बलिदान दिवस: राष्ट्र की एकता के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का संघर्ष

अनुच्छेद 370, अलग झंडा और परमिट व्यवस्था के खिलाफ डॉ. मुखर्जी ने क्यों छेड़ी थी निर्णायक लड़ाई? पढ़िए उनके आंदोलन और बलिदान की पूरी कहानी।

The Narrative World    23-Jun-2026   
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23 जून भारतीय राजनीति और राष्ट्रवादी विचारधारा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। इसी दिन वर्ष 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के संघर्ष के दौरान अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। भारतीय जनता पार्टी और उससे पहले भारतीय जनसंघ इस दिन को "बलिदान दिवस" के रूप में मनाते हैं। डॉ. मुखर्जी का जीवन राष्ट्र की एकता, अखंडता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
 
स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम वर्षों में देश की राजनीति पर दो-राष्ट्र सिद्धांत का प्रभाव बढ़ा। तत्कालीन नेतृत्व ने धार्मिक आधार पर देश के विभाजन को स्वीकार किया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस विचार का खुलकर विरोध किया। उन्होंने विशेष रूप से बंगाल के पूर्ण विभाजन के खिलाफ आंदोलन चलाया। उनके प्रयासों का ही परिणाम रहा कि पूरा बंगाल पाकिस्तान में नहीं गया और उसका एक बड़ा हिस्सा भारत के साथ बना रहा।
 
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स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में डॉ. मुखर्जी ने उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्य किया। हालांकि, पाकिस्तान के प्रति नरम नीति और पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर सरकार के रवैये से वे असंतुष्ट रहे। उन्होंने नेहरू-लियाकत समझौते का विरोध किया और अंततः वर्ष 1950 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में एक वैकल्पिक राष्ट्रवादी मंच खड़ा करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
 
इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डॉ. मुखर्जी के विचारों का समन्वय हुआ। उन्होंने संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी से चर्चा की और एक नए राजनीतिक दल के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। मई 1951 में शुरू हुई यह यात्रा 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली के रघोमल कन्या माध्यमिक विद्यालय में भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ पूरी हुई। डॉ. मुखर्जी इसके प्रथम अध्यक्ष बने। भगवा ध्वज को पार्टी का ध्वज और दीपक को चुनाव चिह्न बनाया गया। यही जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक आधार बना।
 
1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ ने तीन लोकसभा सीटें जीतीं। स्वयं डॉ. मुखर्जी कोलकाता दक्षिण सीट से संसद पहुंचे। संसद के भीतर और बाहर उन्होंने राष्ट्रीय एकता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। जम्मू-कश्मीर का प्रश्न उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन गया।
 
डॉ. मुखर्जी ने संविधान के अनुच्छेद 370 का प्रारंभ से विरोध किया। उनका मानना था कि यह व्यवस्था देश की एकता के लिए चुनौती बनेगी। उस समय जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त था। राज्य का अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी। लंबे समय तक वहां राज्यपाल के स्थान पर सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री के स्थान पर प्रधानमंत्री का पद मौजूद रहा। राज्य में प्रवेश के लिए भी विशेष परमिट की आवश्यकता पड़ती थी।
 
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डॉ. मुखर्जी ने इस व्यवस्था को भेदभावपूर्ण बताया। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया, "एक विधान, एक निशान, एक प्रधान।" उनका तर्क था कि जब पूरा देश एक संविधान के तहत चलता है तो जम्मू-कश्मीर के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए।
 
मार्च 1953 में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण एकीकरण की मांग को लेकर दिल्ली में सत्याग्रह शुरू हुआ। देशभर से हजारों लोगों ने इसमें भाग लिया। 10,750 से अधिक सत्याग्रही इस आंदोलन से जुड़े। डॉ. मुखर्जी ने तय किया कि वे बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करेंगे और इस व्यवस्था को खुली चुनौती देंगे।
 
 
11 मई 1953 को वे जम्मू-कश्मीर की सीमा पर माधोपुर पहुंचे। वहां प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और श्रीनगर ले जाया गया। इसके बाद अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में रखा। आंदोलन जारी रहा, लेकिन 23 जून 1953 की सुबह उनके निधन की खबर सामने आई। उनके समर्थकों और देशभर के राष्ट्रवादियों के लिए यह खबर गहरे आघात की तरह थी।
 
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डॉ. मुखर्जी का बलिदान राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उनके समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय एकता के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान माना। आने वाले दशकों में जनसंघ और फिर भाजपा ने उनके विचारों को आगे बढ़ाया। अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी रही।
 
 
अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35ए को समाप्त कर दिया। भाजपा और उसके समर्थकों ने इस फैसले को डॉ. मुखर्जी के सपने की पूर्ति बताया। उनका मानना है कि इस कदम ने जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा से पूरी तरह जोड़ा और अलगाववाद की राजनीति को कमजोर किया।
 
आज, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिवस केवल एक स्मृति नहीं है। यह उस विचार की याद दिलाता है जिसमें राष्ट्र की एकता सर्वोपरि मानी जाती है। उनका जीवन बताता है कि राजनीतिक मतभेदों के बीच भी कोई व्यक्ति राष्ट्रीय हित के लिए दृढ़ता से खड़ा रह सकता है। भारतीय राजनीति में उनके योगदान और बलिदान की चर्चा इसलिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सात दशक पहले थी।