कॉकरोच जनता पार्टी: व्यंग्य की आड़ में कौन सा एजेंडा?

क्या कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में दिख रही कुछ वैचारिक सक्रियताएं इसे महज हास्य अभियान से अधिक गंभीर राजनीतिक प्रश्न बनाती हैं?

The Narrative World    19-Jun-2026
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सोशल मीडिया पर चल रही "कॉकरोच जनता पार्टी" की डिजिटल मुहिम को अब केवल एक हास्य, व्यंग्य या व्यवस्था-विरोधी अभिव्यक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं रह गया है। क्योंकि इस अभियान के समर्थन और प्रचार में कुछ विशेष वैचारिक समूहों और व्यक्तियों की सक्रियता सोशल मीडिया पर दिखाई दे रही है। विशेष रूप से स्वयं को परिवर्तनवादी, क्रांतिकारी या व्यवस्था-विरोधी बताने वाले कुछ तत्वों द्वारा इस मुहिम को दिया जा रहा खुला समर्थन कई प्रश्न खड़े करता है।
 
देश में नक्सलवादी आंदोलन के इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि जंगलों में सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ शहरों में वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर प्रभाव स्थापित करने के लिए तथाकथित "यूनाइटेड फ्रंट" या शहरी नेटवर्क का उपयोग किए जाने की बात विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा समय-समय पर कही गई है। इस नेटवर्क का उद्देश्य सीधे हथियार उठाना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद असंतोष, बेरोजगारी, अन्याय, विषमता और शासन के प्रति नाराजगी को संगठित रूप देना, युवाओं को प्रभावित करना तथा मौजूदा व्यवस्था के विरुद्ध वातावरण तैयार करना माना जाता है।
 
आज के डिजिटल युग में इसी रणनीति को नए स्वरूप में अपनाने का प्रयास किया जा रहा है, ऐसी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। कॉकरोच जनता पार्टी की सोशल मीडिया मुहिम में अनेक स्थानों पर व्यवस्था के प्रति असंतोष, राजनीतिक नेतृत्व के प्रति अविश्वास और पारंपरिक संस्थाओं के प्रति नाराजगी का आक्रामक चित्रण दिखाई देता है। लोकतंत्र में सत्ताधारियों की आलोचना करना या व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। किंतु जब यह आलोचना केवल असंतोष व्यक्त करने तक सीमित न रहकर व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष, संघर्ष से अस्थिरता और अस्थिरता से क्रांति की दिशा में मोड़ने का प्रयास करती हुई प्रतीत हो, तब उसके पीछे के उद्देश्यों की जांच आवश्यक हो जाती है।
 
विशेष रूप से "जेन-ज़ी" अर्थात नई पीढ़ी के युवाओं पर इस अभियान का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सोशल मीडिया उनके लिए प्रमुख संवाद माध्यम बन चुका है। इसलिए मीम्स, वीडियो, व्यंग्यचित्रों और भावनात्मक संदेशों के माध्यम से उनके विचारों को प्रभावित करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। इस पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग बेरोजगारी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक परिवर्तनों के कारण पहले से ही बेचैनी का अनुभव कर रहा है। ऐसे वातावरण में व्यवस्था-विरोधी संदेशों को समर्थन मिलना स्वाभाविक है। इसी मनोस्थिति का लाभ उठाकर कुछ वैचारिक समूह युवाओं को अधिक आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित करने का प्रयास कर रहे हैं, ऐसा प्रतीत होता है।
 
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सोशल मीडिया पर उपलब्ध अनेक पोस्टों और चर्चाओं में यह संदेश लगातार प्रसारित किया जा रहा है कि युवाओं को सड़कों पर उतरना चाहिए, पारंपरिक राजनीतिक प्रक्रियाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए और केवल प्रत्यक्ष संघर्ष के माध्यम से ही परिवर्तन संभव है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संदेशों और पहले शहरी नक्सलवाद से जुड़े विमर्शों में सामने आए कुछ व्यक्तियों की सक्रियता के बीच समानताएं देखी जा सकती हैं। जंगलों में संचालित नक्सली आंदोलन को सुरक्षा बलों की कार्रवाई और स्थानीय जनसमर्थन में कमी के कारण गंभीर झटका लगा है। ऐसे में संघर्ष का केंद्र शहरों और विशेष रूप से डिजिटल मंचों की ओर स्थानांतरित करने की कोशिश की जा रही है, ऐसी चर्चा नई नहीं है।
 
कॉकरोच जनता पार्टी स्वयं को व्यवस्था परिवर्तन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करती है, किंतु अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उसके प्रचार का लाभ किसे मिल रहा है और उसके संदेशों का उपयोग किन समूहों द्वारा किया जा रहा है। कोई भी सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन लोकप्रिय होते ही विभिन्न हितसमूह उसे अपने उद्देश्यों के लिए उपयोग करने का प्रयास करते हैं। यहां भी ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि असंतोष को दिशा देने के नाम पर युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से दूर ले जाया जा रहा है, तो यह केवल राजनीतिक विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रीय और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
 
इसी कारण सोशल मीडिया पर चलने वाले किसी भी अभियान का, चाहे वह कितना भी आकर्षक या लोकप्रिय क्यों न हो, उसके वैचारिक आधार, उसे प्राप्त समर्थन तथा उसके माध्यम से प्रसारित संदेशों का गंभीर और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन आवश्यक है। विशेष रूप से युवाओं के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे भावनात्मक नारों के बजाय तथ्यों के आधार पर विचार करें और किसी भी डिजिटल अभियान के पीछे के वास्तविक उद्देश्यों को समझने का प्रयास करें। इतिहास बताता है कि असंतोष परिवर्तन का माध्यम बन सकता है, लेकिन उसका उपयोग कौन करता है और किस उद्देश्य से करता है, यही उस परिवर्तन की दिशा और स्वरूप निर्धारित करता है।
 
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कॉकरोच जनता पार्टी के बढ़ते डिजिटल प्रभाव को देखते हुए एक और पहलू की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस अभियान का समर्थन करने वाले कुछ व्यक्तियों, पेजों और वैचारिक प्रवाहों का अध्ययन करने पर उनके विचारों में कथित शहरी नक्सलवादी या "यूनाइटेड फ्रंट" से संबंधित दृष्टिकोणों से समानता दिखाई देने की चर्चा विभिन्न स्तरों पर हो रही है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल युवाओं की स्वतःस्फूर्त सोशल मीडिया मुहिम है, या इसके माध्यम से कोई व्यापक व्यवस्था-विरोधी वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।
 
जंगलों में सशस्त्र संघर्ष का प्रभाव कम होने के बाद शहरी असंतोष, सामाजिक विषमता और युवाओं की नाराजगी का उपयोग कर नए माध्यमों से प्रभाव निर्माण करना शहरी नक्सलवादी रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी को मिल रहे कुछ विशिष्ट वैचारिक समर्थन को केवल संयोग मानना कठिन प्रतीत होता है।
 
 
इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी को केवल सोशल मीडिया पर चल रही एक व्यंग्यात्मक या व्यवस्था-विरोधी अभिव्यक्ति मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे कहीं शहरी नक्सलवादी विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा, इसकी गंभीर पड़ताल आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की आलोचना करना और परिवर्तन की मांग करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन यदि उसी असंतोष का उपयोग व्यवस्था-विरोधी संघर्ष और अस्थिरता को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा हो, तो उसके पीछे सक्रिय शक्तियों और उनके उद्देश्यों को समझना समाज के लिए उतना ही आवश्यक हो जाता है।
 
आज वास्तविक प्रश्न कॉकरोच जनता पार्टी का नहीं, बल्कि उसके माध्यम से आगे बढ़ाए जा रहे विचारों और संभावित राजनीतिक उद्देश्यों का है।
 
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संजयसिंह ठाकुर
नक्सल विषयक अध्ययनकर्ता, नागपुर