मद्रास हाई कोर्ट ने वक्फ संपत्तियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी जमीन पर दरगाह या कब्र का होना मात्र इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह वक्फ संपत्ति है। न्यायालय ने कहा कि वक्फ बोर्ड को किसी संपत्ति पर अधिकार जताने से पहले यह साबित करना होगा कि वह भूमि विधि सम्मत तरीके से वक्फ घोषित की गई है। इसी आधार पर कोर्ट ने चेन्नई के त्रिप्लिकेन स्थित 240 वर्ष पुरानी दरगाह से जुड़े तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के फैसले को रद्द कर दिया।
मद्रास हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति के. गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सरकार सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
मामला चेन्नई के त्रिप्लिकेन स्थित लगभग 240 वर्ष पुरानी दरगाह से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का दावा था कि उनका परिवार पिछले लगभग 40 वर्षों से इस दरगाह की देखरेख करता आ रहा है और जिस भूमि पर दरगाह स्थित है, वह वक्फ बोर्ड की नहीं बल्कि लोक निर्माण विभाग की है।
विवाद तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने इस दरगाह के लिए एक नए मुतवल्ली (प्रबंधक) की नियुक्ति की और दरगाह को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने की प्रक्रिया शुरू की।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वक्फ अधिनियम के तहत किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, सर्वेक्षण और अधिसूचना आवश्यक है। बिना इन प्रक्रियाओं का पालन किए वक्फ बोर्ड न तो किसी संपत्ति को वक्फ घोषित कर सकता है और न ही उसके लिए मुतवल्ली नियुक्त कर सकता है।
वहीं, तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अदालत में कहा कि दरगाह और उसके आसपास की भूमि ऐतिहासिक रूप से वक्फ संपत्ति रही है और बाद में यह लोक निर्माण विभाग के नियंत्रण में चली गई।
दूसरी ओर, लोक निर्माण विभाग ने अदालत को बताया कि संबंधित भूमि “सरकारी भूमि” है और इसे बिना किराए के भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को उपयोग के लिए दिया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि दरगाह से जुड़े कुछ लोगों ने विभाग की सहमति के बिना भूमि के पंजीकरण का प्रयास किया।
कोर्ट की अहम टिप्पणियां
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं - केवल किसी स्थान पर दरगाह या कब्र होने से वह स्वतः वक्फ संपत्ति नहीं बन जाती। वक्फ बोर्ड को यह साबित करना होगा कि संपत्ति को मुस्लिम कानून के अनुसार स्थायी रूप से धार्मिक, परोपकारी या पुण्य कार्यों के लिए समर्पित किया गया था।
वक्फ संपत्ति घोषित करने से पहले विधि के अनुसार सर्वेक्षण और अधिसूचना अनिवार्य है। यदि किसी दरगाह का सर्वे, पंजीकरण और वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड उस पर स्वतः अधिकार नहीं जता सकता।
किसी मुतवल्ली की नियुक्ति तभी की जा सकती है, जब पहले यह स्थापित हो जाए कि संबंधित संपत्ति वास्तव में वक्फ संपत्ति है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रत्येक कब्र या दरगाह को वक्फ संपत्ति मान लेना कानून की मंशा के विपरीत होगा। न्यायालय को निजी पारिवारिक कब्रों, धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्यों के लिए समर्पित वक्फ संपत्तियों के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा।
वक्फ बोर्ड का प्रस्ताव खारिज
मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड द्वारा की गई मुतवल्ली नियुक्ति और उससे जुड़े आदेशों को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने कहा कि जब तक संपत्ति का वक्फ दर्जा विधिक रूप से स्थापित नहीं हो जाता, तब तक वक्फ बोर्ड उस पर प्रशासनिक नियंत्रण नहीं कर सकता।
अदालत ने पाया कि तमिलनाडु वक्फ बोर्ड संबंधित भूमि के वक्फ होने का आवश्यक कानूनी आधार और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहा। इसलिए न्यायालय ने वक्फ बोर्ड द्वारा की गई मुतवल्ली नियुक्ति और उससे संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया।
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक उपयोग या किसी दरगाह की मौजूदगी मात्र से कोई भूमि स्वतः वक्फ संपत्ति नहीं बन जाती।
वक्फ बोर्ड को कानून में निर्धारित प्रक्रिया, दस्तावेजी साक्ष्य, सर्वेक्षण और वैध अधिसूचना के आधार पर ही अपना दावा स्थापित करना होगा। इस फैसले ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि किसी संपत्ति पर प्रशासनिक अधिकार जताने से पहले उसका कानूनी वक्फ दर्जा साबित करना अनिवार्य है।
लेख
मोक्षी जैन
उप-संपादक, द नैरेटिव