अरुणाचल में जनसांख्यिकी बदलाव के खिलाफ मुखर होता विरोध

अरुणाचल में जनसांख्यिकी संरचना, सांस्कृतिक सुरक्षा और अवैध बसावट को लेकर बढ़ती चिंताओं ने स्थानीय संगठनों को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया।

The Narrative World    12-Jun-2026
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असम, बंगाल और झारखंड के संथाल परगना के बाद अब देश का एक नया हिस्सा जनसांख्यिकी बदलाव का शिकार हो रहा है। जिस राज्य की हम बात कर रहे हैं, वह न तो बांग्लादेश और न ही पाकिस्तान के साथ अपनी सीमा साझा करता है। यह जनसांख्यिकी बदलाव कहीं और नहीं, बल्कि अरुणाचल प्रदेश में हो रहा है। वही अरुणाचल, जहाँ देश में सबसे पहले सूर्योदय दिखाई देता है। रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की वक्र दृष्टि अब इस सुंदर प्रदेश पर पड़ गई है।
 
ये लोग गैरकानूनी तरीके से देश में प्रवेश करते हैं, लेकिन वापस नहीं जाते और स्थानीय निवासियों में घुल-मिल जाते हैं। यह भी सर्वविदित है कि अरुणाचल प्रदेश पहली बार जनसांख्यिकी बदलाव का सामना नहीं कर रहा है। इससे पहले भी यह प्रदेश ईसाईकरण के कारण हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रभाव देख चुका है। वर्ष 1971 में अरुणाचल प्रदेश में ईसाई जनसंख्या मात्र 3,684 थी, जो वर्ष 2011 तक बढ़कर 4 लाख से अधिक हो गई।
 
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दरअसल, म्यांमार से सटा अरुणाचल प्रदेश ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ की दोहरी मार झेल रहा है। अरुणाचल की राजधानी ईटानगर में अक्टूबर 2025 में अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गनाइजेशन (APIYO) के नेतृत्व में सैकड़ों युवा सड़कों पर उतर आए। उनके हाथों में 'बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस जाओ' और 'अरुणाचल प्रदेश को बचाओ' जैसे नारों वाले पोस्टर थे। सड़कों पर उतरे ये युवा कथित रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ से परेशान हैं। उनकी मांग है कि राजधानी ईटानगर और नाहरलागुन में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने भूमि पर कब्जा कर 15 से 20 मस्जिदों तथा अन्य इस्लामी धार्मिक स्थलों का निर्माण कर लिया है, जिन्हें हटाया जाना चाहिए।
 
इस प्रदर्शन में APIYO के साथ ऑल कैपिटल कॉम्प्लेक्स यूथ वेलफेयर एसोसिएशन (ACCYWA) और ऑल नाहरलागुन यूथ वेलफेयर एसोसिएशन (ANYWA) भी शामिल थे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में APIYO के अध्यक्ष तारो सोनम लियाक ने कई चौंकाने वाले दावे किए। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में प्रतिदिन अन्य राज्यों या देशों से एक हजार से दो हजार मुस्लिम व्यक्ति इनर लाइन परमिट (ILP) दिखाकर प्रवेश कर रहे हैं। लियाक के अनुसार, ये लोग ILP के माध्यम से प्रवेश करने के बाद भीड़ में गायब हो जाते हैं और फिर अपने मूल स्थान पर वापस नहीं लौटते।
 
APIYO ने इस विषय को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र भी लिखा है। इस पत्र में मांग की गई है कि जुड़वाँ राजधानी क्षेत्र के भीतर जामा मस्जिदों और मदरसों के अवैध निर्माण को तत्काल निरस्त किया जाए तथा ईटानगर और नाहरलागुन में मौजूद अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को तुरंत हटाया जाए। संगठन का दावा है कि जुड़वाँ राजधानी क्षेत्र की लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी बांग्लादेशी मूल की है, जो राज्य के मूल निवासियों के लिए एक बड़ा खतरा है। पत्र में यह भी कहा गया है कि राज्य सरकार की जानकारी के बिना राजधानी क्षेत्र में 10 से अधिक अवैध जामा मस्जिदें संचालित हो रही हैं। इसलिए शहर के भीतर केवल दो जामा मस्जिदों को अनुमति देना उचित होगा और अन्य सभी को राज्य के मूल निवासियों के हित में हटाया जाना चाहिए।
 
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APIYO द्वारा उठाया गया यह मुद्दा वर्तमान समय में भी अरुणाचल समाज में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी महीने 4 जून को APIYO ने ईटानगर बंद का आह्वान किया था। प्रशासन ने संगठन को 15 अवैध मस्जिदों को सील करने का आश्वासन दिया था, लेकिन प्रदर्शनकारी अवैध निर्माणों को हटाने और घुसपैठ रोकने की मांग पर अडिग रहे।
 
 
मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या को जनसांख्यिकी बदलाव का एक कारण बताया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर भी इससे गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। घुसपैठियों के बढ़ते ठिकानों के कारण नशीले पदार्थों और ड्रग्स की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिसका गहरा प्रभाव स्थानीय युवाओं पर पड़ रहा है। अपराध दर में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। घुसपैठियों की बढ़ती मौजूदगी के कारण स्थानीय व्यापारिक समुदाय भी प्रभावित हुआ है और वह अपनी चिंता व्यक्त कर रहा है।
 
 
सीमावर्ती राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों के प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है। किंतु आरोप है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर अवैध बसावट की जा रही है। यदि समय रहते इस विषय पर संज्ञान नहीं लिया गया, तो अरुणाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ सकती है। सूर्य के आँचल की भूमि कहे जाने वाले अरुणाचल प्रदेश को जनसांख्यिकी बदलाव की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
 
लेख
हेमेन्द्र शर्मा
शोध कार्य एवं सामाजिक समसामयिक विश्लेषक
उत्तर-पूर्व अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली