हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की सबसे प्रसिद्ध और शौर्यपूर्ण लड़ाइयों में से एक माना जाता है। यह युद्ध 18 जून 1576 को नाथद्वारा के निकट हल्दीघाटी नामक स्थान पर लड़ा गया था।
आज हल्दीघाटी के युद्ध को 450 वर्ष हो गए हैं। इसलिए आज हम आपको बताएंगे कि हल्दीघाटी के मैदान में वास्तव में क्या हुआ था और हल्दीघाटी किसके नाम रही।
अलीगढ़ स्कूल ऑफ थॉट के इतिहासकारों ने हमारे साथ छल किया और सीधे-सीधे अकबर को विजेता घोषित कर दिया, क्योंकि उन्हें हिंदुओं को पराजित दिखाना था। हमारे मन में हीनता का भाव भरना था, ताकि हम भी यही मानने लगें कि हम केवल हारने के लिए बने हैं। हमें ऐसा लगने लगे कि हम विजय के योग्य ही नहीं हैं।
लेकिन कहानी कुछ और है।
1572 में राणा उदय सिंह के देहांत के बाद कुंवर प्रताप मेवाड़ के नए महाराणा बने। उनका राज्याभिषेक हुआ।
राज्याभिषेक के बाद यह तय था कि एक दिन युद्ध अवश्य होगा। उसकी तैयारियाँ उन्होंने शुरू कर दीं। मेवाड़ी नागरिकों को अरावली की पहाड़ियों में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे युद्ध के समय जान-माल का नुकसान कम हो। इसे "स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी" कहा जाता है। इसका अर्थ है भूमि को बंजर बना देना, ताकि दुश्मन परेशान हो जाए और उसके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाए।
दूसरी ओर, अकबर अधिकांश राजपूताना को मुग़ल पताका के तले ला चुका था।
मेवाड़ के उत्तर में बीकानेर और जयपुर, पूर्व में बूंदी तथा पश्चिम में जोधपुर, सभी धीरे-धीरे झुक गए और मुग़लों के अधीनस्थ राज्य बन गए।
अब केवल मेवाड़ बचा था। मेवाड़ के दक्षिण में गुजरात सल्तनत का शासन था। मेवाड़ को झुकाने और डराने के लिए अकबर ने 1572 में गुजरात को भी अपने अधीन कर लिया।
अब ज़रा कल्पना कीजिए कि स्थिति कैसी रही होगी। मेवाड़ के चारों ओर मुग़ल थे, चारों ओर जिहादी शक्तियाँ थीं।
इसके बावजूद राणा प्रताप न डिगे, न डरे और युद्ध की तैयारियाँ जारी रखीं।
गुजरात विजय के बाद अकबर ने राणा प्रताप के पास संधि प्रस्ताव भेजने शुरू किए। एक के बाद एक चार संधि प्रस्ताव महाराणा प्रताप के पास भेजे गए।
सबसे पहले जलाल खान कोरची, फिर मान सिंह, उसके बाद राजा भगवान दास और अंत में राजा टोडर मल। लेकिन सभी प्रयास विफल रहे।
मान सिंह वाला प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जब मान सिंह मेवाड़ पहुँचे और राणा ने उनके भोजन की व्यवस्था कराई, तब भोजन की मेज़ पर राणा स्वयं उपस्थित नहीं हुए। उन्होंने कुंवर अमर सिंह को मान सिंह की आवभगत का दायित्व सौंप दिया।
जब मान सिंह ने कहा, "अपने पिताश्री को बुलाओ", तब उन्हें उत्तर मिला कि उनके पेट में दर्द है, इसलिए वे नहीं आ पाएंगे। आप भोजन प्रारंभ करें।
इसके बावजूद मान सिंह ने आग्रह किया। तब तक वे समझ चुके थे कि मामला क्या है। इसी बीच राणा वहाँ पहुँच गए और उन्होंने कहा, "तुम एक गद्दार राजपूत हो। तुम्हारे साथ मैं भोजन नहीं कर सकता, क्योंकि तुमने मुग़लों के साथ वैवाहिक गठबंधन किया है।"
यह सुनकर मान सिंह क्रोधित हो उठे और बोले, "अब मुकाबला मैदान में होगा।"
तभी राणा के पीछे खड़े उनके सेनापति डोडिया भीम सिंह बोले, "अपने फूफा को भी साथ लेकर आना।"
अपमान सहकर मान सिंह वहाँ से चले गए।
इसके बाद मान सिंह आगरा पहुँचे और पूरा घटनाक्रम अकबर को सुनाया। इसके पश्चात एक बड़ी सेना लेकर 3 अप्रैल 1576 को अजमेर से उदयपुर की ओर कूच कर दिया।
मोलेला और खमनोर गाँव के निकट मान सिंह ने अपना शिविर लगाया और राणा मुग़लों के पहले हमले की प्रतीक्षा करने लगे।
यह उल्लेखनीय है कि मुग़लों की सेना राणा प्रताप की सेना की तुलना में कहीं अधिक बड़ी और संसाधन-संपन्न थी।
बदायूँनी के समकालीन विवरण के अनुसार, मुग़ल सेनापति मान सिंह ने युद्ध में 5,000 घुड़सवारों का नेतृत्व किया था। हालाँकि मारवाड़ राज्य के एक मंत्री मुहनोत नैणसी की बाद की रचना ‘नैणसी की ख्यात’ में कहा गया है कि उन्होंने 40,000 सैनिकों की कमान संभाली थी।
इसके बाद की रचना, कविराज श्यामलदास की ‘वीर विनोद’ में दावा किया गया है कि मुग़ल सैनिकों की संख्या 80,000 थी।
प्रताप की सेना के आकार को लेकर भी स्रोतों में मतभेद है। विभिन्न स्रोतों के अध्ययन के बाद राजस्थान के बीसवीं सदी के प्रमुख इतिहासकारों में से एक प्रोफेसर जी. एन. शर्मा का कहना है कि महाराणा प्रताप ने 3,000 घुड़सवारों, 2,000 पैदल सैनिकों, 150 हाथियों और लगभग 100 अन्य सहयोगियों, जो नगाड़ा बजाने वाले, तुरहीवादक और पाइक-मैन के रूप में कार्य करते थे, के साथ मुग़ल सेना का सामना किया।
हमेशा की तरह भील तीरंदाज महाराणा प्रताप की सेना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे।
दोनों पक्षों की वास्तविक संख्या चाहे जो भी रही हो, यह स्पष्ट है कि प्रताप की मेवाड़ सेना की संख्या अकबर द्वारा भेजी गई मुग़ल सेना की तुलना में कम थी।
18 जून की सुबह दोनों सेनाएँ हल्दीघाटी के दर्रे के निकट आमने-सामने आ गईं।
युद्ध के मैदान में अकबर की सेना के साथ इतिहासकार बदायूँनी भी मौजूद था, जिसने अपनी पुस्तक ‘मुन्तख़ब-उत-तवारीख़’ में आँखों देखा हाल लिखा है।
वह लिखता है, "हमारी सेना के जो लोग पहले ही आक्रमण में भाग गए थे, वे तब तक नहीं रुके, जब तक कि वे नदी के पार पाँच-छह कोस आगे नहीं निकल गए।"
बदायूँनी आगे लिखता है कि काजी खाँ नामक एक मुग़ल सेनानायक का हाथ कट गया और वह युद्धस्थल से भागते हुए ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, "जब दुश्मन हावी हो तो लड़ाई से भागना हमारे पैगम्बर की सुन्नत है।" यह राणा के पराक्रम को दर्शाता है।
इसी बीच राणा ने मान सिंह पर भाले से वार किया, लेकिन वह बच निकला।
इस दौरान राणा को लगा कि उन्होंने मान सिंह को मार दिया है और उन्होंने तय किया कि अब वह युद्धभूमि से निकल जाएंगे।
राणा मुग़ल सेना को भारी क्षति पहुँचा चुके थे। उन्होंने निर्णय लिया कि अब अपनी सेना के साथ अरावली की पहाड़ियों में चले जाना चाहिए।
उन्होंने अपना छत्र झाला मान सिंह के सिर पर रख दिया और वे 500 सैनिकों के साथ युद्धभूमि में डटे रहे, ताकि मुग़ल सेना को रोके रख सकें।
इस प्रकार शेष सेना और राणा अरावली की पहाड़ियों में चले गए और वहाँ से छापामार युद्ध जारी रखा।
मुग़ल सेना अत्यंत विशाल थी, इसलिए यह निर्णय लिया गया कि खुले मैदान में लड़ने की अपेक्षा अरावली की पहाड़ियों से युद्ध जारी रखना अधिक उचित होगा।
मैदान भले ही मान सिंह के नाम रहा हो, लेकिन इस युद्ध में मुग़ल सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी। इसकी पुष्टि स्वयं बदायूँनी अपनी पुस्तक में करता है।
18 जून के बाद मुग़ल सेना कुछ दिनों तक मेवाड़ में डटी रही, लेकिन वहाँ टिके रहना उनके लिए कठिन होता गया, क्योंकि "स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी" के तहत राणा की सेना पहले ही अधिकांश संसाधनों को नष्ट कर चुकी थी।
यही राणा की रणनीति थी कि भूमि को बंजर बना दिया जाए, ताकि मुग़लों को वहाँ कुछ भी न मिल सके।
18 जून के बाद जब तक मुग़ल सेना मेवाड़ में रही, उन्हें लगातार यह भय सताता रहा कि पहाड़ों से कोई सैनिक निकलकर उन पर हमला कर देगा।
इसी बीच अकबर ने मान सिंह और मुग़ल सेना को वापस बुला लिया। राणा की अपेक्षाकृत छोटी सेना ने मुग़लों की विशाल फ़ौज का क्या हाल किया था, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि युद्ध के बाद अकबर मान सिंह से बहुत नाराज़ था। वह इतना क्रोधित था कि उसने राजा मान सिंह के दरबार में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी।
कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध की तुलना थर्मोपाइली के युद्ध से की है।
थर्मोपाइली तटीय ग्रीस में एक घाटी है, जहाँ 480 ईसा पूर्व में ग्रीक सेना ने फारसी आक्रांताओं का सामना किया था।
जेम्स टॉड हल्दीघाटी की तुलना थर्मोपाइली के युद्ध से करते हैं। थर्मोपाइली के युद्ध में ग्रीक राजा लियोनाइडस नायक के रूप में उभरे थे। उसी प्रकार हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप नायक बनकर उभरे तथा ‘हिंदुआ सूरज’ की उपाधि से विभूषित हुए। वे साहस और शौर्य के जीवंत प्रतीक बन गए।
जिस प्रकार फारसी सेना के सामने ग्रीक सेना संख्या में बहुत कम थी, उसी प्रकार मेवाड़ की सेना भी मुग़ल सेना की तुलना में बहुत कम थी।
1576 के बाद 1583 में अंतिम और निर्णायक युद्ध हुआ, जिसे देवर या दिवेर का युद्ध कहा जाता है, जिसमें मुग़लों की बड़ी हार हुई।
लेकिन इस युद्ध को जिहादी सोच के इतिहासकारों ने छिपा दिया।
इस युद्ध के बाद 1597 तक, जब तक राणा प्रताप जीवित रहे, मुग़लों ने मेवाड़ की ओर रुख नहीं किया।
राणा के स्वर्ग सिधारने के बाद इस विरासत को उनके सुपुत्र ने जीवित रखा और वे मुग़लों से संघर्ष करते रहे।
लेख
विवेक कुमार सिंह
अमर उजाला, नोएडा में उप-संपादक हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं।