धर्म किसी भी व्यक्ति की आस्था, परंपरा और पहचान का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है। इसलिए किसी भी इंसान को अपनी इच्छा से धर्म मानने या बदलने का अधिकार जरूर मिलता है, लेकिन जब कोई संगठन, समूह या व्यक्ति आर्थिक सहायता, चमत्कार के दावे, डर या किसी अन्य लालच के सहारे लोगों का विश्वास बदलने की कोशिश करता है, तब मामला केवल धार्मिक नहीं रह जाता। यह कानून और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सामने आए दो अ-ग अलग मामलों ने एक बार फिर इसी चिंता को सामने ला दिया है।
मुजफ्फरनगर पुलिस ने जड़ौदा गांव में छापेमारी कर 12 लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें पांच महिलाएं और सात पुरुष शामिल हैं। जांच के दौरान पुलिस ने
दावा किया कि वहां मौजूद लोग हिंदुओं को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। इसके लिए वे आर्थिक मदद का आश्वासन दे रहे थे और प्रार्थना के जरिए चमत्कारिक इलाज का दावा भी कर रहे थे।
पुलिस के अनुसार आरोपियों ने लोगों से कहा कि यदि वे यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करेंगे तो उनके बच्चों की शादी के लिए आर्थिक सहायता मिलेगी। साथ ही प्रार्थना से गंभीर बीमारियां भी ठीक हो जाएंगी। जांच के दौरान पुलिस ने मौके से तीन डायरी, तीन धार्मिक पुस्तकें और छह मोबाइल फोन बरामद किए। पुलिस को मिले साहित्य से कथित रूप से नॉर्थ इंडिया की असेंबलीज ऑफ गॉड चर्च से जुड़े होने के संकेत भी मिले हैं। फिलहाल पुलिस पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।
इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 के तहत 14 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। इनमें से 12 आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं, जबकि राशिद और मोनिस नाम के दो आरोपी फरार हैं। पुलिस का कहना है कि दोनों ने इस कार्यक्रम के लिए स्थान उपलब्ध कराया था। उनकी तलाश लगातार जारी है।
इसी जिले में एक और मामला भी सामने आया। पुलिस ने फूलत गांव स्थित मदरसा दारुल उलूम रहीमा के प्रभारी मौलाना हिफजुर्रहमान और उनके बेटे जुबैर अंसारी के खिलाफ भी मामला दर्ज किया। पुलिस का आरोप है कि दोनों हिंदुओं को इस्लाम स्वीकार करने के लिए प्रभावित कर रहे थे। फिलहाल दोनों आरोपी फरार हैं और पुलिस उनकी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है।
इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्मांतरण का सवाल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यदि कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी दूसरे धर्म के लोगों को लालच, दबाव, झूठे दावों या गलत जानकारी के आधार पर धर्म बदलने के लिए प्रेरित करती है, तो वह कानून के दायरे में आएगी। इसी उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2021 में गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम लागू किया। यह कानून बल, छल, अनुचित प्रभाव, प्रलोभन और धोखाधड़ी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाता है।
भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। साथ ही संविधान यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी नागरिक की स्वतंत्र इच्छा पर कोई बाहरी दबाव न पड़े। इसलिए स्वेच्छा से लिया गया धार्मिक निर्णय और लालच या भय के कारण कराया गया धर्म परिवर्तन, दोनों स्थितियां पूरी तरह अलग हैं। कानून भी इसी अंतर को आधार बनाकर कार्रवाई करता है।
मुजफ्फरनगर की ये घटनाएं केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं। वे समाज को भी यह संदेश देती हैं कि आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा, जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से निर्णय ले। आर्थिक सहायता, चमत्कार का प्रलोभन या किसी तरह का दबाव किसी की धार्मिक पहचान बदलने का माध्यम नहीं बन सकता। ऐसे मामलों में कानून की सख्ती और समाज की जागरूकता, दोनों समान रूप से जरूरी हैं। तभी धार्मिक स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ भी सुरक्षित रहेगा और किसी की मजबूरी या कमजोरी का फायदा उठाकर उसके विश्वास से खिलवाड़ करने की कोशिशों पर प्रभावी रोक लग सकेगी।