वक्त आ गया है वामपंथियों के ऐतिहासिक पाप के प्रायश्चित का

आजादी के बाद के विमर्श में वीर सावरकर की छवि को लेकर खड़े किए गए विवादों, वामपंथी आख्यानों और इतिहास लेखन की भूमिका पर एक दृष्टि।

The Narrative World    13-Jun-2026
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बॉलीवुड की कई फिल्में ऐसी होती हैं, जहाँ शुरू से लेकर आखिर तक हम जिस व्यक्ति को हीरो समझ रहे होते हैं, वह अंत में विलेन निकलता है और जिसे हम विलेन मान रहे होते हैं, वह अचानक हीरो बन जाता है। विलेन के हीरो और हीरो के विलेन बनने तक की इस यात्रा में हमारी कोई भूमिका नहीं होती, क्योंकि पटकथा लेखक अपने संवादों से और निर्देशक अपने दृश्यों से हमारे दिमाग के साथ खेलता है। फिल्म के आधे से अधिक हिस्से तक जिसे हम शैतान समझ रहे थे, वह भगवान निकलता है और भगवान में हमें अचानक शैतान नजर आने लगता है।
 
इस पूरी प्रक्रिया का नाम है "गेम ऑफ परसेप्शन"।
 
हमारी हिंदी फिल्मों के पटकथा लेखक, जिनमें से अधिकांश एफटीआईआई, पुणे में प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, यह उनकी जादूगरी है।
 
भारत के लोग भावनाओं से इतने भरे होते हैं कि फिल्म में भी खलनायक का किरदार करने वाले व्यक्ति को समाज में घृणा की नजर से देखा जाता है। हमें याद है कि बचपन में टेलीविजन पर जब ललिता पंवार आती थीं, तो उन्हें देखते ही घर की माताएँ और बहनें अपशब्दों के तीर चलाने लगती थीं।
 
आप सोच रहे होंगे कि सावरकर के विषय पर लिखे लेख में इस चर्चा का क्या संबंध है। इन उदाहरणों के माध्यम से मैं केवल यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि कैसे किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में, जिसे हमने कभी देखा तक नहीं, हम अपनी राय बना लेते हैं। वास्तव में वह हमारी राय नहीं होती, बल्कि प्रचार माध्यमों पर बैठे लोगों के विचार होते हैं, जिन्हें बड़ी ही चतुराई से वे मनोरंजन के नाम पर हमारे मन-मस्तिष्क में स्थापित कर देते हैं।
 
हम भी वही मानने लगते हैं जो वे मानते हैं, हम भी वही कहने लगते हैं जो वे कहते हैं और हम भी वही सोचने लगते हैं जो वे चाहते हैं।
 
पर्दे पर देखकर छवि बनाने के हम इतने आदी हो गए हैं कि
 
हम कभी जानने की कोशिश ही नहीं करते कि पर्दे के पीछे कौन है?
 
यह बात तो और भी दूर की कौड़ी है कि हम यह जानें कि उसकी नियत क्या है?
 
इस "गेम ऑफ परसेप्शन" के आजादी के बाद के सबसे बड़े शिकार रहे हैं वीर सावरकर।
 
हम यहाँ एक उदाहरण से पर्दे के पीछे का सच जानने की कोशिश करेंगे। आज सूचना का सबसे बड़ा माध्यम इंटरनेट है। नई पीढ़ी का गुरु गूगल है, जिससे वह सब कुछ पूछती है। यूट्यूब और फेसबुक पर सुनती, देखती और पढ़ती है।
 
 
आज यदि आपको सावरकर को जानना हो तो आप यूट्यूब या फेसबुक पर सर्च करेंगे। वहाँ आपको बीबीसी हिंदी द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री "सावरकर: हीरो या विलेन?" दिखाई देगी। लगभग 17 मिनट के इस चलचित्र को देखकर आप सावरकर के बारे में अपनी राय बना सकते हैं। इसे देखने के बाद कैसी छवि बनती है, यह नीचे कमेंट बॉक्स में लिखी टिप्पणियों से स्पष्ट हो जाता है। अब तक लगभग 17 लाख लोग इसे देख चुके हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो देश-दुनिया में 25 लाख लोग और बढ़ गए हैं जो सावरकर को विलेन, कायर, भारत के टुकड़े करने वाला, गद्दार, अंग्रेजों से माफी माँगने वाला आदि मानते हैं। मेरी बात की तस्दीक डॉक्यूमेंट्री के नीचे लोगों द्वारा लिखे गए कमेंट भी करते हैं।
 
यह बात थी पर्दे के सामने की। आइए, अब बात करते हैं पर्दे के पीछे की।
 
इस डॉक्यूमेंट्री में जिनका सबसे अहम रोल है, अर्थात इसके निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक, उनका नाम है रेहान फज़ल। ये महोदय बीबीसी हिंदी के संपादक भी हैं।
 
इनको जानना हो तो गूगल पर सर्च कीजिए। आपको फरवरी 2002 के गुजरात दंगों की कवरेज के दौरान लिखी गई उनकी आपबीती का एक लेख मिलेगा। दंगे शुरू हुए थे गोधरा में कारसेवकों को जिहादियों द्वारा जिंदा जलाने से। लेकिन रेहान फज़ल उस घटना को लगभग भूल जाते हैं और भगवा पहने हिंदू उपद्रवियों की चर्चा में लग जाते हैं। यहाँ किसी गवाह की आवश्यकता नहीं, क्योंकि गवाह भी वही हैं और पीड़ित भी वही। शब्दों की जादूगरी इतनी खूबसूरती से की गई है कि आपको भगवा में आतंक नजर आने लगता है।
 
कुल मिलाकर लेख में वास्तविकता कम और फिक्शन ज्यादा है।
 
इनकी वैचारिक प्रतिबद्धता किस ओर है, यह उनके फेसबुक पेज से स्पष्ट हो जाती है। पिछले मई माह में पोस्ट किए गए कुछ लेखों के शीर्षकों से ही समझा जा सकता है। याद रहे, "गेम ऑफ परसेप्शन" अर्थात छवि निर्माण के खेल में शीर्षक का बहुत महत्व होता है।
 
1 मई: बब्बर शेर की तरह टूट पड़ता था (सोशलिस्ट नेता मधु लिमये पर लेख, महिमामंडन)
 
2 मई: हिंदुत्व की राजनीति का पहला झंडावाहक (बलराज मधोक और अटल बिहारी वाजपेयी के अंतर्विरोधों के माध्यम से हिंदुत्व की नकारात्मक व्याख्या)
 
4 मई: छोटे कद के सुल्तान ने कैसे अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे
 
4 मई: टीपू सुल्तान की जिंदगी के आखिरी पल (दोनों लेखों में टीपू सुल्तान का महिमामंडन)
 
11 मई: 1857 के गदर में जब दिल्ली ने देखा मौत का तांडव (बहादुर शाह जफर और उनके साथियों का महिमामंडन, जबकि 1857 को स्वतंत्रता संग्राम कहने वाले सावरकर की भूमिका को डॉक्यूमेंट्री में चतुराई से छिपाया गया)
 
16 मई: जनरल करियप्पा जिन्हें पाकिस्तानी भी सलाम करते थे (वास्तविकता यह है कि पाकिस्तानी भारत की सेना से सबसे अधिक घृणा करते हैं)
 
ऐसे अनेक तथ्य, तर्क और उदाहरण हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रवाद के प्रति इनकी क्या सोच है और वामपंथियों के प्रति इनकी कितनी अटूट प्रतिबद्धता है।
 
रेहान फज़ल की डॉक्यूमेंट्री की शुरुआत में ही यह बताने की कोशिश की जाती है कि सावरकर को भारत रत्न देने के प्रयास 2002 में भी हुए थे, जिन्हें सफल नहीं होने दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि वे यह संकेत देना चाहते हों कि आगे भी सफल नहीं होने देंगे।
 
1906 में इंडिया हाउस, लंदन में गांधीजी और सावरकर की मुलाकात का उल्लेख करते समय उनकी जाति बताई जाती है। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला, वामपंथी हमेशा हिंदू धर्म को ब्राह्मण वर्चस्व वाला धर्म सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। दूसरा, गांधी और सावरकर के विरोध को उभारकर गांधी हत्या के षड्यंत्र की पृष्ठभूमि तैयार करना।
 
रेहान फज़ल ने जिन चार लोगों को सावरकर विचार विशेषज्ञ के रूप में शामिल किया है, उनमें एक घोर वामपंथी निरंजन तकले भी हैं। आपको याद होगा कि पुलवामा हमले में शहीद जवानों की जाति बताने वाला एक लेख वामपंथी पत्रिका कारवाँ में प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था: 
"ऊँची जातियों के हिंदूराष्ट्रवाद की भेंट चढ़े पिछड़ी जातियों के जवान"
 
निरंजन तकले पिछले कुछ वर्षों से इसी पत्रिका से जुड़े हुए हैं। वे हिंदुत्व से कितनी नफरत करते हैं, यह उनके ट्विटर, यूट्यूब, लेखों और भाषणों से स्पष्ट हो जाता है। सावरकर के प्रति उनकी घृणा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा अपने बैठक कक्ष में सावरकर का चित्र लगाने तक पर उन्होंने आपत्ति जताई।
 
स्पष्ट है कि निरंजन तकले सावरकर के बारे में क्या कहेंगे।
 
बीबीसी हिंदी की इस डॉक्यूमेंट्री में निरंजन तकले यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि सावरकर अंग्रेजों के एजेंट थे। अपने तर्क के समर्थन में वे कहते हैं कि जब सावरकर अंडमान की सेल्युलर जेल गए थे तब उनका वजन 112 पाउंड था और बाद में बढ़कर 126 पाउंड हो गया।
 
जबकि 18 जनवरी 1920 को सावरकर के बड़े भाई डॉ. नारायण सावरकर गांधीजी को लिखे एक पत्र में लिखते हैं: 
"कल मुझे भारत सरकार द्वारा सूचित किया गया कि कालापानी से रिहा किए जाने वाले लोगों में सावरकर बंधुओं (वीर सावरकर और गणेश सावरकर) का नाम शामिल नहीं है। मेरे दोनों भाई अंडमान जेल में दस वर्ष से अधिक की सजा भोग चुके हैं। वीर सावरकर का वजन 118 पाउंड से घटकर 95 पाउंड हो गया है।"
 
आप समझ सकते हैं कि वामपंथियों ने सावरकर को कलंकित करने हेतु कितने झूठ और कुतर्क गढ़े होंगे, जबकि आजादी के बाद से ही आईसीएचआर जैसी संस्थाओं पर वामपंथी इतिहासकारों का प्रभाव रहा है। रामचंद्र गुहा, रोमिला थापर, इरफान हबीब जैसे इतिहासकारों के कारण हम अब तक गुलामी, पराजय और पराभव का इतिहास पढ़ते रहे हैं। शम्सुल इस्लाम और मार्कंडेय काटजू को पढ़कर सावरकर से घृणा न हो तो और क्या हो सकता है?
 
खैर, हम फिर डॉक्यूमेंट्री पर आते हैं। 
 
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डॉक्यूमेंट्री के दूसरे बड़े इतिहासकार वामपंथी विद्वान नीलांजन मुखोपाध्याय हैं। उनकी पुस्तक The RSS: Icons of the Indian Right में भी सावरकर, गोलवलकर और हेडगेवार पर एकतरफा वामपंथी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। नीलांजन मुखोपाध्याय आजकल द वायर, द क्विंट, एनडीटीवी सहित अन्य वामपंथी मंचों पर देखे जा सकते हैं।
 
वे बड़ी चतुराई से सावरकर के लेखन, क्रांतिकारी कार्यों, जीवन, त्याग, बलिदान और समर्पण को निगल जाते हैं और फिर उन्हें अंग्रेजों का एजेंट तथा गांधी हत्या का दोषी सिद्ध करने में जुट जाते हैं।
 
सावरकर ने अंग्रेजों से माफी माँगी थी, इस बात की वामपंथी व्याख्या अपने तरीके से करके उन्हें कायर और देशद्रोही सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। जबकि सावरकर शुरू से ही अंग्रेजों की कैद से निकलने के विभिन्न प्रयास करते रहे थे। जब उन्हें लंदन से गिरफ्तार करके एस.एस. मोरिया जहाज से भारत लाया जा रहा था, तब समुद्र में छलांग लगाने के पीछे भी यही उद्देश्य था।
 
अंडमान की सेल्युलर जेल में भी वे लगातार ऐसे प्रयास करते रहे। 1921 में लंदन के अखबार कैपिटल में डिचर नामक पत्रकार ने लिखा था कि सावरकर बंधुओं ने जेल में वायरलेस का उपयोग करके भागने की योजना बनाई थी।
 
सेल्युलर जेल के तत्कालीन जेलर बैरी की क्रूरता के बारे में सब जानते हैं। वह सावरकर को सबसे अधिक प्रताड़ित करता था। केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक प्रताड़ना की भी पराकाष्ठा उन्हें झेलनी पड़ती थी। उन्हें 13.5 × 7.5 फुट की छोटी कोठरी में रखा गया था, जिसके पास ही फाँसीघर था।
 
सावरकर समझ चुके थे कि ब्रिटिश सरकार उन्हें 50 वर्ष की सजा पूरी होने से पहले ही प्रताड़ित कर मार डालना चाहती है। ऐसे में उन्होंने एक रणनीतिक दाँव चलने का निर्णय लिया। इसी रणनीति का हिस्सा था उनका तथाकथित माफीनामा।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी अपने जीवन में समयानुकूल रणनीतिक कदम उठाए थे। चाहे आगरा किले से निकलने की योजना हो या अफजल खान के साथ कूटनीतिक व्यवहार।
 
यहाँ सावरकर के बड़े भाई डॉ. नारायण सावरकर और गांधीजी के बीच पत्राचार का उल्लेख आवश्यक हो जाता है। 25 जनवरी 1920 को गांधीजी लाहौर से लिखते हैं: 
"आपको सुझाव देना कठिन है। तथापि मेरा सुझाव है कि आप एक संक्षिप्त याचिका तैयार करें ताकि यह स्पष्ट रूप से सामने आए कि आपके भाई साहब (वीर सावरकर) ने जो अपराध किया था, उसका स्वरूप राजनीतिक था। मैं यह सुझाव इसलिए दे रहा हूँ ताकि जनता का ध्यान इस ओर आकर्षित करना आसान हो।"
 
इससे स्पष्ट है कि सावरकर ने लोगों की प्रतिक्रिया की परवाह किए बिना जेल से बाहर आकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखने का प्रयास किया।
 
यदि सावरकर जेल की यातनाओं से टूटकर अंग्रेजों से समझौता कर लेते, तो जेल में लिखी गई उनकी 6000 काव्य-पंक्तियों में मातृभूमि के लिए संघर्ष की उदात्त भावना कैसे होती?
 
बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री एकतरफा न लगे, इसलिए रामबहादुर राय का मत भी लिया गया। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल दिखावटी संतुलन के लिए किया गया।
 
रामबहादुर राय से वही प्रश्न पूछा गया जो कन्हैया कुमार, उमर खालिद और शैला रशीद जैसे लोग विश्वविद्यालयों में युवाओं से पूछते रहे हैं: 
"भगत सिंह को भी माफी माँगने का अवसर मिला था, लेकिन उन्होंने फाँसी का फंदा चूम लिया। सावरकर ने माफी क्यों माँगी?"
 
रामबहादुर राय ने इसका परिपक्व उत्तर दिया, जिसे डॉक्यूमेंट्री में देखा जा सकता है।
 
लेकिन क्या किसी भी दो महापुरुषों की मनमानी और धूर्ततापूर्ण तुलना करके हम उनका अपमान नहीं करते?
 
लक्ष्य एक होने पर भी दो क्रांतिकारियों के कार्य, काल और रणनीति अलग हो सकती है। भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को ही देखिए। भगत सिंह असेंबली में बम फेंककर स्वयं गिरफ्तार होते हैं और फाँसी का फंदा चूमकर स्वतंत्रता की ज्वाला को और प्रखर बनाते हैं। वहीं चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों से घिर जाने पर स्वयं को गोली मार लेते हैं।
 
यदि वामपंथियों के कुतर्कों से देखा जाए, तो वे आजाद के बारे में क्या कहेंगे?
 
किन्हीं दो क्रांतिकारियों की ऐसी तुलना करना ही धूर्तता है और इसमें वामपंथी माहिर हैं।
 
डॉक्यूमेंट्री पूरी होते-होते आपके मन में यह छवि बना दी जाती है कि सावरकर देशभक्त नहीं थे। बड़ी साजिश के तहत उनके सामाजिक न्याय, समता और समाज-सुधार संबंधी कार्यों को लगभग गायब कर दिया जाता है।
 
वामपंथी कभी नहीं बताएँगे कि सावरकर 20वीं सदी के सबसे बड़े समाज-सुधारकों में से एक थे। उनके विज्ञाननिष्ठ निबंध, किसानों और मजदूरों पर विचार, स्वतंत्रता के बाद संवैधानिक लोकतंत्र में उनकी आस्था तथा विदेश नीति पर उनके दृष्टिकोण को कभी सामने नहीं लाया जाएगा।
 
उन्हें केवल ब्राह्मणवादी और फासीवादी नेता की झूठी छवि में प्रस्तुत किया जाएगा।
 
जबकि हिंदुत्व पर उनके विराट विचारों में वह दृष्टिकोण भी शामिल था, जिसके तहत बाबासाहब आंबेडकर के बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद उन्होंने कहा था:
"आंबेडकर अब जाकर असली हिंदू बने हैं।"
 
खैर, बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के अंत में सावरकर के जीवन पर अपेक्षाकृत निष्पक्ष लेखन करने वाले कुछ लेखकों में से एक धनंजय कीर के लेखन को भी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता है। यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के बावजूद गांधी हत्या का षड्यंत्र वास्तव में सावरकर ने ही रचा था।
 
कपूर आयोग को भी वामपंथी नेताओं की कुटिल राजनीति का परिणाम बताया जाता है, ताकि सावरकर के माथे पर लगाया गया कलंक सदियों तक बना रहे।
 
अंत में इतना ही कि वामपंथी लेखकों ने विभिन्न प्रचार माध्यमों के जरिए सावरकर की छवि को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने में पहले भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी और आज भी नहीं छोड़ रहे हैं।
 
आज सावरकर युग चल रहा है। उनके साथ हुए ऐतिहासिक पाप के प्रायश्चित का समय आ गया है।
 
इतिहास के पुनर्परीक्षण, पुनर्लेखन और पुनर्निर्माण का समय आ गया है।
 
पढ़िए सावरकर को।
गढ़िए भारत को।
 
लेख
मोहन नारायण