प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को
रिपब्लिक समिट 2026 में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि आज जो लोग संविधान लेकर घूमते हैं, नक्सली हिंसा के चरम दौर में उनके हाथ संविधान दिखाने तक के लिए कांपते थे। प्रधानमंत्री का यह बयान केवल राजनीतिक आरोप नहीं है, बल्कि उस दौर की याद दिलाता है जब देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सली हिंसा की आग में झुलस रहा था और सरकारें समस्या का स्थायी समाधान खोजने में असफल साबित हो रही थीं।
नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुई थी। माओवादी विचारधारा से प्रेरित इस आंदोलन ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए बंदूक के बल पर सत्ता हासिल करने का रास्ता चुना। धीरे-धीरे यह हिंसक विचारधारा देश के कई राज्यों में फैल गई। वर्ष 2004 में विभिन्न उग्रवादी संगठनों ने मिलकर CPI (माओवादी) का गठन किया और इसके बाद नक्सलवाद भारत की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में बदल गया।
विशेष रूप से 2004 से 2014 का दशक नक्सली हिंसा का सबसे भयावह दौर रहा। इस अवधि में 17,542 हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं। 5,019 नागरिकों और 1,913 सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान गंवाई। केवल वर्ष 2010 में 1,936 घटनाएं सामने आईं और 720 नागरिकों की मौत हुई। यह आंकड़े बताते हैं कि उस समय देश के कई हिस्सों में लोकतंत्र और विकास दोनों बंधक बन चुके थे।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को वर्षों तक पिछड़ा इलाका मानकर छोड़ दिया। सरकारों ने समस्या की गंभीरता स्वीकार तो की, लेकिन कोई ठोस और एकीकृत रणनीति तैयार नहीं की। अलग-अलग राज्य अपने स्तर पर प्रयास करते रहे, जबकि नक्सली संगठन लगातार अपनी जड़ें मजबूत करते गए। परिणाम यह हुआ कि जनजातीय क्षेत्रों में सड़क, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने में भारी बाधाएं खड़ी हो गईं।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में याद दिलाया कि एक समय ऐसा था जब जनजातीय क्षेत्रों में सरकारी वाहन तक नहीं पहुंच पाते थे। नक्सली गोलियों से छलनी कर देते थे। दशकों तक हिंसा का यह दुष्चक्र चलता रहा और कई पीढ़ियां इसकी कीमत चुकाती रहीं। कांग्रेस सरकारों के दौरान हालात इतने खराब हो गए थे कि स्वयं केंद्र सरकार ने 2009 में नक्सलवाद को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताया था।
हालांकि 2014 के बाद तस्वीर बदलनी शुरू हुई। मोदी सरकार ने केवल सुरक्षा बलों के भरोसे समस्या हल करने की कोशिश नहीं की, बल्कि विकास, सुरक्षा और जनकल्याण को साथ लेकर आगे बढ़ी। वर्ष 2015 में राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना लागू की गई। इस नीति ने बिखरे हुए प्रयासों की जगह एक समन्वित और व्यापक रणनीति को जन्म दिया।
सरकार ने संवाद, सुरक्षा और समन्वय की त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती बढ़ाई गई। विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए। सुरक्षा से जुड़े खर्च और आधारभूत ढांचे के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहायता दी गई। साथ ही सरकार ने उन सामाजिक और आर्थिक कारणों पर भी काम किया, जिनका फायदा उठाकर नक्सली संगठन युवाओं को अपने साथ जोड़ते थे।
मोदी सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को "पिछड़ा" कहने के बजाय "आकांक्षी जिला" और "आकांक्षी ब्लॉक" का नाम दिया। इस बदलाव ने प्रशासनिक सोच को भी बदला। जिन इलाकों में कभी बंदूक की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब सड़कें, स्कूल, अस्पताल और विकास परियोजनाएं पहुंचने लगीं। प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं और इसमें आकांक्षी जिलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
सरकार ने नक्सलियों के आर्थिक नेटवर्क पर भी सीधा प्रहार किया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने नक्सली फंडिंग को निशाना बनाने के लिए विशेष इकाई बनाई। दिसंबर 2025 तक एजेंसी ने 40 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की। प्रवर्तन निदेशालय और राज्य एजेंसियों ने भी करोड़ों रुपये की अवैध संपत्तियां जब्त कीं। इससे नक्सली संगठनों की आर्थिक ताकत कमजोर हुई।
दूसरी ओर सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास का प्रभावी मॉडल तैयार किया। सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि जो हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटना चाहता है, उसके लिए दरवाजे खुले हैं। आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों को आर्थिक सहायता, मासिक भत्ता और पुनर्वास सुविधाएं दी गईं। इसी नीति का परिणाम रहा कि 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार छोड़े। 2024 से मार्च 2026 के बीच कुल 3,927 कैडरों ने आत्मसमर्पण किया।
इन प्रयासों का असर जमीन पर दिखाई दिया। 24 अगस्त 2024 को केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था। सरकार ने निर्धारित समयसीमा के भीतर यह लक्ष्य हासिल कर लिया। लगभग छह दशक तक देश को प्रभावित करने वाली वामपंथी उग्रवाद की समस्या निर्णायक रूप से कमजोर पड़ गई।
यह उपलब्धि केवल सुरक्षा बलों की सफलता नहीं है। यह लोकतंत्र, विकास और सुशासन की जीत भी है। जिन क्षेत्रों में कभी भय और हिंसा का माहौल था, वहां अब विकास और अवसरों की चर्चा होती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी आज कांग्रेस से सवाल पूछ रहे हैं कि जब हजारों लोग नक्सली हिंसा में मारे जा रहे थे, तब संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनकी आवाज इतनी कमजोर क्यों थी।
भारत का अनुभव साफ संदेश देता है कि बंदूक कभी विकास का रास्ता नहीं बन सकती। नक्सलवाद ने जनजातियों और गरीबों के नाम पर दशकों तक हिंसा फैलाई, लेकिन उनके जीवन में सुधार नहीं ला सका। इसके विपरीत लोकतांत्रिक व्यवस्था, विकास योजनाओं और प्रभावी शासन ने उन क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाई। यही "नक्सल मुक्त भारत" की सबसे बड़ी सफलता है।