1656 में 18 वर्ष के युवक अली आदिलशाह के बीजापुर की गद्दी पर बैठने के पश्चात, मुग़लों द्वारा इस राज्य के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किये जाने का लाभ उठाकर, छत्रपति शिवाजी ने पुनः अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया। इस समय अवसर देखकर दक्षिण में नियुक्त मुग़ल सूबेदार औरंगज़ेब ने बीजापुर राज्य पर आक्रमण किया और बीदर पर अधिकार कर लिया। तभी मुग़ल राज्य में शाहजहां के पुत्रों के बीच गृह युद्ध प्रारंभ हो गया, जिससे औरंगज़ेब का दक्षिण अभियान अधूरा रह गया।
1656 में उन्होंने आदिलशाह के एक शक्तिशाली देशमुख जागीरदार चन्द्रराव मोरे को पराजित कर महाबलेश्वर के निचले इलाके में जावली पर अधिकार कर लिया। जावली का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह पश्चिमी महाराष्ट्र के पहाड़ी क्षेत्र से लेकर अरब सागर के किनारे कोंकण प्रदेश तक फैला हुआ था। मोरे के अधीनस्थ इस क्षेत्र में सामरिक महत्त्व के 13 अभेद्य दुर्ग थे। यह पहाड़ी वनांचल भविष्य में संभावित छापामार युद्ध के लिए बहुत उपयुक्त था। प्रत्यक्ष युद्ध करके मोरे के अधीन क्षेत्र को जीतना बहुत कठिन था, इस कारण इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कूटनीति का सहारा लिया गया। जावली विजय के परिणामस्वरूप अन्य दुर्गों के साथ रायगढ़ भी छत्रपति शिवाजी के अधिकार में आ गया। सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के सुरक्षित अंचल में अवस्थित इस दूर्ग को अंग्रेजों ने 'भारत के जिब्राल्टर' की संज्ञा दी है। छत्रपति शिवाजी द्वारा इसमें व्यापक निर्माण कार्य करवाकर इसे आगे चलकर अपने साम्राज्य की राजधानी बनाया गया।
अफजल खान का वध और पन्हाला का संघर्ष
छत्रपति शिवाजी की अभूतपूर्व सफलताओं से घबराकर आदिलशाह ने उनके विरुद्ध अपने सबसे खूंखार सेनापति अफजल खान को एक विशाल सेना देकर भेजा। उसने छत्रपति शिवाजी को नव निर्मित प्रतापगढ़ किले में घेर लिया। उन्हें किले से बाहर निकलकर सामना करने को उकसाने के लिए उसने अनेक पवित्र मंदिरों को भ्रष्ट किया। वह सबसे पहले तुलजापुर आया और यहाँ तुलजा भवानी के प्रसिद्ध मंदिर को (जिसे 51 शक्ति पीठों में गिना जाता है) गौ हत्या करके अपवित्र किया। उसने दक्षिण कैलाश माने जाने वाले शिखर सिंघणा मंदिर और पंढरपुर के प्राचीन विट्ठोबा मंदिर को भी अपवित्र किया और निर्दोष जनता पर अमानुषिक अत्याचार किये।

अंत में उसने प्रतापगढ़ से लगभग 50 किलोमीटर दूर वाई में अपनी सेना के तम्बू गाड़े, जो अपने 100 के लगभग मंदिरों के कारण 'दक्षिण काशी' के नाम से प्रसिद्ध है। इस भीषण परिस्थिति में भी छत्रपति शिवाजी ने अपना संयम और मानसिक संतुलन बनाये रखा, क्योंकि प्रत्यक्ष और खुले युद्ध में विशाल आदिलशाही सेना का मुक़ाबला करना असंभव था। अंततः उन्होंने 10 नवम्बर 1659 को किले के नीचे संधि वार्ता के लिए मिलने का खतरा उठाया और अफजल खान का वध कर दिया। छत्रपति शिवाजी अफजल खान की धोखा देने की नीयत के प्रति पहले से ही सावधान थे। इसके पश्चात हुए भीषण युद्ध में छत्रपति शिवाजी को निर्णायक विजय प्राप्त हुई और आदिलशाह की अधिकांश सेना नष्ट हो गई।
जुलाई 1660 में छत्रपति शिवाजी को आदिलशाह की विशाल सेना द्वारा पन्हाला दूर्ग में घेर लिया गया। जब दुर्ग का गिरना निश्चित हो गया, तो वे रात के अँधेरे में दूर्ग से छिपकर निकल गए। जब आदिलशाही सेना उनका पीछा कर रही थी, तब वीर बाजीप्रभु देशपांडे और उनके मुट्ठी भर सैनिकों ने घोडखिंड नामक संकरी घाटी में अपनी जान की बाजी लगा दी। उन्होंने मरते दम तक 18 घंटे के लिए शत्रु सेना को रोके रखा और छत्रपति शिवाजी के प्राणों की रक्षा की। घोडखिंड को छत्रपति शिवाजी द्वारा 'पावनखिंड' (पवित्र घाटी) का नाम दिया गया।
