवासन की आवश्यकता। दक्षिण भारत वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहा है, जबकि उत्तर भारत युवा कार्यबल प्रदान कर रहा है। इसलिए भारत को वैध आंतरिक प्रवासन को प्रोत्साहित करते हुए अवैध बाह्य प्रवासन पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना होगा।
 
पश्चिम बंगाल में जनसंख्या संरचना में पिछले 70 वर्षों में उल्लेखनीय परिवर्तन दर्ज किया गया है, जिसे लेकर अवैध बांग्लादेशी प्रवासन पर लगातार राजनीतिक और सुरक्षा बहस होती रही है। आधिकारिक जनगणना आँकड़ों के अनुसार 1951 में पश्चिम बंगाल में हिंदू आबादी लगभग 78.9 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 19.46 प्रतिशत थी, जबकि 2011 तक हिंदू आबादी घटकर 70.54 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी बढ़कर 27.01 प्रतिशत हो गई।
 
सीमावर्ती जिलों, विशेषकर मुर्शिदाबाद (66.27 प्रतिशत मुस्लिम), मालदा (51.27 प्रतिशत), उत्तर दिनाजपुर (49.92 प्रतिशत) और दक्षिण 24 परगना में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि राज्य औसत से अधिक दर्ज की गई। विभिन्न सुरक्षा अध्ययनों, सीमा प्रबंधन रिपोर्टों तथा राजनीतिक विमर्शों में इसे बांग्लादेश से अवैध प्रवासन, खुली सीमा और निरंतर घुसपैठ से जोड़ा गया है, हालांकि सटीक संख्या को लेकर मतभेद भी मौजूद हैं।
 
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2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 22 लाख लोगों ने अपनी जन्मस्थली वर्तमान बांग्लादेश बताई थी। वहीं शुभेंदु सरकार द्वारा चलाए जा रहे अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अभियान के तहत बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश लौट रहे हैं। इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या 2026 के पूर्व की ममता सरकार ने अवैध प्रवासियों की वास्तविक संख्या उजागर न करके उस संख्या का राजनीतिक उपयोग किया था।
 
असम में भी मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि के आधिकारिक जनगणना आँकड़े अत्यंत उल्लेखनीय रहे हैं। 1951 की जनगणना में असम में मुस्लिम आबादी लगभग 19.95 लाख, अर्थात कुल जनसंख्या का 24.86 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर लगभग 1.06 करोड़, अर्थात 34.22 प्रतिशत हो गई। अर्थात 60 वर्षों में मुस्लिम जनसंख्या प्रतिशत में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
 
कई सीमावर्ती जिलों में यह वृद्धि और अधिक तीव्र रही। धुबरी में मुस्लिम आबादी 79.67 प्रतिशत, बरपेटा में 70.74 प्रतिशत, करीमगंज में 57.36 प्रतिशत, नगांव में 55.36 प्रतिशत तथा दक्षिण सलमारा में 98 प्रतिशत तक पहुँच गई।
 
सरकार द्वारा गठित समिति तभी सफल मानी जाएगी, जब वह केवल रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित न रहकर एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति की आधारशिला बने, जो भविष्य में आने वाली अन्य राजनीतिक सत्ताओं के लिए भी राष्ट्रहितकारी और स्पष्ट दृष्टिकोण उपलब्ध करा सके।
 
सीमाएँ अब तकनीक से भी सुरक्षित होंगी
 
भारत को "डेटा-संचालित राष्ट्रीय सुरक्षा" की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
 
सीमा सुरक्षा का आधुनिक अर्थ केवल सैनिक चौकियों तक सीमित नहीं है। आज जनसांख्यिकीय सुरक्षा, डिजिटल पहचान सत्यापन, सीमा-तकनीक, डेटा विश्लेषण और संस्थागत समन्वय भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।
 
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भारत और बांग्लादेश 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल का एक बड़ा सीमाई क्षेत्र संवेदनशील माना जाता है। इस सीमा पर अवैध घुसपैठियों और बीएसएफ जवानों के बीच होने वाली झड़पें अक्सर चर्चा का विषय बनती रही हैं।
 
 
वर्तमान सरकार ने तारबंदी का कार्य प्रारंभ कर इस दिशा में प्रभावी पहल की है, जिससे अवैध घुसपैठ को रोकने में सहायता मिलेगी। साथ ही निर्वाचन आयोग द्वारा एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से उन लाखों घुसपैठियों की पहचान की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, जिन्होंने मतदाता सूची में नाम दर्ज कराकर नागरिकता प्राप्त करने की उम्मीद पाल रखी थी। एसआईआर प्रक्रिया और अवैध प्रवासियों के संबंध में गठित समिति की रिपोर्ट आने के बाद इनके विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया और तेज होने की संभावना है।
 
सीमाओं पर नदी तटीय क्षेत्रों, जंगलों और अनियंत्रित मार्गों का उपयोग मानव तस्करी, हथियारों की आपूर्ति और फर्जी पहचान निर्माण के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS), थर्मल सेंसर, ड्रोन निगरानी और डिजिटल जनसांख्यिकीय ऑडिट भविष्य की आवश्यकता हैं। भारत को 21वीं सदी की चुनौतियों का उत्तर पुरानी प्रशासनिक शैली से नहीं दिया जा सकता।
 
निष्कर्ष
 
राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि जनचेतना, सांस्कृतिक निरंतरता और जनसांख्यिकीय संतुलन से निर्मित होते हैं। यदि किसी राष्ट्र की मूल सामाजिक संरचना निरंतर दबाव में आ जाए, तो उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी अस्थिर होने लगती हैं।
 
 
केंद्रीय गृह मंत्रालय की यह पहल भारत के लिए समाधान खोजने का एक अवसर है। आवश्यकता इस बात की है कि यह विमर्श राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठे और राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय तथा सांस्कृतिक संतुलन के व्यापक दृष्टिकोण से आगे बढ़े, क्योंकि भारत की सीमाओं की रक्षा केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि सक्रिय और सुदृढ़ नीतियाँ भी करती हैं।
 
लेख
 
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प्रद्युम्न
इतिहासकार एवं सिविल सेवा विशेषज्ञ