छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हिंदू धर्म पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा से जुड़े कार्यकर्ताओं को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले को शुरुआती चरण में खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि पुलिस की जांच में ऐसे पर्याप्त तथ्य सामने आए हैं, जिनकी पूरी जांच और सुनवाई ट्रायल के दौरान ही होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने आरोपियों की उस याचिका को
खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर यह तय नहीं किया जा सकता कि बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आते हैं या कानून का उल्लंघन करते हैं। अदालत ट्रायल के दौरान साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर इस सवाल का जवाब देगी।
सार्वजनिक सभा के बाद दर्ज हुई FIR
यह मामला 27 फरवरी 2024 को जशपुर जिले के सलियतोली मिनी स्टेडियम में आयोजित एक सार्वजनिक सभा से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया। सभा के दौरान कई वक्ताओं ने हिंदू धर्म और उससे जुड़े विषयों पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं।
अभियोजन के मुताबिक, कुछ वक्ताओं ने कहा कि "हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि एक गाली है।" उन्होंने "हिंदू" शब्द को चोर, डकैत, लुटेरे और गुलाम जैसे शब्दों से भी जोड़ा। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि वक्ताओं ने धार्मिक प्रवचनकर्ता धीरेंद्र शास्त्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पर भी अभद्र टिप्पणियां कीं। इतना ही नहीं, सभा में EVM तोड़ने और उनके जरिए होने वाले चुनावों का विरोध करने की बात भी कही गई।
इन आरोपों के बाद विश्व हिंदू परिषद के एक सदस्य ने 28 फरवरी 2024 को कुंकुरी थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने जांच शुरू की और बाद में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश कर दी।
कई गंभीर धाराओं में चलेगा मुकदमा
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराएं लगाईं। इनमें विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने, राष्ट्रीय एकता के खिलाफ आरोप लगाने, आपत्तिजनक बयान देने और अन्य संबंधित धाराएं शामिल हैं।
इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कुंकुरी ने भी आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले के बाद आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे और पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की।
आरोपियों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दिया तर्क
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में कहा कि वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और वंचित वर्गों के मुद्दे उठाते हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके बयान संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य किसी धर्म का अपमान करना नहीं था। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि उनके भाषणों के कारण कहीं भी सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक अशांति नहीं हुई।
हाईकोर्ट ने कहा- ट्रायल में तय होंगे सभी सवाल
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि इस चरण में विवादित तथ्यों की जांच नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि यह देखना जरूरी होगा कि बयान किस संदर्भ में दिए गए, वहां किस तरह के लोग मौजूद थे और उन बयानों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी ने केवल आरोपों के आधार पर मामला दर्ज नहीं किया। पुलिस ने कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र, पर्चे और गवाहों के बयान भी पेश किए हैं। इसलिए अभियोजन का मामला केवल अनुमान पर आधारित नहीं दिखता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपियों की मंशा क्या थी और क्या उन्होंने वास्तव में अपराध किया, इसका अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों की जांच के बाद ही करेगी।
यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी धर्म, विशेषकर बहुसंख्यक समाज की आस्था पर अपमानजनक टिप्पणी करना कितना उचित है। यदि किसी संगठन या मंच से ऐसे बयान दिए जाते हैं, जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप झेलते हैं, तो कानून उनकी जांच करता है। फिलहाल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा से जुड़े आरोपियों को इस मामले में ट्रायल का सामना करना होगा और अदालत साक्ष्यों के आधार पर अंतिम फैसला सुनाएगी।