ताहिर हुसैन दोषी: दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों पर छह साल से गढ़ा गया नैरेटिव न्यायालय में ढह गया

राना अय्यूब जैसे पत्रकारों ने ताहिर की गिरफ्तारी को उसके हुसैन (मुस्लिम) होने के कारण बताया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू नेताओं को सुरक्षा मिल रही है जबकि मुस्लिमों को फंसाया जा रहा है।

The Narrative World    15-Jul-2026   
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दिल्ली की एक अदालत ने 13 जुलाई को पूर्व आम आदमी पार्टी के पार्षद ताहिर हुसैन को 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों में इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या, अपहरण, समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने और दंगे भड़काने के आरोपों में दोषी ठहराया। यह फैसला न सिर्फ एक अपराधी को सजा दिलाने वाला है, बल्कि उन राजनीतिक ताकतों और उदारवादी-वामपंथी इकोसिस्टम की पोल खोलता है जिन्होंने छह साल तक हत्यारे को पीड़ित बताकर हिंदू पीड़ितों को ही दोषी बताया।


अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह की अदालत ने आम आदमी पार्टी के नेता रहते हुए अपराध करने वाले ताहिर हुसैन और चार अन्य को दोषी करार दिया, जबकि छह को बरी किया है। हुसैन पर आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 365 (अपहरण), 153 (समुदाय विशेष के बीच दुश्मनी), 147, 148 (दंगा) समेत कई गंभीर धाराएं साबित हुईं।



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अदालत ने साफ कहा कि ताहिर ने भीड़ को भड़काया, हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए उकसाया और अपने घर को दंगाइयों का अड्डा बनाया। अंकित शर्मा का शव 26 फरवरी 2020 को चांदबाग पुलिया के पास नाले में मिला था, जिसमें 51 चोटें थीं।


ताहिर को राजनीतिक संरक्षण


2020 के फरवरी में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली में हिंदू-विरोधी हिंसा भड़की। पूर्वोत्तर दिल्ली के इलाकों में मुस्लिम भीड़ ने हिंदू घरों, दुकानों पर हमले किए। ताहिर हुसैन उस समय आम आदमी पार्टी का पार्षद था।


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पुलिस और अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर ने अपने घर की छत से पथराव, पेट्रोल बम और हथियारों की व्यवस्था की। उसका परिवार पहले ही सुरक्षित जगह भेज दिया गया था। पुलिस चार्जशीट में कहा गया कि ताहिर ने उमर खालिद, खालिद सैफी जैसे लोगों से मिलकर साजिश रची और हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए यह किया था।


अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी ने शुरुआत में तो ताहिर का बचाव किया लेकिन दबाव बढ़ने के बाद उसे सस्पेंड किया और कहा कि अगर AAP का कोई नेता दोषी है तो उसे दोगुना सजा मिलनी चाहिए। लेकिन इसके बाद भी पार्टी और उनके सहयोगियों का रवैया उलटा हो गया।


अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी ने कभी भी ताहिर के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाई। बल्कि उनके इकोसिस्टम ने ताहिर को पीड़ित बताने की कोशिश की। कांग्रेस और वामपंथी नेता-पत्रकारों ने पूरा माहौल बना दिया कि यह हिंदू बहुसंख्यक राज्य का मुस्लिमों पर अत्याचार है।


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राना अय्यूब जैसे पत्रकारों ने ताहिर की गिरफ्तारी को उसके हुसैन (मुस्लिम) होने के कारण बताया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू नेताओं को सुरक्षा मिल रही है जबकि मुस्लिमों को फंसाया जा रहा है। सोशल मीडिया और कुछ अंग्रेजी मीडिया ने अंकित शर्मा की हत्या को नजरअंदाज किया। उनके परिवार की पीड़ा को दबाया गया। इसके उलट ताहिर को निर्दोष साबित करने की मुहिम चलाई गई।


वामपंथी इकोसिस्टम की दोहरी नीति


यह इकोसिस्टम हमेशा से पीड़ित और अपराधी की भूमिका उलटने में माहिर रहा है। हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों में 53 लोग मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या हिंदुओं की थी। लेकिन वामपंथी रिपोर्टों और कुछ मीडिया ने इसे मुस्लिमों पर हमला बताया। दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन की रिपोर्ट ने पुलिस और भाजपा नेताओं को दोषी ठहराया, जबकि ताहिर जैसे लोगों की भूमिका को नजरअंदाज किया। कांग्रेस ने भी इस माहौल को बढ़ावा दिया। राहुल गांधी और अन्य नेताओं ने दंगों को भाजपा की साजिश बताया, जबकि हकीकत यह थी कि सीएए विरोध के नाम पर हिंसा भड़काई गई।


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आम आदमी पार्टी की सत्ता में रहते हुए दिल्ली पुलिस (जो केंद्र के अधीन है) ने जांच की, लेकिन केजरीवाल सरकार ने कभी सहयोग नहीं किया। उल्टा, उनके कुछ नेता ताहिर से लगातार संपर्क में रहे। ताहिर ने खुद कुछ बयानों में आम आदमी पार्टी नेताओं से बात की बात स्वीकार की। केजरीवाल की सरकार ने दंगों के बाद पीड़ितों की मदद में भी पक्षपात दिखाया।


तथ्यों की जांच


अदालत के फैसले में साफ है कि ताहिर ने भीड़ को उकसाया। "हिंदुओं को नहीं बख्शना" जैसे नारे लगाए गए। अंकित शर्मा को खासतौर पर निशाना बनाया गया क्योंकि वह हिंदू था।


आम आदमी पार्टी ने 2020 में ताहिर को सस्पेंड किया था, लेकिन बाद में उनके प्रति नरम रुख अपनाया। केजरीवाल की चुप्पी या आधा-अधूरा बयान इस बात का सबूत है कि पार्टी में ऐसे तत्वों को संरक्षण मिलता रहा। कांग्रेस का इकोसिस्टम तो पुराना है। वे हमेशा वोट बैंक की राजनीति करते हैं।


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यह फैसला सिर्फ एक मुकदमा नहीं है। यह पूछता है कि क्या आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां, जो पारदर्शिता और ईमानदारी का दावा करती हैं, असल में अपराधियों को पनाह देती हैं? केजरीवाल ने दोगुनी सजा का वादा किया था, लेकिन क्या हुआ? पार्टी ने ताहिर को पूरी तरह अलग नहीं किया। कांग्रेस और लेफ्ट ने तो पूरा नैरेटिव ही अलग चलाया।


कुछ अंग्रेजी मीडिया और पत्रकारों ने दंगों को "पोग्रोम" बताया। राना अय्यूब ने ताहिर को "फ्रेम" किया गया बताते हुए हिंदुओं पर ही पर हमला बोला। यह दोहरी नीति है। जहां हिंदू पीड़ितों की कहानियां दबाई गईं, वहीं मुस्लिमों पर एकतरफा रिपोर्टिंग हुई।


ताहिर हुसैन की सजा हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों के पीड़ितों को आंशिक न्याय दिलाती है। लेकिन आम आदमी पार्टी, केजरीवाल, कांग्रेस और उनके सेकुलर सहयोगियों की विश्वसनीयता पूरी तरह ध्वस्त हो गई है।