मुग़ल साम्राज्य से सीधी टक्कर
छत्रपति शिवाजी की बढ़ती शक्ति से मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के कान खड़े हो गए। उसने उनकी शक्ति का दमन करने के लिए जनवरी 1660 में अपने मामा शाइस्ता खान को एक लाख की विशाल सेना देकर दक्कन का सूबेदार बनाकर भेजा। शाइस्ता खान ने छत्रपति शिवाजी के पूना के महल (लाल महल) पर कब्ज़ा कर लिया। इसके प्रत्युत्तर में, छत्रपति शिवाजी ने 5 अप्रैल 1663 की रात को अत्यंत साहस का परिचय देते हुए शाइस्ता खान पर सीधा आक्रमण किया। इस हमले में शाइस्ता खान की उँगलियाँ कट गईं और उसके पुत्र की मृत्यु हो गई, जिसके बाद वह भयभीत होकर महाराष्ट्र छोड़कर भाग गया।
मुगलों द्वारा पहुंचाई गई आर्थिक क्षति की भरपाई के लिए छत्रपति शिवाजी ने जनवरी 1664 में मुग़ल साम्राज्य के सबसे समृद्ध नगर सूरत पर सफल अभियान किया। इसके बाद औरंगज़ेब ने 1665 में जयपुर के राजा जयसिंह को विशाल सेना देकर भेजा। मुग़ल सेना ने पुरन्दर के दुर्ग को घेर लिया। संकट की इस स्थिति में छत्रपति शिवाजी ने व्यापक जनहानि रोकने के लिए मुग़लों के साथ पुरंदर की संधि की, जिसमें उन्हें अपने 23 किले और काफ़ी बड़ा इलाका सौंपना पड़ा। अब उनके पास केवल 12 दूर्ग ही बचे थे।
बाद में, महाराजा जयसिंह द्वारा सुरक्षा का आश्वासन दिए जाने पर छत्रपति शिवाजी आगरा गए। वहाँ औरंगज़ेब द्वारा उन्हें बंदी बना लिया गया। उस घोर संकट में भी असीम धैर्य और कूटनीति का परिचय देते हुए, 17 अगस्त 1666 को वे अपने 9 वर्षीय पुत्र संभाजी के साथ आगरा की कैद से सफलतापूर्वक निकल गए और 40 दिन की यात्रा कर सुरक्षित राजगढ़ पहुँच गए।
1670 में, छत्रपति शिवाजी की सेना ने मुगलों को सौंपे गए किलों को वापस जीतना शुरू किया। 4 फ़रवरी 1670 को वीर तानाजी मालसुरे द्वारा अपने प्राणों का बलिदान देकर कोंडाणा (सिंहगढ़) दुर्ग को वापस जीतने की घटना भारतीय इतिहास में सदैव के लिए अमर हो गई।
राज्यारोहण और कुशल प्रशासनिक व्यवस्था
6 जून 1674 को राजगढ़ में छत्रपति शिवाजी द्वारा भव्य समारोह के साथ अपना राज्यारोहण संपन्न करना और 'छत्रपति' की उपाधि धारण करना भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना है। अनेक सदियों से भारत में किसी नए स्वतंत्र हिन्दू राजवंश के राजा का सिंहासनारोहण नहीं हुआ था। बनारस के प्रसिद्ध विद्वान पंडित गागाभट्ट ने शास्त्रों का गहन अध्ययन कर इस हेतु वैदिक पद्धति की जानकारी प्राप्त की और राज्याभिषेक संपन्न कराया। छत्रपति शिवाजी के सिहांसनारोहण से देश भर के हिन्दुओं में नई आशा और ऊर्जा का संचार हुआ।
छत्रपति शिवाजी केवल एक महान सेनानायक ही नहीं थे, बल्कि एक अत्यंत कुशल प्रशासक भी थे। उन्होंने प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए 'अष्टप्रधान' (आठ मंत्रियों की परिषद) का गठन किया। इसमें पेशवा (प्रधानमंत्री), अमात्य (वित्त मंत्री), और सेनापति जैसे पद शामिल थे। उन्होंने रैय्यतवाड़ी व्यवस्था लागू की, जिसमें किसानों से सीधे संपर्क स्थापित किया गया और बिचौलियों या जमींदारों के शोषण को समाप्त कर दिया गया।
गनिमी कावा (छापामार युद्ध)
छत्रपति शिवाजी की सैन्य सफलताओं का एक बड़ा कारण उनकी 'गनिमी कावा' (छापामार या गोरिल्ला युद्ध) की नीति थी। उन्होंने सह्याद्रि की भौगोलिक स्थिति का अद्भुत उपयोग किया। उनकी सेना में तीव्र गति, अचानक हमला करने की क्षमता और तुरंत सुरक्षित स्थानों पर लौट जाने का कौशल था, जिसने मुगलों की विशाल और भारी-भरकम सेनाओं को हमेशा पंगु बनाए रखा।
इसके साथ ही, उनके राज्य में महिलाओं का अत्यंत सम्मान किया जाता था। युद्ध के दौरान भी किसी भी शत्रु पक्ष की महिला या धार्मिक स्थल का अपमान करने पर कठोर दंड का प्रावधान था। उनकी सेना में योग्यता के आधार पर सभी वर्गों और धर्मों के लोगों को शामिल किया जाता था, जो उनके धर्मनिरपेक्ष और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।
भारतीय नौसेना के जनक
छत्रपति शिवाजी की सामरिक दूरदृष्टि का सबसे बड़ा प्रमाण उनके द्वारा एक शक्तिशाली नौसेना का गठन था। इसका प्रारम्भ 1654 में कल्याण के समीप एक संकरी खाड़ी में कुछ जलयानों के निर्माण से हुआ। 1665 में उन्होंने स्वयं के नेतृत्व में 3000 की जलसेना के बल पर उडुपी के पास बसरूर में पुर्तग़ाली सेना को पराजित कर बंदरगाह को मुक्त करवाया।
1679 में जब छत्रपति शिवाजी ने मुंबई के पास खाण्डेरी द्वीप पर एक दुर्ग बनाना प्रारम्भ किया, तो अंग्रेजों ने इसे रोकने के लिए आक्रमण किया। इस पर मराठा जलसेना ने लेफ्टिनेंट फ्रांसिस थॉर की अंग्रेजी सेना को बुरी तरह पराजित किया। उस समय मराठों की जल सेना में 5000 के लगभग कुशल सैनिक और 57 उन्नत युद्ध पोत थे। भारत के मध्यकालीन इतिहास में वे पहले स्थानीय शासक थे जिन्होंने समुद्र के सामरिक महत्व को समझा। महान इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार लिखते हैं: "एक जन्मजात दूरदर्शी राजनेता के रूप में शिवाजी की प्रतिभा को कोई अन्य बात इतना अधिक स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं करती, जितनी उनके द्वारा नौसेना और नौसैनिक अड्डों का निर्माण।"
जज़िया कर का विरोध और शुद्धि आंदोलन
छत्रपति शिवाजी ने 1679 में औरंगज़ेब द्वारा लगाए गए घृणित 'जज़िया कर' की कठोर भर्त्सना करते हुए एक ऐतिहासिक पत्र लिखा। उनके चिटनिस लीला प्रभु द्वारा फ़ारसी में लिखा गया यह पत्र कूटनीतिक भाषा का एक उत्कृष्ट नमूना है। उन्होंने इस कर को अन्यायपूर्ण, आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी और पूर्ववर्ती शासकों की समावेशी नीति का उल्लंघन करने वाला बताया।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने शुद्धि-आंदोलन के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने सेनापति नेताजी पालकर, जिन्हें मुग़ल सेना द्वारा बलपूर्वक मुसलमान बना लिया गया था, उन्हें वापस हिन्दू धर्म में स्वीकार कर पुनः सेना में उच्च पद पर नियुक्त किया। इसी तरह जबरन मतांतरित किये गए बाजाजी निम्बालकर की घर-वापसी करवाकर उनके पुत्र से अपनी पुत्री का विवाह किया, जो उस कालखंड में एक बहुत बड़ा सामाजिक सुधार था।
निष्कर्ष
हिन्दू पद पादशाही के लिए छत्रपति शिवाजी का यह अनवरत संघर्ष हमारे इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। अनेक उतार-चढ़ाव के पश्चात उनकी सफ़लता का रहस्य उनका पारदर्शी और बेदाग चरित्र, बड़े से बड़े खतरे से खेलने का अदम्य साहस, स्वराज्य निर्माण के लिए उत्कट अभिलाषा और उस अभिलाषा से अपने सैनिकों एवं जनसामान्य को प्रेरित कर पाना था।
आज देश की सीमाओं के बाहर भी उनके शौर्य और महानता की कहानी पहुँच रही है। 8 मार्च 2025 को हिन्द-जापान स्वराज रथ यात्रा के पश्चात्, टोक्यो के एडोगवा में घोड़े पर आसीन छत्रपति शिवाजी की 10 फीट ऊँची भव्य प्रतिमा का अनावरण हुआ। इसके एक वर्ष पूरा होने पर 8 मार्च 2026 को वहाँ एक भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। महान गायिका लता मंगेशकर द्वारा गाया गया और पंडित ह्रदयनाथ मंगेशकर द्वारा मराठी में लिखा गया सुन्दर गीत "हे हिन्दू नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा" आज भी उन लोगों को भाव-विभोर कर देता है जो मराठी भाषा नहीं जानते, क्योंकि छत्रपति शिवाजी का शौर्य किसी भाषा या प्रांत की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है।
लेख
डॉ. महावीर प्रसाद जैन