केरल की बेटी की ट्रेजेडी: 'केरल स्टोरी' को प्रोपगेंडा कहने वाले वामपंथी चुप क्यों?

केरल की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) का रिकॉर्ड इस मामले में सवाल उठाता है। वे "सांप्रदायिकता" के खिलाफ बोलने की बात करते हैं, लेकिन जब हिंदू समुदाय की बेटियां प्रभावित होती हैं तो आंखें मूंद लेते हैं।

The Narrative World    11-Jul-2026   
Total Views |

Representative Image

उज्बेकिस्तान के बुखारा स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में 3 जुलाई 2026 की रात एक 22 वर्षीय मलयाली मेडिकल छात्रा सावरीया बसंत की हत्या की घटना सामने आई है। साथ में ही पढ़ने वाले मुस्लिम मित्र सदरुल अनाम ने लैपटॉप से उसके सिर पर इतनी बेरहमी से वार किए कि ब्रेन हेमरेज हो गया। इसके बाद अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया।


सावरीया का शव दिल्ली होते हुए केरल पहुंचा, जहां परिवार ने दोबारा पोस्टमॉर्टम करवाया। परिवार का आरोप है कि मुस्लिम मित्र सदरुल अनाम लंबे समय से उनकी बेटी को इस्लाम में कन्वर्ट करने का दबाव डाल रहा था। उसने मना किया तो क्रूर यातना दी गई। लड़की का पूरा शरीर चोटों से भरा था।


Representative Image

वास्तव में यह घटना केरल की राजनीति के लिए आईना है। वर्ष 2023 में जब फिल्म 'द केरल स्टोरी' रिलीज हुई थी, तब केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने इसे 'प्रोपगैंडा' करार दिया था। उन्होंने कहा था कि यह फिल्म केरल की सांप्रदायिक सद्भावना को नुकसान पहुंचाने और संघ परिवार की 'झूठ की फैक्ट्री' का उत्पाद है।


आज जब उनकी ही राज्य की एक बेटी विदेश में कन्वर्ज़न के दबाव में जान गंवा चुकी है, तब न तो पूर्व सीएम और न ही वर्तमान कांग्रेस सरकार से कोई सख्त बयान आया है। आख़िर ये चुप्पी क्यों? क्या मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति एक युवती की जान से भी बड़ी हो गई है?


घटना की पूरी कहानी


सावरीया बसंत अलप्पुझा के हरिपाद की रहने वाली थीं। दिसंबर 2025 में MBBS की पढ़ाई के लिए उज्बेकिस्तान गईं। वहीं सदरुल अनाम मलप्पुरम का रहने वाला है। दोनों पहले वर्ष के छात्र थे। शुरुआती रिपोर्ट में इसे 'आपसी झगड़ा' बताया गया, जिसमें मुस्लिम मित्र सदरुल ने गुस्से में लैपटॉप से बसंत के सिर पर वार कर दिया। जिसके बाद उज्बेक पुलिस ने तुरंत उसे गिरफ्तार कर लिया।


Representative Image

लेकिन सावरीया के परिवार ने दावा किया कि बसंत को लगी चोटें सिर्फ सिर तक सीमित नहीं थीं। शरीर पर कई जगहों पर मारपीट के निशान थे। परिवार के सदस्यों ने बताया कि सदरुल पहले भी बसंत पर इस्लाम में कन्वर्ज़न का दबाव डालता था। बसंत के सहपाठियों ने भी परिवार को यह जानकारी दी।


'केरल स्टोरी' का भविष्यवाणी जैसा सच


फिल्म 'द केरल स्टोरी' ने केरल में लव जिहाद और जबरन कन्वर्ज़न की कहानियों को स्क्रीन पर लाया था। पिनरायी विजयन ने इसे 'सांप्रदायिक ध्रुवीकरण' का हथियार बताया। उन्होंने ट्वीट और बयानों में कहा कि केरल सद्भाव का प्रतीक है, ऐसे फिल्में राज्य की छवि खराब करती हैं।

लेकिन आंकड़े और घटनाएं कुछ और ही कहानी बयां करती हैं। केरल में पिछले कई वर्षों से हिंदू और ईसाई लड़कियों पर कन्वर्ज़न का दबाव, लव जिहाद के मामले दर्ज होते रहे हैं। यूएपीए के तहत कई गिरफ्तारियां भी हुईं। फिर भी वामपंथी दलों ने इन्हें 'प्रोपगैंडा' करार दिया था।



Representative Image

सावरीया का केस भी कुछ इसी तरह का है। एक मलयाली लड़की, जो डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी, अपने ही सहपाठी के हाथों मारी गई।


वामपंथी सरकारें लंबे समय से मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखने के लिए ऐसे मुद्दों पर चुप रहती आई हैं। मलप्पुरम जैसे जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव, मंदिरों पर हमले, और मजहबी कट्टरता के मामले अक्सर दबाए जाते रहे। पिनरायी विजयन का शासन काल इन मुद्दों पर 'सेकुलरिज्म' के नाम पर चुप्पी का था।


वामपंथ की राजनीति का दोहरा चेहरा


केरल की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) का रिकॉर्ड इस मामले में सवाल उठाता है। वे 'सांप्रदायिकता' के खिलाफ बोलने की बात करते हैं, लेकिन जब हिंदू समुदाय की बेटियां प्रभावित होती हैं तो आंखें मूंद लेते हैं। वर्तमान कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री भी मौन हैं। क्या दोनों ही पार्टियां मुस्लिम वोट के लिए हिंदू-ईसाई परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज कर रही हैं?


Representative Image

केरल में हिंदू आबादी घट रही है। कई रिपोर्ट्स में मलप्पुरम और अन्य जिलों में धार्मिक असंतुलन की बात कही गई है। 'लव जिहाद' पर सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स ने भी चिंता जताई है। फिर भी CPI(M) इसे 'मिथ्या' कहती है। सावरीया का परिवार अब न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। उनके वकील ने कहा है कि "यह सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि मजहबी कट्टरता का मामला है।"


समय आ गया है जवाबदेही का


सावरीया बसंत की मौत एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लंबी चुप्पी का परिणाम है। समय आ गया है कि 'केरल स्टोरी' को प्रोपगैंडा कहने वाले लोग आज हकीकत का सामना करें, और सच्चाई को देखें। केरल की बेटियों की सुरक्षा हर किसी की जिम्मेदारी है। अगर ये दल मुस्लिम वोट बैंक के आगे हिंदू परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज करते रहे, तो भविष्य में और ऐसी घटनाएं होंगी।