पश्चिम एशिया संकट के बीच भी भारत ने संभाली अर्थव्यवस्था

कैसे राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेताओं की आर्थिक संकट की आशंकाओं के विपरीत सरकारी नीतियों और तैयारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा?

The Narrative World    01-Jul-2026   
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पश्चिम एशिया संकट के दौरान कांग्रेस नेताओं और उनके समर्थक विश्लेषकों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़े संकट की आशंका जताई, लेकिन सरकार की तैयारी, कूटनीति और नीतियों ने देश को आर्थिक झटके से बचाए रखा।
 
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के साथ ही कांग्रेस और उसके समर्थक लगातार दावा करते रहे कि भारत जल्द ही गंभीर आर्थिक संकट की चपेट में आ जाएगा। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने 3 जून को एक कार्यक्रम में कहा था कि देश पर आर्थिक सुनामी आने वाली है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संकट पूरी अर्थव्यवस्था को पंगु बना देगा और केंद्र सरकार इसे रोकने में सक्षम नहीं है।
 
 
राहुल गांधी से पहले पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन ने भी आर्थिक संकट की आशंका जताई थी। पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने उनका वीडियो साझा करते हुए इस चेतावनी को प्रमुखता दी। हालांकि, पिछले कई वर्षों की तरह इस बार भी उनकी आशंकाएं वास्तविकता में नहीं बदलीं।
 
 
मार्च में कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी दावा किया था कि भारत के 69 प्रतिशत एलएनजी आयात होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं। उन्होंने आशंका जताई कि यदि यह मार्ग प्रभावित हुआ तो देश को भारी संकट का सामना करना पड़ेगा। इसी दौरान राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे अवध ओझा ने भी आर्थिक संकट को लेकर बेहद डरावनी तस्वीर पेश की। उन्होंने यहां तक कहा कि हालात इतने खराब होंगे कि लोग एक-दूसरे की हत्या करने लगेंगे और वह खुद चीन चले जाएंगे।
 
हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति प्रभावित होने के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाकृत मजबूती दिखाई। ईंधन और रसोई गैस की कीमतों में कुछ समय के लिए बढ़ोतरी जरूर हुई और आपूर्ति शृंखला पर भी दबाव पड़ा, लेकिन देश में न तो महंगाई बेकाबू हुई और न ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार थमी। चालू खाते का घाटा नियंत्रित रहा और विदेशी मुद्रा भंडार ने भी मजबूत सुरक्षा कवच का काम किया।
 
भारत की इस सफलता के पीछे केवल परिस्थितियों का साथ नहीं था, बल्कि वर्षों से बनाई गई रणनीति भी थी। सरकार ने वैश्विक अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक आयात और कूटनीतिक संबंधों पर लगातार काम किया। यही तैयारी संकट के समय काम आई।
 
साल 2022 के बाद रूस भारत के लिए कच्चे तेल का बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका था। अमेरिका की ओर से मिले अस्थायी प्रतिबंध राहत का लाभ उठाकर भारत ने रूस से तेल खरीद बढ़ाई। इसके साथ ही अमेरिका और अफ्रीकी देशों से भी अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित की। इस कदम ने खाड़ी क्षेत्र से आने वाली आपूर्ति में आई कमी का बड़ा हिस्सा पूरा कर दिया।
 
रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित होने लगी तो सरकार ने तेजी से कई फैसले लिए। घरेलू रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए। पाइप्ड नेचुरल गैस कनेक्शन का विस्तार तेज किया गया। एथेनॉल मिश्रण को भी बढ़ावा मिला। दूसरी ओर भारत ने ईरान के साथ वर्षों से बने कूटनीतिक संबंधों का लाभ उठाया। युद्ध जैसे हालात के बावजूद भारत के लिए एलपीजी लेकर आने वाले टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य पार करते रहे। आगे चलकर भारतीय नौसेना ने ओमान की खाड़ी में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की।
 
सरकार ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका, अंगोला और नाइजीरिया जैसे देशों से भी एलपीजी खरीद बढ़ाई। पहले से किए गए दीर्घकालिक समझौतों का भी लाभ मिला। घरेलू उत्पादन बढ़ाने और गैस वितरण व्यवस्था मजबूत करने से आपूर्ति में कोई बड़ा संकट नहीं आया।
 
 
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंथा नागेश्वरन ने अपने लेख स्टेडी एंड स्टेबल ऐज शी गोज: इंडिया एंड द इकोनॉमिक फॉलआउट ऑफ द गल्फ कॉन्फ्लिक्ट में विस्तार से बताया कि भारत ने किस तरह संकट का सामना किया। उन्होंने लिखा कि तेल आयात के स्रोतों में विविधता, घरेलू एलपीजी उत्पादन, पाइप्ड गैस नेटवर्क का विस्तार, कोयला गैसीकरण, एथेनॉल मिश्रण और रणनीतिक कच्चे तेल भंडारण जैसे कदमों ने अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात यात्रा के दौरान हुए ऊर्जा सहयोग को भी महत्वपूर्ण बताया।
 
 
नागेश्वरन के अनुसार इन प्रयासों का असर आर्थिक आंकड़ों में भी दिखाई दिया। कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 6.8 प्रतिशत कर दिया गया। वित्त वर्ष 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान बरकरार रहा। चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.6 प्रतिशत पर सीमित रहा। वहीं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भी उल्लेखनीय स्थिरता बनी रही। उनके अनुसार मजबूत नीतियां और सक्रिय कूटनीति ने यह परिणाम संभव बनाया।
 
यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत भविष्य में कभी आर्थिक चुनौतियों का सामना नहीं करेगा। दुनिया लगातार बदल रही है और भू-राजनीतिक तनाव भी बने रहेंगे। ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी बदलाव और वैश्विक अस्थिरता आगे भी भारत के सामने चुनौती पेश करेंगे। लेकिन हाल के वर्षों का अनुभव बताता है कि भारत ने कठिन परिस्थितियों से निकलने की क्षमता विकसित की है।
 
 
कोरोना महामारी के दौरान भी कई लोगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लंबे समय तक कमजोर रहने की भविष्यवाणी की थी। उस समय भी भारत ने धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियां पटरी पर लाकर विकास की रफ्तार वापस हासिल की। पश्चिम एशिया संकट के दौरान भी वही क्षमता फिर दिखाई दी।
 
कांग्रेस और उसके समर्थक लगातार आर्थिक तबाही की तस्वीर पेश करते रहे, लेकिन वास्तविक आंकड़ों और घटनाक्रम ने उन दावों की पुष्टि नहीं की। पिछले एक दशक में भारत ने कई वैश्विक संकटों के बीच भी विकास की गति बनाए रखी है। निर्णायक नीतियों, व्यावहारिक कूटनीति और लोगों की अनुकूलन क्षमता ने देश को लगातार मजबूती दी है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया संकट के दौरान भी भारत ने केवल चुनौती का सामना नहीं किया, बल्कि मजबूत आर्थिक आधार के साथ आगे बढ़ने का संकेत भी दिया।