इवेंजेलिकल तंत्र का भारत में धर्मांतरण षड्यंत्र

भारत में इवेंजेलिकल मिशनरी गतिविधियों, धर्मांतरण की रणनीतियों, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्तर-पूर्व के जनसांख्यिकी परिवर्तनों को लेकर उठते सवालों का विश्लेषण।

The Narrative World    13-Jun-2026
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क्रिस्चियानिटी, मसीहत और ईसाइयत, ये तीनों शब्द एक ही मत के पर्यायवाची हैं। यीशु मसीह को अंग्रेज़ी में "जीसस क्राइस्ट" कहा जाता है और कुरान में "ईसा"। उसी तरह यीशु मसीह के अनुयायियों को "मसीही" कहा जाता है। "जीसस क्राइस्ट" से "क्रिस्चियन" और "ईसा" से "ईसाई" शब्द निकले हैं।
 
19वीं सदी में अमेरिकी प्रोटेस्टेंटों (जो पोप की सत्ता को नहीं मानते) के बीच "इवेंजेलिकल" (ईसाई मत प्रचारक) शब्द का खूब प्रयोग होता था। लगभग सभी अमेरिकी प्रोटेस्टेंट स्वयं को इवेंजेलिकल कहने को तैयार रहते थे। बीसवीं सदी के मध्य तक इवेंजेलिकल प्रोटेस्टेंटों को मुख्यधारा का तमगा मिल गया। मुख्यधारा का अर्थ उन संपन्न लोगों से था जो रिहायशी नगरों में रहते थे। इवेंजेलिकल शब्द या इवेंजेलिकल क्रिस्चियन की शुरुआत जर्मनी में 16वीं सदी में हुई, जहाँ प्रोटेस्टेंट स्वयं को रोमन कैथोलिकों (जो पोप की सत्ता को सर्वोच्च मानते हैं) के मुकाबले इवेंजेलिकल मानते थे। इसलिए 16वीं सदी में जर्मनी में इवेंजेलिकल शब्द का अर्थ था, "वह व्यक्ति जो सुसमाचार को समझने के लिए बाइबल के अधिकार को स्वीकार करता था।"
 
भारत में लोग अक्सर दबाव या प्रलोभन में आकर ईसाई मत अपना लेते हैं, लेकिन ईसाई तौर-तरीकों से पूरी तरह जीवन जीने के बजाय वे हिन्दू परम्पराओं की ओर लौटते रहते हैं। तबलीगी जमात की तरह उग्र होने के बजाय इवेंजेलिकल चर्चों ने इसका जवाब अपेक्षाकृत अधिक रणनीतिक तरीके से दिया है, जैसे दीया जलाना, त्योहार मनाना, यहाँ तक कि पूजा-पाठ के तौर-तरीकों को नए धर्मशास्त्रीय तौर-तरीकों से बदलना, जिसे "लिबरल रोमांटिस्म सिंक्रेटिज्म" (दार्शनिक मतों के बीच मतभेद दूर करके एकता स्थापित करने का प्रयत्न) कहा जाता है।
 
यह सनातनी (हिन्दू) संस्कृति की गहराइयों को समाप्त करने, उसके कर्मकांडों का उन्मूलन करने, उसके बहुदेववादी चरित्र को खोखला करने और उसे ईसाइयत के तहत पुनर्गठित करने की एक सुनियोजित परियोजना बताई जाती है। हिन्दू संस्कृति के मंदिरों की नकल चर्चों के रूप में की जाती है, हिन्दू भजनों को अलग-अलग नामों से गाया जाता है, हिन्दू त्योहारों की नकल बाइबिलीय परम्पराओं से की जाती है और धीरे-धीरे धर्म तथा हठधर्मिता की रेखा धुंधली होती जाती है।
 
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भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य, जैसे मिजोरम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश, भारत की स्वतंत्रता के समय असम राज्य के ही भाग हुआ करते थे। भारत की स्वतंत्रता के समय मणिपुर में ईसाई जनसंख्या 11.84 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 41.29 प्रतिशत हो गई। नागालैंड में यह 46.05 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 87.16 प्रतिशत हो गई। मिजोरम में 1981 के आसपास 83.81 प्रतिशत से बढ़कर यह लगभग 87.16 प्रतिशत हो चुकी है। मेघालय में 1961 में ईसाई जनसंख्या 35.21 प्रतिशत थी, जो बढ़कर लगभग 74 प्रतिशत हो गई। अरुणाचल प्रदेश में 1971 में ईसाई जनसंख्या 0.79 प्रतिशत थी, जो 2001 में 18.72 प्रतिशत हुई और 2011 में बढ़कर 30.26 प्रतिशत हो गई।
 
प्रसिद्ध इतिहासकार डेविड बेविंगटन ने इंजिलवाद (ईसाई धर्म प्रचार) को मुख्यतः चार रूपों में बाँटा है।
 
धर्मांतरणवाद: यह मान्यता कहती है कि जीवन में पुनर्जन्म के अनुभव को प्राप्त करने तथा यीशु का अनुसरण करने के लिए रूपांतरण आवश्यक है। अर्थात अपना धर्म परिवर्तन कर ईसाई मत में आना आवश्यक है।
 
बाइबिलवाद: बाइबिल को सर्वोच्च मानकर उसका उच्च सम्मान करना तथा उसके प्रति आज्ञापालन करना।
 
सक्रियतावाद (एक्टिविज्म): मिशनरी और तथाकथित सामाजिक सुधार प्रयासों में सुसमाचार (गॉस्पेल) की अभिव्यक्ति होना। यह विचार कहता है कि गैर-ईसाइयों को यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 
क्रूसीकेन्द्रवाद: इसमें क्रूस पर यीशु मसीह के बलिदान पर विशेष जोर दिया जाता है। इसके अनुसार मानवता का उद्धार इसी बलिदान के माध्यम से संभव है।
 
 
भारत के संदर्भ में यदि हम देखें तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की अनुमति दी गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म, मत और संप्रदाय को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। लेखक के अनुसार, क्रिस्चियन मिशनरियाँ और उनका समर्थन तंत्र लोगों को इस प्रावधान की पूर्ण जानकारी नहीं देते।
 
भारत में ईसाई मिशनरी क्यों भेजी जाएँ या उन्हें किस रूप में भेजा जाना चाहिए, इसका उल्लेख वर्ष 1813 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित चार्टर एक्ट में किया गया था। आज जिस मैकाले की शिक्षा नीति पर इतनी चर्चा होती है, वह इसे इसलिए क्रियान्वित कर पाया क्योंकि उसके पिता ज़ैचरी मैकाले ने हिन्दू समाज के प्रति अपनी धारणा के आधार पर अंग्रेजियत और ईसाइयत के प्रचार-प्रसार की नींव रखी थी।
 
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वर्ष 1813 से पहले मिशनरियों को भारत आकर ईसाई मजहब के प्रचार-प्रसार की आधिकारिक अनुमति नहीं थी। यह स्थिति बनी रहे, इसके लिए ईस्ट इंडिया कंपनी समय-समय पर अपने तर्क प्रस्तुत करती रही। हालांकि लंदन स्थित "क्लैफम सेक्ट" के कट्टर ईसाई सदस्यों को इससे आपत्ति थी। लेकिन कंपनी और वित्तीय लाभों का तर्क हमेशा भारी पड़ता था।
 
क्लैफम सेक्ट इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। उनका लक्ष्य तत्कालिक व्यापारिक लाभों से कहीं बड़ा था। इसलिए क्लैफम सेक्ट ने "महारानी के झंडे" और "ईसाई क्रॉस" के तालमेल से लंबे समय तक शासन करने की एक अवधारणा विकसित की। अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी को झुकना पड़ा और 1813 में ब्रिटिश संसद ने चार्टर एक्ट 1813 पारित कर दिया। इसके बाद भारत में मिशनरियों के आने और प्रचार-प्रसार का मार्ग आधिकारिक रूप से खुल गया।
 
अब बात जैचरी मैकाले की। कुछ व्यक्तियों के कार्यों को इतिहास में साजिश और षड्यंत्र के तहत छिपा दिया जाता है। जैचरी मैकाले उनमें से एक हैं। इसे एक वाक्य में इस प्रकार समझा जा सकता है कि यदि लॉर्ड मैकाले भारतीय शिक्षा प्रणाली के अंग्रेजीकरण का राजमिस्त्री था, तो उसके पिता जैचरी मैकाले भारतीय शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ भारतीय समाज में अंग्रेजी-ईसाई प्रभाव की घुसपैठ का नक्शा तैयार करने वाले इंजीनियर के रूप में देखे जा सकते हैं।
 
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भारत में ईसाई मिशनरी धर्मांतरण के लिए मुख्य रूप से सामाजिक सेवा का सहारा लेती हैं, जिसमें शिक्षा, चिकित्सा सहायता और प्रार्थना सभाएँ प्रमुख हैं। ये गतिविधियाँ प्रायः गरीब, आदिवासी और पिछड़े वर्गों को लक्षित करके संचालित की जाती हैं, जहाँ उन्हें बेहतर जीवन, स्वास्थ्य लाभ अथवा आर्थिक सहायता का प्रलोभन दिया जाता है। लेखक के अनुसार यह संविधान के अनुच्छेद 25 की मूल भावना का उल्लंघन है।
 
भारत में ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण के लिए अपने विद्यालयों, जिन्हें प्रायः "कान्वेंट स्कूल" कहा जाता है, का उपयोग करती हैं। दूसरा प्रमुख माध्यम अस्पतालों को माना जाता है, जहाँ लेखक के अनुसार बड़े स्तर पर रोगियों को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित कर ईसाइयत की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया जाता है। रोगी स्वास्थ्य लाभ के लिए अस्पताल जाता है, लेकिन उसकी परिस्थितियों का लाभ उठाकर उसके साथ यह प्रक्रिया संचालित की जाती है।
 
 
तीसरे स्तर पर ऐसे लोगों को चिन्हित किया जाता है जो सामाजिक रूप से उपेक्षित रहे हों या आर्थिक रूप से विपन्न हों, विशेषकर हिन्दू समुदाय के लोग। उन्हें विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराया जाता है। लेखक का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया का संचालन भारत के बाहर स्थित तंत्रों द्वारा किया जाता है, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियाँ (सीआईए और एमआई6), वेटिकन सिटी का पोप तथा उससे जुड़े विभिन्न तंत्र शामिल हैं।
 
भारत सरकार को अपने कानूनों का पुनः अवलोकन करने की आवश्यकता है। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब भारत को ईसाई तंत्र पूर्ण रूप से जकड़ लेगा।
 
लेख
 
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निशांत मिश्र
सामाजिक-राजनीतिक विषयों के अध्येता