जब NEET पेपर लीक और परीक्षा से जुड़े मुद्दे पूरे देश में चर्चा का विषय बने हुए थे, तब कई मौकापरस्त शक्तियों ने इस मुद्दे के पीछे लगकर एक संयुक्त मोर्चा खड़ा किया। शुरुआत में यह महज सोशल मीडिया पर युवाओं की पहल होने का दावा कर रहा था, लेकिन धीरे-धीरे यह प्रोटेस्ट जंतर मंतर तक पहुंच गया। इसके बाद यह कई राजनीतिक दलों की ढाल बन गया। 20 जून से शुरू हुए इस तथाकथित आंदोलन ने कुछ ही हफ्तों में अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। अब यह परीक्षा सुधार का आंदोलन नहीं, बल्कि विपक्षी दलों, शहरी नक्सलियों, जिहादियों और कम्युनिस्ट विचारधारा वाले एक्टिविस्ट्स की समन्वित साजिश बन चुका है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का राजनीतिक और वैचारिक एजेंडा शुरुआत से ही परीक्षा सुधार तक सीमित नहीं था। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और हालिया X पोस्ट बताते हैं कि NEET और परीक्षा से जुड़े मुद्दों को केवल एक माध्यम बनाकर आंदोलन को हिंदू-विरोधी नारों, 'तोड़ो-तोड़ो' गैंग की सक्रियता और विपक्षी राजनीतिक दलों के समर्थन से एक व्यापक राजनीतिक अभियान में बदलने की कोशिश की गई। घटनाक्रम को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि शुरुआत से ही इस आंदोलन के पीछे शिक्षा नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक एजेंडा मौजूद था।
शुरुआत में CJP आंदोलन की मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से शुरू हुई थी। लेकिन जैसे-जैसे वामपंथी एक्टिविस्ट और विपक्षी नेता जंतर मंतर पहुंचने लगे, आंदोलन का पूरा स्वरूप बदल गया। अब यहां "बस नाम रहेगा अल्लाह का" जैसे नारे लगाए जा रहे हैं। इसके साथ ही "आजादी लेकर रहेंगे", "उमर खालिद को आजाद करो" और "मेरा लिंग, मेरी मर्जी" जैसे नारे भी खुलेआम सुनाई देने लगे। सोशल मीडिया और ग्राउंड रिपोर्ट्स से साफ पता चल रहा है कि इस आंदोलन में कौन-कौन से चेहरे सक्रिय हैं। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, ये चेहरे और अधिक खुलकर सामने आ रहे हैं।
कुनाल कामरा ने 15 जुलाई को CJP के मंच से भगवान राम और माता सीता के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। वहीं वामपंथी प्रोफेसर नंदिता नारायण ने सार्वजनिक मंच से "बस नाम रहेगा अल्लाह का" कविता गाई और दूसरों से भी इसे गाने की अपील की। AISA (All India Students' Association) के कार्यकर्ता भी वहां सक्रिय हैं। एक तरह से भारत के विरुद्ध काम करने वाली पूरी मशीनरी वहां एकजुट होकर खड़ी दिखाई दे रही है। यहां उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य ऐसे तत्वों को खुला समर्थन दिया जा रहा है, जिन्होंने भारत को टुकड़े-टुकड़े करने की बात की थी। साथ ही मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा किए गए जघन्य कृत्यों, जैसे 26/11 हमले, के दोषियों को फांसी न दिए जाने की मांग करने वाले, मर्सी पिटीशन दायर करने वाले और उनके समर्थकों की आवाजें भी वहां सुनाई दे रही हैं।
अखिलेश यादव (SP) ने CJP के प्रदर्शन का न सिर्फ सोशल मीडिया पर समर्थन किया, बल्कि अपनी पत्नी और पार्टी नेताओं को भी इसमें सक्रिय किया। उन्होंने सार्वजनिक बयान जारी किए। SP सांसद प्रिया सरोज को जंतर मंतर भेजा गया और डिंपल यादव भी मौके पर पहुंचकर वांगचुक व अन्य प्रदर्शनकारियों से मिलीं।
AAP की ओर से अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और अतिशी मार्लेना प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे। वहीं, पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल और CJP प्रदर्शन की संयोजक AAP ने इस प्रदर्शन के शुरू होने से पहले ही इसकी भूमिका तैयार करनी शुरू कर दी थी।
शशि थरूर ने 16 जुलाई को उनके समर्थन में ट्वीट किया और एक "emotional open letter" जारी कर आंदोलन को नैतिक समर्थन देने की कोशिश की। चंद्रशेखर आजाद रावण ने अभिजीत दिपके से सीधी मुलाकात की। CPI के कई सांसद भी इनके साथ मिल चुके हैं, जबकि महुआ मोइत्रा और TMC के अनेक सांसद, जिनमें डेरेक ओब्रायन भी शामिल हैं, शुरुआती दिनों से ही इसका खुला समर्थन करते रहे हैं और एक विशेष पक्ष के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
NCP के अनीश गावंडे ने पुणे में BJP के खिलाफ अलग से प्रदर्शन आयोजित किया, जो पूरी तरह CJP की छाया में हुआ। विशेष बात यह है कि BJP का विरोध करने वाले विभिन्न समूह एकजुट होकर उसके खिलाफ मोर्चा बना रहे हैं और "कॉकरोच" बनकर भारत विरोध के आरोपों के बीच जंतर मंतर पर कब्जा जमाए हुए हैं।
कुल मिलाकर, CJP का यह तथाकथित आंदोलन शुरुआत से ही परीक्षा सुधार या छात्रों के हितों के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का माध्यम दिखाई देता है। NEET और परीक्षा से जुड़े मुद्दों को केवल एक मुखौटे की तरह इस्तेमाल किया गया, जबकि मंच पर लगातार हिंदू-विरोधी नारे, विवादित चेहरे, वामपंथी संगठनों की सक्रियता और विपक्षी दलों का खुला समर्थन देखने को मिला।
इससे यह सवाल और मजबूत होता है कि क्या छात्रों की वास्तविक चिंताओं का इस्तेमाल केवल भीड़ जुटाने और एक पूर्व-नियोजित राजनीतिक अभियान को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। यदि ऐसा है, तो यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनभावनाओं और युवाओं के मुद्दों को राजनीतिक औजार बनाने का प्रयास भी माना जा सकता है।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय