भारत में नक्सलवाद के खिलाफ लंबे अभियान ने जंगलों में सशस्त्र माओवादी नेटवर्क को खत्म कर दिया, लेकिन नक्सल विचारधारा शहरों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न मंचों के जरिए नए रूप में सक्रिय रहने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां अब केवल हथियारबंद नक्सलियों पर नहीं, बल्कि उनके वैचारिक और शहरी नेटवर्क पर भी नजर रख रही हैं।
नक्सलवाद ने दशकों तक भारत की आंतरिक सुरक्षा को सबसे बड़ी चुनौती दी। इस हिंसक आंदोलन का घोषित उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के जरिए वर्गविहीन समाज स्थापित करना था। इसके लिए नक्सली संगठनों ने देश के सबसे खनिज संपन्न राज्यों में अपना प्रभाव बढ़ाया और तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक तथाकथित रेड कॉरिडोर बनाने का सपना देखा।
वर्ष 2013 तक नक्सली गतिविधियां 182 जिलों तक फैल चुकी थीं। आपको बता दें कि नक्सली हिंसा में 2,726 से अधिक सुरक्षाकर्मी और 4,100 से ज्यादा आम नागरिक अपनी जान गंवा बैठे। तुलना करें तो 1999 के कारगिल युद्ध में भारत ने 527 वीर जवानों को खोया था। इन आंकड़ों से नक्सलवाद की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों के संयुक्त अभियानों ने नक्सल नेटवर्क को गहरी चोट पहुंचाई। सुरक्षा बलों ने लगातार ऑपरेशन चलाए और कई बड़े माओवादी नेताओं को ढेर किया। जब अभियान निर्णायक मोड़ पर पहुंचा तो नक्सली संगठनों ने संघर्ष जारी रखने के बजाय युद्धविराम की मांग उठाई। इससे साफ हुआ कि सुरक्षा बलों के दबाव ने उनके संगठनात्मक ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया।
हालांकि सशस्त्र माओवाद खत्म हुआ, लेकिन उसकी विचारधारा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। इसी संदर्भ में "अर्बन नक्सल" शब्द चर्चा में आया। इसका इस्तेमाल उन लोगों और नेटवर्क के लिए किया जाता है, जिन पर आरोप लगता है कि वे शहरों में रहकर नक्सली विचारधारा को वैचारिक समर्थन देते हैं, उसके पक्ष में माहौल बनाते हैं या विभिन्न अभियानों के जरिए उसे वैध ठहराने की कोशिश करते हैं।
हाल के समय में दिल्ली में प्रदूषण के मुद्दे की आड़ में हुए कुछ विरोध प्रदर्शनों ने इसी बहस को फिर हवा दी। इन प्रदर्शनों में मारे गए नक्सली कमांडर मडवी हिडमा के समर्थन में बैनर और नारे लगाए गए। इन गतिविधियों का नेतृत्व वामपंथी छात्र समूहों जैसे भगत सिंह छात्र एकता मंच और द हिमखंड ने किया। ये संगठन "कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन" नामक सामूहिक मंच से भी जुड़े रहे हैं। ऐसे मंच सामाजिक या पर्यावरणीय मुद्दों के साथ नक्सली विमर्श को जोड़ने की कोशिश करते हैं।
इसी तरह कुछ विश्वविद्यालयों में भी समय-समय पर ऐसे विवाद सामने आए, जहां भारत विरोधी या अलगाववादी नारों ने राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया। वर्षों से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में सक्रिय कुछ छात्र संगठनों पर भी कट्टर वामपंथी विचारों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि हर छात्र या हर संगठन को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा, लेकिन यह भी सच है कि कुछ घटनाओं ने इन परिसरों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दरअसल, अर्बन नक्सल नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत हथियार नहीं बल्कि विचारों के जरिए प्रभाव बनाना मानी जाती है। यह नेटवर्क अलग-अलग मंचों, अभियानों और वैचारिक समूहों के माध्यम से नक्सली एजेंडे को नए रूप में पेश करने की कोशिश करता है। यही कारण है कि सुरक्षा एजेंसियां अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि शहरों में सक्रिय ऐसे नेटवर्क पर भी निगरानी रख रही हैं।
भारत ने लंबे संघर्ष के बाद जंगलों में फैले नक्सली आतंक पर बड़ी हद तक नियंत्रण हासिल किया है। कभी गढ़चिरौली, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे इलाकों का नाम सुनकर लोग डर जाते थे। बारूदी सुरंगों, घात लगाकर किए गए हमलों और निर्दोष लोगों की हत्याओं ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया। आज इन क्षेत्रों में सुरक्षा की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है और विकास कार्यों ने भी रफ्तार पकड़ी है।
फिर भी चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई। यदि सशस्त्र नक्सलवाद का अंत हुआ है तो उसके वैचारिक स्वरूप पर भी उतनी ही गंभीरता से नजर रखने की जरूरत है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन हिंसक विचारधारा को किसी भी रूप में वैधता देने की कोशिश राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।