हिन्दू पद पादशाही के लिए छत्रपति शिवाजी का संघर्ष: प्रारंभिक जीवन और स्वराज्य की नींव

आदिलशाही और मुग़ल सत्ता के बीच छत्रपति शिवाजी ने किन रणनीतियों, निर्णयों और प्रारम्भिक अभियानों से स्वराज्य की मजबूत आधारशिला रखी?

The Narrative World    27-Jun-2026
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वीर सावरकर द्वारा अपनी पुस्तक "हिन्दू पद पादशाही" में छत्रपति शिवाजी के प्रयास को हिन्दवी स्वराज्य के लिए संघर्ष बताया जाना पूर्णतः समुचित है। हिन्दू पद पादशाही के लिए छत्रपति शिवाजी का दुर्घर्ष प्रयास भारतीय इतिहास की एक अविस्मरणीय गाथा है। कठिनतम परिस्थितियों में असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संपन्न कर पाने के कारण वे प्रातः स्मरणीय हैं और भारतीय इतिहास की महानतम विभूतियों में उच्च स्थान रखते हैं। महर्षि अरविन्द ने छत्रपति शिवाजी को विभूति अर्थात दैवीय शक्ति का प्रकटीकरण ही कहा है जो मात्र सामरिक कौशल संपन्न ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने भीषण संकट के समय भारत की संस्कृति को नष्ट होने से बचाया।
 
स्वतंत्रता आंदोलन के काल में उनका जीवन और कार्य देशवासियों के लिए प्रमुख प्रेरणा स्रोत रहे थे। वर्तमान समय में भी वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में राष्ट्र के सम्मुख आने वाली चुनौतियों का संगठित होकर मुक़ाबला करने की प्रेरणा देते हैं। वे हिन्दू समाज को सामाजिक समरसता अपनाने तथा जबरन या लोभ-लालच से इस्लाम या ईसाइयत में परावर्तित हुए लोगों की शुद्धि द्वारा घर वापसी के लिए प्रयासरत होने का मार्ग दिखाते हैं।
 
स्वतंत्रता संग्राम और नवजागरण में प्रेरणा
 
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बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) ने अपनी पत्रिका 'बंगदर्शन' और अपने लेखों में इस बात का विशेष उल्लेख किया कि किस प्रकार छत्रपति शिवाजी ने सभी जातियों के लोगों को आततायी के साथ संघर्ष में संगठित करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजों के विरुद्ध जनजागरण के लिए 15 अप्रैल 1895 को 'शिवाजी उत्सव' प्रारम्भ किया। इस उत्सव को उन्होंने राजनैतिक सम्मेलनों पर थोपे गए सरकारी प्रतिबन्ध से बचते हुए जनमानस में क्रांतिकारी भावना फैलाने का एक सशक्त माध्यम बना लिया। छत्रपति शिवाजी के राजतिलक को स्मरण करवाने के लिए रबीन्द्रनाथ टैगोर ने 1904 में "शिवाजी उत्सव" नाम से एक प्रसिद्ध बंगाली कविता की रचना की।
 
महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार टिप्पणी करते हैं कि छत्रपति शिवाजी ने अपनी सफलता से यह सिद्ध कर दिया कि हिन्दू समाज एक राष्ट्र का गठन करने, राज्य का निर्माण करने और शत्रुओं को पराजित करने में पूर्णतः समर्थ है। वीर सावरकर द्वारा 16 वर्ष की उम्र में स्थापित गुप्त संगठन 'मित्र मेला' द्वारा 1899 में पहला उत्सव मनाया गया, जो छत्रपति शिवाजी का जन्म दिन था। युवा सावरकर जी ने उनकी अर्चना में 1902 में "जयदेव जयदेव जय जय शिवराया, या या अनन्य शरणा आर्यां ताराया" आरती लिखी। इसे आज भी महाराष्ट्र में शिव जयंती पर बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
 
जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि उन्हें परतंत्रता के विलासितापूर्ण जीवन की अपेक्षा स्वतंत्रता का जीवन अधिक खुशगवार प्रतीत हुआ। इसके विपरीत, गांधी जी अपने अहिंसा के सिद्धांत की कसौटी की दुहाई देते हुए लिखते हैं कि यदि वे महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी के काल में उत्पन्न हुए होते, तो वे उन्हें उनकी सफलताओं और वीर योद्धा होने के बावजूद "पथभ्रष्ट देशभक्त" कह कर पुकारते (यंग इंडिया, 9 अप्रैल 1925)।
 
तत्कालीन राजनैतिक अवस्था और संघर्ष की पृष्ठभूमि
 
सत्रहवीं सदी में उत्तर भारत अत्याचारी मुग़ल साम्राज्य और दक्षिण भारत उतनी ही अत्याचारी निज़ामशाही, आदिलशाही और कुतुबशाही के शासन से त्रस्त था। सुदूर दक्षिण में विजयनगर का हिन्दू राज्य अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था। सम्राट बनने से पहले औरंगज़ेब दक्कन (महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक) में लम्बे काल तक (1636-1642 और 1652-1657) सूबेदार रहा था। खेद की बात यह थी कि दक्षिण के मुस्लिम राज्य अपने आपसी युद्धों या मुगलों से संघर्ष के लिए तथा हिन्दू प्रजा पर अधिकार बनाये रखने के लिए कुछ हिन्दू देशमुखों या जागीरदारों के सहयोग पर निर्भर करते थे। ये देशमुख पाटिलों के माध्यम से किसानों से बहुत अधिक लगान वसूलते थे और इसका एक बड़ा भाग मुस्लिम शासकों को मिलता था। वे उनके सहयोग के लिए सेना भी रखते थे और किलों की किलेदारी भी करते थे।
 
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उनके ऐसे ही सहयोगियों में बीजापुर के आदिलशाह के देशमुख छत्रपति शिवाजी महाराज के पितामह मालोजी भोंसले, पिता शाहजी और पश्चिमी विदर्भ के सिंदखेड में अहमदनगर के निज़ामशाह के जागीरदार लेखूजी जाधव भी थे। लेखूजी अपनी योग्यता के बल पर निज़ामशाही सल्तनत के सबसे शक्तिशाली देशमुखों में गिने जाने लगे थे। जावली के मोरे बीजापुर के आदिलशाह के अधीन ताक़तवर शासक थे। घोरपड़े, निम्बालकर, शिर्के आदि बीजापुर के आदिलशाह के अधीन अन्य प्रमुख देशमुख थे।
 
छत्रपति शिवाजी एक शक्तिशाली देशमुख के पुत्र थे। वे चाहते तो अपने पिता के पदचिन्हों पर चलकर सुखमय और निरापद जीवन अपना सकते थे। किन्तु इसके बजाय, उन्होंने बचपन से ही देश के समस्त उत्पीड़ित और भयाक्रांत लोगों के हितार्थ स्वराज्य स्थापना हेतु खतरों से खेलने का कंटकाकीर्ण (कांटों भरा) मार्ग अपनाने का निश्चय किया।
 
शैशव काल और अखिल भारतीय दृष्टिकोण
 
शैशव काल से ही माता जीजाबाई द्वारा रामायण, महाभारत आदि के प्रेरक उदाहरणों से छत्रपति शिवाजी के मन में आततायी मुस्लिम शासकों की नौकरी करने के बजाय देश को उनसे मुक्त करके स्वराज्य स्थापना के सँस्कार उत्पन्न किये जाने लगे थे। 1629 में, जिस समय छत्रपति शिवाजी गर्भ में थे, निजामशाह के आदेश से लेखुजी द्वारा आदिलशाह के अधीनस्थ दौलताबाद (देवगिरि) के महत्वपूर्ण दुर्ग की विजय के पश्चात, उनकी बढ़ती शक्ति से भयाक्रान्त होकर षड़यंत्र रचा गया। उस षड्यंत्र के तहत लेखुजी की उनके पुत्र और पौत्रों सहित हत्या कर दी गई। इस क्रूर घटना ने निश्चित ही जीजाबाई के मन पर अत्यंत गहरा प्रभाव डाला होगा।
 
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छत्रपति शिवाजी का दृष्टिकोण अखिल भारतीय था और उनकी सफलता के प्रभाव का व्याप भी सम्पूर्ण भारत पर रहा। यह बात अनेक उदाहरणों से प्रमाणित होती है। उदाहरण के लिए, 1668 में जब बुंदेलखंड के युवा शासक छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी की सेना में रहकर उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्त की, तो छत्रपति शिवाजी ने उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और क्षमता को देखकर उन्हें सुदूर अपने पैतृक क्षेत्र बुंदेलखंड में स्वतंत्रता का संघर्ष प्रारंभ करने की सलाह दी। आगे चलकर छत्रसाल मुग़लों के प्रबल शत्रु सिद्ध हुए और उन्होंने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
 
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छत्रपति शिवाजी ने लोगों के न्यायपूर्ण और मानवीय अधिकारों की रक्षार्थ हथियार उठाये। उनसे पहले भी सैकड़ों वीर योद्धाओं ने देश और धर्म के लिए अपना बलिदान दिया था। किन्तु छत्रपति शिवाजी के सैन्य कौशल, कूटनीतिक चातुर्य, दृढ़ आत्मविश्वास और योजना पूर्वक खतरों से खेलने की क्षमता के कारण उनके भाग्य में सफलताओं की एक ऐसी श्रृंखला प्रारंभ होना बदा था, जिसका असर एक शताब्दी से भी अधिक समय तक बना रहा। उनकी इस सफ़लता ने भारत के इतिहास को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
 
राज्य स्थापना का प्रारम्भ
 
1636 में, जब वे मात्र 6 वर्ष के थे, शाहजी को बीजापुर के आदिलशाह द्वारा सुदूर दक्षिण में राज्य विस्तार के लिए नियुक्त कर दिया गया। महाराष्ट्र में उनकी पैतृक पूना और सूपा की जागीर की व्यवस्था माता जीजाबाई द्वारा अत्यंत कुशलता से की जाने लगी। 1640 के पश्चात छत्रपति शिवाजी और जीजाबाई कुछ समय के लिए बैंगलोर गए। यहाँ एक प्रमुख मराठा देशमुख संभाजी मोहिते की पुत्री सईबाई के साथ बड़े धूम-धाम से छत्रपति शिवाजी का विवाह संपन्न हुआ। इसके बाद बालक छत्रपति शिवाजी अपनी माता के साथ पूना वापस आ गए।
 
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छत्रपति शिवाजी ने मात्र 15 वर्ष की अल्प आयु में पूना के समीप सह्याद्रि पर्वत माला के पर्वतीय क्षेत्र के मावल युवकों को स्वराज्य निर्माण के लिए संगठित करने का अभियान प्रारम्भ किया। यह अभियान इतना सफल रहा कि एक वर्ष बाद ही 1646 में उन्होंने समुद्रतल से लगभग 4600 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित तोरणा के दुर्गम दूर्ग को जीतने में सफलता प्राप्त की। इसे उन्होंने प्रचंडगढ़ नाम दिया। यहाँ उन्हें बहुत बड़ा खजाना प्राप्त हुआ, जिसका उपयोग राजगढ़ दुर्ग के निर्माण में किया गया। राजगढ़ उनकी पहली राजधानी बना और 1670 तक उनके राज्य का प्रमुख केंद्र रहा। इस विजय के साथ छत्रपति शिवाजी के 370 दुर्गों पर अधिकार के ऐतिहासिक अभियान का प्रारम्भ हुआ। अगले दो वर्षों में उन्होंने पूना के समीप पुरन्दर और कोंडाणा के पहाड़ी दुर्गों और चाकण के मैदानी दुर्ग सहित कई महत्वपूर्ण दुर्गों पर अपना अधिकार कर लिया।
 
 
छत्रपति शिवाजी की इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए आदिलशाह ने षड्यंत्र पूर्वक उनके पिता शाहजी को बंदी बना लिया। 1649 में छत्रपति शिवाजी को अपने पिता की मुक्ति के बदले कोंडाणा का महत्वपूर्ण दुर्ग आदिलशाह को सौंपना पड़ा। 1649 से 1655 तक राजनैतिक परिस्थितियों के कारण छत्रपति शिवाजी ने अपनी आक्रामक गतिविधियों पर नियंत्रण रखा। इस काल में उन्होंने अपने राज्य में सुदृढ़ व्यवस्था स्थापित करने और जीते हुए क्षेत्रों पर अपने प्रशासनिक अधिकार को मजबूत करने की ओर ध्यान दिया।
 
लेख
डॉ. महावीर प्रसाद जैन