25 जून 1975 की रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज है, जिसने स्वतंत्र भारत की राजनीतिक चेतना को हमेशा के लिए बदल दिया। इसे केवल एक "संवैधानिक घोषणा" या महज एक "प्रशासनिक निर्णय" कहकर परिभाषित करना अपने आप में संविधान और उसके मूल्यों पर एक तमाचा होगा। आपातकाल की घोषणा सत्ता, संविधान और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच उस संघर्ष का चरम बिंदु थी, जिसकी पृष्ठभूमि इंदिरा गांधी की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ तैयार हो रही थी।
जब अधिकांश भारतीय नागरिक अपने घरों में सो रहे थे, तब दिल्ली की सत्ता के गलियारों में ऐसे निर्णय लिए जा रहे थे, जिनका प्रभाव आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति पर दिखाई देने वाला था।
उस समय तक देश एक गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रहा था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन सरकार की वैधता को खुली चुनौती दे रहा था। गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने जनता के असंतोष को राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया था। विपक्ष पहली बार बिखरी हुई शक्ति न रहकर एक साझा प्रतिरोध में बदल रहा था। ऐसे समय में लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप सत्ता, उसे निर्धारित करने वाली जनता और संसद के समक्ष जवाबदेह बन सकती थी, किंतु इतिहास ने एक भिन्न दिशा ली।
25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने विशाल जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण के विरुद्ध आवाज उठाई। सरकार ने इस आंदोलन को लोकतांत्रिक विरोध के रूप में देखने के बजाय अपनी सत्ता के लिए खतरे के रूप में देखना शुरू कर दिया था। यही वह क्षण था, जिसके कुछ घंटों बाद भारतीय लोकतंत्र के सबसे विवादास्पद अध्याय का आरंभ हुआ।
रात होते-होते प्रधानमंत्री आवास में आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत "आंतरिक अशांति" के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल की सिफारिश रखी गई। उल्लेखनीय है कि उस समय संविधान में प्रयुक्त "आंतरिक अशांति" की परिभाषा अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट थी, जिसने कार्यपालिका को असाधारण अधिकार प्रदान किए। बाद में 44वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस शब्द को हटाकर "सशस्त्र विद्रोह" कर दिया गया, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों का दुरुपयोग न हो सके।
राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के साथ ही भारत में आपातकाल लागू हो गया। संविधान औपचारिक रूप से विद्यमान था, संसद भी अस्तित्व में थी और न्यायपालिका भी कार्यरत थी, किंतु नागरिक स्वतंत्रताओं का वास्तविक स्वरूप बदल चुका था। यही इमरजेंसी की सबसे बड़ी विडंबना थी कि लोकतंत्र की संस्थाएं दिखाई दे रही थीं, परंतु उनकी आत्मा पर इंदिरा गांधी का नियंत्रण था।
आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय हो गई। आधी रात के बाद देशभर में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ। पुलिस और प्रशासन के पास पहले से तैयार सूची थी। विपक्षी नेताओं के घरों पर छापे मारे गए। अनेक नेताओं को यह तक नहीं बताया गया कि उन्हें किस आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है। मीसा (MISA – Maintenance of Internal Security Act) जैसे कानूनों का प्रयोग करते हुए हजारों लोगों को बिना मुकदमे और बिना न्यायिक सुनवाई के जेलों में भर दिया गया।
जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, चरण सिंह और अनेक विपक्षी नेताओं को रातोंरात हिरासत में ले लिया गया। लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का शत्रु नहीं, बल्कि आवश्यक संस्थागत संतुलन माना जाता है। किंतु इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान राजनीतिक विरोध को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया गया।
विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरकार के निशाने पर आ गया। संघ को प्रतिबंधित कर दिया गया और उसके हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया। सरकार की दृष्टि में संघ केवल एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा संगठित नेटवर्क था, जो इमरजेंसी विरोधी प्रतिरोध को जीवित रख सकता था। यही कारण था कि संघ के कार्यालयों पर छापे पड़े, साहित्य जब्त किया गया और स्वयंसेवकों को व्यापक स्तर पर बंदी बनाया गया।
हालांकि, प्रतिबंध के बावजूद संघ का भूमिगत संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। अनेक स्वयंसेवकों ने गुप्त रूप से संपर्क व्यवस्था बनाए रखी, इंदिरा गांधी के अनुसार "प्रतिबंधित" साहित्य का वितरण किया और लोकतंत्र की बहाली के लिए चल रहे प्रयासों में भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में प्रकाशित विभिन्न संस्मरणों और शोधों में यह उल्लेख मिलता है कि आपातकाल के विरोध में जो नेटवर्क तैयार किया गया, उसके संचालन में संघ के कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
छात्र संगठन भी सरकार के निशाने पर थे। बिहार और गुजरात आंदोलनों से निकली छात्र शक्ति को इमरजेंसी के दौरान विशेष रूप से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। अनेक छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया, छात्र गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई गई और विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक गतिविधियों को सीमित किया गया। इंदिरा गांधी को यह भय था कि जिस युवा शक्ति ने जेपी आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया था, वही भविष्य में भी विरोध का केंद्र बन सकती है।
केवल राजनीतिक दल या छात्र संगठन ही नहीं, बल्कि अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, बुद्धिजीवी और नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग भी कार्रवाई की चपेट में आए। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि नागरिक सरकार की आलोचना कर सकें, किंतु इमरजेंसी के दौरान असहमति और विरोध के बीच की रेखा लगभग समाप्त कर दी गई। राज्य की दृष्टि में अनेक मामलों में आलोचना ही अपराध बन गई।
संविधान पर सत्ता की छाया
इंदिरा गांधी सरकार की चिंता केवल सड़कों पर हो रहे विरोध या भूमिगत गतिविधियों तक सीमित नहीं थी। सबसे बड़ा संकट न्यायपालिका के स्तर पर मौजूद था। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला प्रधानमंत्री की राजनीतिक वैधता को पहले ही चुनौती दे चुका था और मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन था। यदि वहां भी प्रतिकूल निर्णय आता, तो इमरजेंसी के बावजूद सरकार गंभीर संकट में पड़ सकती थी।
इंदिरा गांधी की इसी चिंता ने भारत के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया। फलस्वरूप, यहीं से इमरजेंसी का दूसरा चरण शुरू होता है, जिसमें संस्थाओं पर नियंत्रण से आगे बढ़कर संवैधानिक संरचना के पुनर्गठन का प्रयास शुरू हुआ।
अगस्त 1975 में जिस गति से संवैधानिक संशोधन लाए गए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार केवल राजनीतिक विरोध को दबाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह संवैधानिक ढांचे को भी अपने अनुरूप, या कहें इंदिरा गांधी के अनुरूप, ढालना चाहती थी।
39वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रधानमंत्री और उच्च पदाधिकारियों के चुनावी विवादों को विशेष संरक्षण देने का प्रयास किया गया। इसके तुरंत बाद हुए अन्य संशोधनों ने भी कार्यपालिका की शक्ति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया। संसद में विपक्ष की अनुपस्थिति और कांग्रेस के भारी बहुमत ने इन संशोधनों को तीव्र गति से पारित करवा दिया।
यह वह दौर था, जब संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच स्थापित संवैधानिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।
इस प्रकार, 25 जून की रात केवल आपातकाल की घोषणा की रात नहीं थी, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया का प्रारंभ थी, जिसमें पहले राजनीतिक विरोध को नियंत्रित किया गया और अंततः इंदिरा गांधी की इच्छा के अनुरूप संवैधानिक संरचना को उनकी राजनीतिक आवश्यकताओं के हिसाब से ढालने का प्रयास किया गया।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय