जब अखबारों की सुर्खियाँ सरकार तय करने लगी

इमरजेंसी के दौरान सरकार ने समाचार, संपादकीय और कार्टून तक पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता लगभग कुचल दी गई।

The Narrative World    28-Jun-2026
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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्तियों में यदि किसी एक संस्था का नाम लिया जाए, तो वह है स्वतंत्र प्रेस। लोकतंत्र में संसद सरकार को जवाबदेह बनाती है, न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है और मीडिया जनता को सूचना देकर सत्ता पर निगरानी रखता है। इसी कारण मीडिया को लोकतंत्र का "चौथा स्तंभ" कहा जाता है। लेकिन 25 जून 1975 की रात के बाद सबसे पहला और सबसे संगठित हमला इसी स्तंभ पर हुआ।
 
जिन अखबारों का दायित्व जनता तक सूचना पहुँचाना था, वे स्वयं सरकारी नियंत्रण के शिकार बन गए। दिल्ली, चंडीगढ़ और जालंधर जैसे प्रमुख प्रकाशन केंद्रों में अनेक समाचार पत्र उस दिन प्रकाशित ही नहीं हो सके, क्योंकि रातोंरात उनके प्रेसों की बिजली काट दी गई थी।
 
चंडीगढ़ में द ट्रिब्यून की प्रिंटिंग प्रेस को पुलिस ने चलती मशीनों के बीच रुकवा दिया। दिल्ली से प्रकाशित मदरलैंड के कार्यालय को सील कर दिया गया और उसके संपादक के. आर. मलकानी को गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समाचार पत्रों ने दोपहर अथवा शाम को विशेष संस्करण प्रकाशित करने का प्रयास किया, किंतु अनेक स्थानों पर उन्हें भी जब्त कर लिया गया। देखते ही देखते भारत का समाचार जगत स्वतंत्र पत्रकारिता से सरकारी निगरानी वाले सूचना तंत्र में बदलने लगा।
 
इसके साथ ही पूरे देश में पूर्व-सेंसरशिप लागू कर दी गई। अब कोई भी समाचार, संपादकीय, कार्टून, लेख या टिप्पणी सरकारी सेंसर की स्वीकृति के बिना प्रकाशित नहीं की जा सकती थी।
 
समाचार कक्षों में संपादकों के निर्णय से अधिक महत्व उन सरकारी अधिकारियों का हो गया, जो यह तय करते थे कि जनता क्या पढ़ सकती है और क्या नहीं। संविधान सभा की बहसों में डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अनेक सदस्यों ने जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला माना था, वह पहली बार प्रत्यक्ष रूप से कार्यपालिका के नियंत्रण में चली गई।
 
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इमरजेंसी लागू होने के कुछ ही दिनों बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस पूरी व्यवस्था का केंद्रीय औजार बना दिया गया।
 
 
28 जून 1975 को विद्याचरण शुक्ल को सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया। उनके कार्यकाल में सेंसरशिप और सरकारी नियंत्रण को अभूतपूर्व कठोरता से लागू किया गया। समाचार पत्रों के संपादकीय निर्णयों से लेकर शीर्षकों और रिपोर्टों तक पर सरकारी निगरानी स्थापित हो गई। आलोचनात्मक लेखन को व्यवस्थित रूप से हतोत्साहित किया गया और सरकारी दृष्टिकोण को ही प्रमुख समाचार के रूप में प्रस्तुत करने का दबाव बढ़ता गया।
 
इस दौरान अनेक पत्रकारों और संपादकों को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) सहित विभिन्न कानूनों के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर को हिरासत में लिया गया। राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े अनेक प्रकाशनों पर विशेष दबाव डाला गया। लखनऊ से प्रकाशित पाञ्चजन्य का प्रकाशन रोक दिया गया, जबकि नागपुर के तरुण भारत के संपादकीय और प्रबंधन से जुड़े अनेक पदाधिकारी जेलों में थे। इस दौर में वैचारिक विविधता को सीमित करना भी सरकारी रणनीति का हिस्सा माना गया।
 
 
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दूसरी ओर, कुछ समाचार पत्रों ने इंदिरा गांधी द्वारा निर्धारित दायरे में रहते हुए भी प्रतिरोध का प्रयास किया। Indian Express और The Statesman जैसे संस्थानों ने कई अवसरों पर प्रतीकात्मक ढंग से सेंसरशिप के विरोध का संकेत दिया। कभी संपादकीय स्थान खाली छोड़कर, तो कभी कानूनी सीमाओं के भीतर रहकर स्वतंत्र संपादकीय दृष्टिकोण बनाए रखने का प्रयास किया गया।
 
वहीं दूसरी ओर, कुछ प्रभावशाली मीडिया संस्थानों ने सत्ता से टकराव के बजाय उसके साथ चलना अधिक सुरक्षित समझा। इस द्वंद्व ने भारतीय पत्रकारिता के चरित्र पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा किया।
 
 
इसी संदर्भ में आपातकाल के बाद की एक टिप्पणी भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का स्थायी हिस्सा बन गई। तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने मीडिया के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कहा था, "When asked to bend, they crawled." अर्थात, "जब उनसे केवल झुकने के लिए कहा गया, तब वे रेंगने लगे।" यह टिप्पणी केवल पत्रकारों की आलोचना नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता की ओर संकेत थी, जिसमें सत्ता के दबाव के सामने संस्थागत प्रतिरोध अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दिया।
 
हालांकि, इस कथन का अर्थ यह नहीं है कि पूरा मीडिया आत्मसमर्पण कर चुका था। यदि ऐसा होता, तो इमरजेंसी के दौरान भूमिगत साहित्य, वैकल्पिक प्रकाशन और विदेशी मीडिया के माध्यम से अनेक सूचनाएँ जनता तक पहुँच ही नहीं पातीं। वास्तविकता अधिक जटिल थी। भारतीय मीडिया का एक वर्ग सत्ता के दबाव में झुक गया, जबकि दूसरा वर्ग सीमित संसाधनों और बड़े जोखिम के बावजूद प्रतिरोध करता रहा। इतिहास इसी द्वंद्व को दर्ज करता है।
 
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केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय